भारत क्या चीन के मामले में अमेरिका के लिए अब उपयोगी देश नहीं रहा?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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अमेरिका के उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडो ने इसी साल मार्च में कहा था कि अमेरिका भारत को उसी तरह के आर्थिक फ़ायदे नहीं देगा, जैसे उसने चीन को दिए थे, जिनकी बदौलत चीन एक बड़ा प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरा.
लैंडो ने जियोपॉलिटिक्स और जियो-इकनॉमिक पर नई दिल्ली में आयोजित रायसीना डायलॉग में कहा था, ''भारत को यह समझना चाहिए कि हम वही ग़लतियां नहीं दोहराएंगे, जो हमने 20 साल पहले चीन के साथ की थीं."
इसके बाद जून महीने में अमेरिका के रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की थी कि अमेरिकी इंडो-पैसिफिक कमांड आधिकारिक तौर पर अपना नाम बदलकर फिर से अमेरिकी पैसिफिक कमांड कर लेगी.
अमेरिका के इस फ़ैसले पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर ने इसे क्वॉड गुट के ताबूत में एक और कील की तरह देखा था.
क्वॉड गुट को चीन के मुक़ाबले के तौर पर देखा जाता था लेकिन ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में इसकी भरपूर उपेक्षा की है.
ट्रंप ने भारत पर भारी टैरिफ़ भी लगाया और अपनी पूर्ववर्ती सरकारों की तरह इस दलील को अनसुना किया कि चीन से मुक़ाबले के लिए भारत ज़रूरी है.
दिल्ली स्थित थिंक टैंक अनंता सेंटर की सीईओ इंद्राणी बागची कहती हैं कि अमेरिका के लिए भारत से संबंधों में सेलिंग पॉइंट मुख्य रूप से यही था कि 'चीन से मुक़ाबले के लिए भारत ज़रूरी है.'
इंद्राणी बागची कहती हैं कि ट्रंप ने इस सेलिंग पॉइंट को कमज़ोर कर दिया है क्योंकि उन्हें लगता है कि चीन से उलझना नहीं है या उलझना है तो भारत से कोई मदद नहीं मिलेगी.

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चीन और भारत के बदलते समीकरण
अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन को लगता है कि ट्रंप की नीतियों के कारण अमेरिका के क़रीबी देश दूर जा रहे हैं.
ब्लिंकन ने 10 जुलाई को एक्स पर लिखा था, ''जब सहयोगी देशों का अमेरिका पर भरोसा कम होता है, तो वे सिर्फ़ वॉशिंगटन के अपना रुख़ बदलने का इंतज़ार नहीं करते. वे ख़ुद को बदलते हैं. नई साझेदारियां बनाते हैं. नेतृत्व के लिए दूसरे विकल्प तलाशते हैं. एक बार लिए गए ऐसे फ़ैसलों को पलटना आसान नहीं होता.''
ब्लिंकन ने लिखा था, ''हमारे विरोधी और प्रतिस्पर्धी इसे समझते हैं. रूस लंबे समय से ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन में दरार डालने की कोशिश करता रहा है. जब लोकतांत्रिक देश मिलकर कार्रवाई करने में कम सक्षम होते हैं, तो चीन को इसका फ़ायदा मिलता है. अमेरिका की विश्वसनीयता पर उठने वाला हर सवाल उन लोगों के लिए एक अवसर है, जो कमज़ोर और अधिक विभाजित पश्चिम देखना चाहते हैं.''
क़रीब सात सालों बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत के दौर पर आ रहे हैं. और इस दौरे को कई विश्लेषक भारत की बदलती रणनीति के तौर पर ले रहे हैं.
शी जिनपिंग 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स समिट में हिस्सा लेने आ रहे हैं. ब्राज़ील, रूस, इंडिया और चीन इस गुट के संस्थापक देश हैं. बाद में इसमें दक्षिण अफ़्रीका शामिल हुआ था. लेकिन अब ब्रिक्स में 10 देश पूर्णकालिक सदस्य हैं.
यह यात्रा 2019 के बाद शी जिनपिंग की पहली भारत यात्रा है. 2019 में राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चेन्नई में अनौपचारिक बातचीत की एक सिरीज़ के तहत दूसरी बैठक की थी. इसके अगले साल सीमा पर हुई झड़पें जानलेवा हो गईं और दोनों देशों के संबंधों में तनातनी बढ़ती गई.
ऐसे में शी के भारत दौरे पर सबकी नज़र है.
सिंगापुर की ननयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डायलन लोह ने अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग से कहा, "भारत और चीन के बीच हाल में तनाव में आई कमी को किसी बड़े रणनीतिक रीसेट के बजाय व्यावहारिक 'रिस्क मैनेजमेंट' के तौर पर देखा जाना चाहिए. दोनों पक्ष समझते हैं कि अस्थिर सीमा किसी के लिए भी फ़ायदेमंद नहीं है, लेकिन रणनीतिक स्तर पर गहरा अविश्वास अब भी बना हुआ है, जो निकट भविष्य में ख़त्म होने वाला नहीं है."

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ट्रंप ने भारत की अहमियत कम की?
साल 2023 में शी जिनपिंग ने नई दिल्ली में जी20 शिखर सम्मेलन में हिस्सा नहीं लिया था.
दोनों देशों के संबंधों को फिर से संतुलित करने की शुरुआत 2024 में रूस के कज़ान में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से अलग दोनों नेताओं की मुलाक़ात से हुई.
कहा जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों से भारत नाराज़ है, ऐसे में वह दूसरी महाशक्ति चीन की नाराज़गी भी मोल नहीं ले सकता है.
भारत पहले दलील देता था कि जब तक सीमा पर तनातनी ख़त्म नहीं होगी, तब तक चीन के साथ रिश्तों में अविश्वास कम नहीं होगा. लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि भारत उस शर्त के साथ सख़्ती से नहीं खड़ा है.
हाल ही में भारत के पूर्व सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कहा था कि चीन के साथ भारत के संबंध को सीमा विवाद तक सीमित करके नहीं रखा जा सकता.

इंद्राणी बागची कहती हैं, ''अमेरिका के लिए इंडिया से रिलेशनशिप का सेलिंग पॉइंट यही रहा है कि चीन से मुक़ाबले के लिए भारत ज़रूरी है. अमेरिका में पहले की सरकारें सोचती थीं कि इंडिया को मज़बूत बनाओ ताकि चीन की बढ़ती ताक़त को संतुलित किया जा सके. लेकिन मुझे नहीं लगता है कि इंडिया इस लॉजिक को फॉलो करता है. ट्रंप को लगता है कि इंडिया उनके लिए ज़रूरी नहीं है क्योंकि वह चीन से ख़ुद डील कर सकते हैं. ऐसे में भारत ने भी अमेरिका में जो ओवर इन्वेस्टमेंट किया था, उसे अब कम करना शुरू कर दिया है.''
इंद्राणी बागची कहती हैं, ''अब समय आ गया है कि भारत भी अमेरिका की उस सेलिंग पॉइंट से बाहर निकले. मुझे नहीं लगता है कि भारत को अमेरिका और चीन की प्रतिद्वंद्विता में कोई फ़ायदा मिला है. भारत को अमेरिका से जो भी मिला है, उसे ख़रीदा है. चीन के मामले में इंडिया नैचुरल बैलेंस करने वाला देश है. ट्रंप इस समझ को नकार रहे हैं वो अलग बात है लेकिन चीन के मामले में भारत की अहमियत ख़त्म नहीं होगी.''
2025 की अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति इस बात में निर्णायक बदलाव का प्रमाण है कि वॉशिंगटन दुनिया में अपनी भूमिका को किस तरह देखता है और दूसरों से क्या अपेक्षा रखता है.
भारत इस नैरेटिव में ज़रूर दिखाई देता है, हालांकि उस तरह नहीं, जैसी उम्मीद लोगों को हो सकती है. भारत को इंडो-पैसिफिक का मार्गदर्शक या एशिया में नए शक्ति संतुलन का आधार नहीं बताया गया है.

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अमेरिका क्या भारत को प्रतिस्पर्धी के रूप में देख रहा है?
दस्तावेज़ में कहा गया है, वॉशिंगटन का इरादा 'भारत के साथ कारोबारी संबंधों को बेहतर बनाने' का है, ताकि नई दिल्ली को उसके इंडो-पैसिफिक एजेंडे में और गहराई से जोड़ा जा सके और किसी एक प्रतिस्पर्धी देश के उभार को रोका जा सके.
अमेरिका चाहता है कि उसके साझेदार चीन के औद्योगिक और तकनीकी प्रभाव को सीमित करने की उसकी व्यापक कोशिश को समर्थन मिले. लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स से लेकर बैटरी और सौर उपकरणों तक, भारतीय उत्पादन काफ़ी हद तक चीनी इनपुट पर निर्भर है.
लेकिन अमेरिका की नेशनल सिक्यॉरिटी स्ट्रैटिजी इस स्ट्रक्चरल निर्भरता को पूरी तरह स्वीकार नहीं करती.
जिंदल स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल अफ़ेयर्स के डीन और 'फ्रेंड्स: इंडियाज क्लोजेस्ट स्ट्रैटिजिक पार्टनर्स' के लेखक श्रीराम चौलिया कहते हैं कि भारत अमेरिका के चीन विरोधी मुहिम अतार्किक टूल नहीं बन सकता है.
चौलिया ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''एशिया में अमेरिका चीन से अकेले नहीं लड़ सकता है. उसके भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया की ज़रूरत पड़ेगी. दूसरी बात यह है कि शी जिनपिंग के दिल्ली दौरे के बावजूद भारत से मतभेद ख़त्म नहीं होने जा रहे हैं. पाकिस्तान को चीन सैन्य मामलों में खुलकर मज़बूती दे रहा है. चीन हथियारों का इस्तेमाल पाकिस्तान भारत के ख़िलाफ़ कर रहा है. अगर अमेरिका एशिया को मल्टिपोलर करना चाहता है तो भारत के बिना संभव नहीं है.''
चौलिया कहते हैं, ''अमेरिका इंडो-पैसिफिक में ऑफशोर बैलेंसिंग ही करेगा. इसका मतलब यह है कि वह ख़ुद पूरी ताक़त के साथ हर जगह मौजूद नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्रीय शक्तियों और स्थानीय देशों को पीछे से बढ़ावा देता रहेगा.''

अमेरिका के उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडो के बयान को इस रूप में भी देखा जा रहा है कि अमेरिका अब भारत को केवल रणनीतिक साझेदार के रूप में नहीं, बल्कि संभावित आर्थिक और तकनीकी प्रतिस्पर्धी के रूप में भी देख रहा है, जिसके उभार को पूरी तरह सक्षम बनाने के बजाय नियंत्रित करने की ज़रूरत है.
भारत के जाने-माने सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने इसी साल 13 जुलाई को जापान टाइम्स में लिखा था कि क़रीब 25 वर्षों तक अमेरिकी नीति ने भारत की आर्थिक, सैन्य और तकनीकी ताक़त बढ़ने को प्रोत्साहित किया, क्योंकि एक मज़बूत भारत को एशिया में चीन का संतुलन बनाने के लिए ज़रूरी माना गया.
इस नीति में गहरे रक्षा संबंध, असैन्य परमाणु समझौता, तकनीकी साझेदारियां और साझा लोकतांत्रिक मूल्यों पर ज़ोर शामिल था.
चेलानी का तर्क है कि अब इस सहमति की जगह अमेरिका लेन-देन पर आधारित व्यावसायिक दृष्टिकोण ले रहा है. अमेरिका अब भी चीन को संतुलित करने में भारत की भूमिका चाहता है, लेकिन ऐसा लगता है कि वह भारत को इन्फ़्रास्ट्रक्चर, तकनीक या वैश्विक बाज़ारों में इतना शक्तिशाली बनाने में मदद करने को तैयार नहीं है.
चेलानी को लगता है कि अमेरिका की व्यापक रणनीति में भारत का महत्व धीरे-धीरे कम होते दिख रहा है. उनके मुताबिक भारत एक रणनीतिक रूप से उपयोगी लेकिन आर्थिक और तकनीकी रूप से सीमित साझेदार बनता दिखाई दे रहा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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