शी जिनपिंग का सात साल बाद भारत दौरा कितना अहम, क्या हैं मायने

मोदी और शी जिनपिंग

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इमेज कैप्शन, पांच साल बाद 2024 में रूस के कज़ान में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की मुलाक़ात हुई थी
    • Author, संदीप राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

सात साल में पहली बार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत दौरे पर आ रहे हैं. शी 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स समिट में हिस्सा लेने आ रहे हैं.

चीन के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है कि शी जिनपिंग ब्रिक्स के सालाना शिखर सम्मेलन के लिए दिल्ली में होंगे, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि वह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे या नहीं.

इससे पहले साल 2019 में शी जिनपिंग चेन्नई के पास मामल्लापुरम में हुई एक अनौपचारिक शिखर वार्ता के लिए भारत आए थे.

इस यात्रा को एक अहम कूटनीतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है. इसका असर दोनों एशियाई ताक़तों के बीच द्विपक्षीय रिश्तों को स्थिर करने की जारी कोशिशों के साथ-साथ ब्रिक्स सहयोग पर भी पड़ सकता है.

यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से वैश्विक हालात जटिल हैं. साथ ही भारत की एनर्जी सिक्युरिटी पर भी असर पड़ा है.

हालांकि उम्मीद जताई जा रही है कि दोनों बड़े पड़ोसी देशों के बीच कूटनीतिक रिश्तों में हाल के दिनों में आई गर्मजोशी के लिए शी जिनपिंग का यह दौरा और अनुकूल माहौल बनाएगा.

ब्लूमबर्ग ने चीन के राष्ट्रपति के दौरे को लेकर लिखा, "शी जिनपिंग की 2019 के बाद पहली भारत यात्रा, मोदी की ओर बढ़ा दोस्ती का हाथ."

हालांकि रायटर्स ने लिखा है कि दोनों देशों के बीच कारोबारी रिश्तों में सुधार की उम्मीद पालना जल्दबाज़ी होगी. दोनों देशों के कारोबारियों को अब भी कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

कड़े नियमों के चलते निवेश का अटकना, वीज़ा में देरी और औद्योगिक उपकरणों पर पाबंदियां शामिल हैं.

क्या गलवान के बाद रिश्तों में आया तनाव कम होगा?

चीन ने जून 2020 में चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच हुए विवाद की एक तस्वीर जारी की थी (फ़ाइल)

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साल 2020 में भारत चीन सीमा के पास गलवान में हुई झड़प में 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई थी. इसके बाद दोनों देशों के बीच रिश्ते और ख़राब हो गए थे. चीन ने दावा किया था कि इस संघर्ष में उसके सिर्फ़ चार सैनिक मारे गए थे.

हालांकि, हाल के सालों में संबंधों में सुधार हुआ है, ख़ासकर पिछले साल चीन के तियानजिन में एससीओ बैठक में शामिल होने के लिए मोदी ने यात्रा की थी.

यहां रूस और चीन के नेताओं के साथ उनकी मुलाक़ात ने काफ़ी सुर्खियां बटोरी थीं. पीएम मोदी और राष्ट्रपित शी के साथ द्विपक्षीय बातचीत हुई थी.

ऐसा इसलिए भी था कि उस समय अमेरिका ने भारत पर 50 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया दिया था जो कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं था.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के वाइस प्रेसीडेंट हर्ष वी पंत का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग़ैर भरोसेमंद नीतियों ने दोनों देशों को एक ऐसी जगह ज़रूर दी है जहां वो अपने मतभेदों से अधिक साझा हितों को लेकर बातचीत की मेज पर आ सकें.

हर्ष पंत ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में कहा, "दोनों ही पड़ोसी देशों को एक दूसरे की ज़रूरत है और यही कारण है कि हाल के दिनों में सीमा विवाद पर दोनों तरफ़ से नरमी देखने को मिली है."

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि इसी हफ़्ते छह सितंबर को पहली सीनियर हाईएस्ट मिलिट्री कमांडर-लेवल फ्लैग मीटिंग अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सीमा की ओर वाचा में और सात सितंबर को चीनी सीमा की ओर दमाई में हुई.

हर्ष वी पंत

पिछले साल भारत और चीन ने सीधी उड़ानें फिर शुरू की थीं और भारत ने चीनी कारोबारी प्रोफ़ेशनल्स के लिए वीज़ा प्रक्रिया में भी ढील दी थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब पिछले साल शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में हिस्सा लेने चीन के के तियानजिन पहुंचे थे जहां उनकी शी जिनपिंग से उनकी मुलाक़ात हुई थी.

साल 2024 में रूस के कज़ान में ब्रिक्स समिट हुई थी जिसमें पीएम मोदी और शीन जिनपिंग के बीच क़रीब पांच साल बाद मुलाक़ात हुई थी और दोनों नेताओं ने एलएसी से सैनिकों के पीछे हटने और 2020 में जो विवाद शुरू हुआ था, उसे सुलझाने के लिए हुए समझौते का स्वागत किया था.

उसी समय ये माना जाने लगा था कि दोनों देशों के बीच रिश्तों में जमी बर्फ पिघलने की शुरुआत हो गई है.

हालांकि हर्ष पंत का कहना है कि सीमा विवाद इतनी जल्दी समाप्त नहीं होने वाला है और ना ही उसे पीछे छोड़कर आगे बढ़ा जा सकता है.

वो कहते हैं, "दोनों तरफ़ से अब कोशिश की जा रही है कि समस्या और न बढ़े. साल 2020 जैसी घटना दोबारा न हो और सीमा संबंधों में एक भरोसा क़ायम हो. इसके लिए वांग यी और भारत के एनएसए अजित डोवाल के बीच मीटिंग भी हुई. और उसके बाद कमांडर्स की मीटिंग भी हुई है."

भारत और चीन के बीच दो बड़े मुद्दे

भारत चीन व्यापार

हर्ष पंत कहते हैं कि दोनों देशों के संबंधों ने एक करवट ज़रूर ली है लेकिन अभी भी दोनों देशों के बीच ट्रस्ट डेफ़िसिट (भरोसे की कमी) और ट्रेड डेफ़िसिट (व्यापार घाटा) दो अहम मुद्दे बने हुए हैं.

उनके मुताबिक़, "मीडिया में जो ख़बरें हैं, उसके अनुसार, शी जिनपिंग इस दौरे में 400 प्रतिनिधियों का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल लेकर आ रहे हैं, जिसमें अधिकांश ट्रेड और कॉमर्स से जुड़े लोग हैं."

"इसकी एक वजह यह है कि गलवान के बाद भारत ने बहुत साफ़ तौर पर कह दिया था कि सीमा पर कोई दिक़्क़त आती है उसका असर पूरे संबंधों पर पड़ेगा, ख़ासकर व्यापारिक साझेदारी पर भी."

और ये देखा गया है कि जबसे सीमा पर तनाव को कम करने की कोशिशें हुई हैं, आर्थिक रिश्तों में भी बदलाव नज़र आया है.

इसी साल मार्च में भारत ने चीनी निवेश पर लगाई गई कुछ पाबंदियों में ढील दी थी. ये पाबंदियां गलवान में हुई झड़पों के बाद लगाई गई थीं.

रायटर्स के मुताबिक़, इन पाबंदियों में इलेक्ट्रॉनिक्स, कैपिटल गुड्स और सोलर सेल सेक्टर आदि शामिल था. भारत कुछ उद्योगों में भारतीय और चीनी कंपनियों के बीच ज्वाइंट वेंचर्स को तेज़ी से मंज़ूरी देने पर भी विचार कर रहा है.

हाल ही में नई दिल्ली ने कुछ अहम परियोजनाओं को मंज़ूरी भी दी है जिनमें भारत की डिक्सन टेक्नोलॉजीज और चीनी स्मार्टफ़ोन निर्माता वीवो मोबाइल के बीच स्मार्टफ़ोन निर्माण से जुड़ा संयुक्त उपक्रम भी शामिल है.

लेकिन अभी भी कुछ बड़े निवेश और परियोजनाओं में बाधाएं बनी हुई हैं.

राटयर्स ने भारत सरकार के एक सूत्र के हवाले से यह बताया कि बीवाईडी और ग्रेट वॉल मोटर जैसी प्रमुख चीनी कंपनियों के लिए ये ढील पर्याप्त नहीं हैं. इन वाहन निर्माताओं ने नई दिल्ली की बढ़ी हुई जांच का सामना करने के बाद भारत में प्रस्तावित निवेश योजनाओं को रोक दिया था.

चीन के विदेश मंत्रालय ने रॉयटर्स से कहा कि इसी महीने किर्गिस्तान में एक क्षेत्रीय मंच पर थोड़ी देर के शी और मोदी मिले थे और कहा था कि दोनों देश 'प्रतिद्वंद्वी नहीं, साझेदार हैं और वे एक-दूसरे के विकास के लिए ख़तरा नहीं, बल्कि अवसर हैं.'

दरअसल दोनों देश अमेरिका के साथ अपने अस्थिर होते रिश्तों से जूझ रहे हैं.

हर्ष पंत कहते हैं. "हाल के सालों में अमेरिका के साथ चीन के रिश्ते तेज़ी से बिगड़े हैं. यहां तक कि यूरोप ने भी चीन के साथ कड़ाई करना शुरू कर दिया है. चीन मुख्यत: निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था है और उसे बाज़ार चाहिए. भारत उसके लिए एक बड़ा बाज़ार साबित हो सकता है."

उनके मुताबिक़, "भारत की ओर से एक बड़ी समस्या है ट्रेड डेफ़िसिट यानी व्यापार घाटा, जोकि 100 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है. भारत को चीन में अपनी वस्तुओं के लिए बाज़ार का एक्सेस नहीं है. दूसरे मैन्युफ़ैक्चरिंग में भारत चाहेगा कि स्ट्रेटेजिक सेक्टर को छोड़कर आर्थिक साझेदारी बढ़े लेकिन टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र हो, ताकि वैल्यू चेन में भारत ऊपर बढ़े."

वो कहते हैं कि शी के दिल्ली दौरे में शायद दोनों पक्षों के बीच इन सब पर बात हो.

चीन क्या चाहता है?

चीन की कार मैन्युफ़ैक्चरिंग

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इमेज कैप्शन, चीन मुख्यतः निर्यात प्रधान अर्थव्यवस्था है और अमेरिका और यूरोप से तनाव के बीच उसे नए बज़ार की खोज है

शंघाई की फ़ुदान यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशिया के विशेषज्ञ और नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास के पूर्व राजनयिक लिन मिनवांग ने समाचार एजेंसी रायटर्स से कहा, "चीन निश्चित रूप से रिश्तों में सुधार चाहता है, लेकिन हम यह देखना चाहते हैं कि भारत वास्तव में उन्हें किस हद तक सुधारने के लिए तैयार है."

हालांकि उन्होंने संकेत दिया कि किसी बड़े बदलाव की संभावना कम है.

हर्ष पंत कहते हैं, "चीन के पास आर्थिक ताक़त है और इसका इस्तेमाल कर एक भरोसेमंद साझेदार बनने का अच्छा मौक़ा है, ख़ासकर ऐसे समय में जब दोनों देश अमेरिका की व्यापार नीतियों से प्रभावित हैं."

उनके अनुसार, "आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना दोनों पक्षों के हित में है लेकिन यह भी इतना आसान नहीं है. ट्रेड डेफ़िसिट के अलावा बाज़ार में पहुंच, निवेश और व्यापारिक प्रतिबंधों पर रुख़ स्पष्ट करना होगा. किस हदतक ये समस्याएं दोनों पक्ष सुलझा पाएंगे, ये महत्वपूर्ण है."

चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने बीते मंगलवार को अपने एक लेख में 18वें ब्रिक्स समिट में दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक रिश्ते सुधरने की उम्मीद जताई है.

अख़बार ने लिखा, "वित्त वर्ष 2025-26 में द्विपक्षीय व्यापार 151.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिससे चीन एक बार फिर भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया. द्विपक्षीय संबंधों में उतार-चढ़ाव के बावजूद, यह उत्साहजनक आंकड़ा दोनों देशों के रिश्तों में लगातार हो रहे सुधार और दोनों अर्थव्यवस्थाओं की निरंतर मज़बूत वृद्धि को दिखाता है."

"इन दोनों ने मिलकर द्विपक्षीय व्यापार को और विस्तार देने और उसे बेहतर बनाने के लिए एक मज़बूत आधार तैयार किया है."

व्यापारिक बाधाएं जिन्हें हल करना होगा

शी जिनपिंग और मोदी

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इमेज कैप्शन, दोनों देशों के बीच आर्थिक बाधाओं को दूर करने की चुनौती है (फ़ाइल फ़ोटो)

लेकिन तमाम गर्मजोशी और संबंधों में सुधार के बावजूद दोनों देशों के बीच आर्थिक मोर्चे पर कुछ गतिरोध बने हुए हैं.

रॉयटर्स ने पिछले सप्ताह बताया था कि नई दिल्ली ने चीन के एंट ग्रुप से जुड़ी कंपनी अलीपे के एक प्रस्ताव को मंज़ूरी देने से मना कर दिया. इस प्रस्ताव के तहत उसे भारत की तत्काल भुगतान प्रणाली से जोड़ा जाना था. भारत ने इसके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं का हवाला दिया था.

रॉयटर्स की रिपोर्ट की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार चीन की मोबाइल फ़ोन निर्माता कंपनी शाओमी के ख़िलाफ़ जांच की सिफारिश पर भी विचार कर रही है, जिसे सीरियस फ़्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफ़िस ने की थी.

इसमें भारत में कंपनी के कारोबार में कथित अनियमितताओं और विदेशी निवेश कानूनों के उल्लंघन की जांच की बात कही गई है. हालांकि शाओमी ने क़ानूनों के पालन की बात कही है.

उधर चीन की ओर से भी बहुत सारी पाबंदियां लगाई गई हैं.

रॉयटर्स ने भारतीय सूत्रों के हवाले से दावा किया कि चीनी अधिकारियों ने अपनी कंपनियों से कहा है कि वे भारत को पोर्ट इक्विपमेंट, सोलर पैनल और मोबाइल निर्माण उपकरण समेत महत्वपूर्ण तकनीक और बुनियादी ढांचे से जुड़े सामान न बेचें.

समाचार एजेंसी ने ये भी दावा किया कि सोलर एनर्जी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे अहम सेक्टर में जिन उपकरणों और पुर्ज़ों की ज़रूरत है, उन्हें चीनी सीमा शुल्क विभाग में रोक रखा है.

रॉयटर्स ने एक सरकारी अधिकारी के हवाले से ये भी दावा किया है कि कुछ बड़ी सुरंग खोदने वाली मशीनों को एक साल से अधिक समय से चीन ने रोक रखा है.

हर्ष पंत कहते हैं, "कुछ पाबंदियों में दोनों तरफ़ से कमी आ सकती है. लेकिन ऐसा नहीं लगता कि तत्काल तस्वीर पूरी तरह बदल जाए. भारत चाहेगा कि चीन की जो आर्थिक मजबूती है उसका उसे फ़ायदा मिले. भारत में ये बहस भी रही है कि चीन के निवेश को किस तरह लाने की कोशिश की जानी चाहिए."

वो कहते हैं, "चीन को दिखाना होगा कि वो भारत के साथ आर्थिक मुद्दे पर गंभीर है और इसका एक उदाहरण हो सकता है कि वो भारत को अपने यहां मार्केट एक्सेस दे."

ग्लोबल टाइम्स ने भी अपने लेख में लिखा है, "भारत के कृषि उत्पादों, खनिज संसाधनों और ख़ास कंज़्यूमर गुड्स के लिए चीनी बाज़ार में प्रवेश की काफ़ी संभावनाएं हैं. भारत चीन के बीच व्यापारिक सहयोग का फ़ायदा भारत के घरेलू मैन्यूफ़ैक्चरिंग सेक्टर को होगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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