हिंदू मंदिरों के पैसे के प्रबंधन पर कर्नाटक हाई कोर्ट ने जारी किए निर्देश

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के लिए
- ........से, बेंगलुरु
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने सभी मंदिरों के लिए एकीकृत और केंद्रीकृत इलेक्ट्रॉनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली बनाने के निर्देश दिए हैं. यह व्यवस्था भविष्य में देश भर के धार्मिक स्थलों के लिए एक मानक बन सकती है.
मंदिर के दान से 8,750 रुपये की चोरी से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा, "मंदिर का धन सामान्य धन नहीं है. यह एक ट्रस्ट की संपत्ति है, जो श्रद्धालुओं की आस्था से एकत्र होती है, और देवता एवं संस्था के लिए सुरक्षित रखी जाती है."
न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज ने अपने 118 पन्नों के फ़ैसले में 53 पन्ने केवल निर्देशों के लिए समर्पित किए हैं.
उन्होंने ई-गवर्नेंस विभाग और हिंदू धार्मिक संस्थान एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग को निर्देश दिए हैं कि मंदिरों की धनराशि और संपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक "एकीकृत रियल-टाइम प्रणाली" लागू की जाए.
अदालत की यह चिंता ऐसे समय में सामने आई है जब राम मंदिर को दिए गए दान की राशि के कथित दुरुपयोग के आरोप भी लगे थे.
अयोध्या में दान की चोरी का मामला सामने आने के तुरंत बाद हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक की राज्य सरकारों ने जुलाई में निर्देश जारी किए थे.
इन निर्देशों में मंदिरों के धन की सुरक्षा के लिए प्रौद्योगिकी आधारित व्यवस्था लागू करने की बात कही गई थी.
फ़ैसले में कहा गया, "मंदिर में रसीद काउंटर संभालने वाला व्यक्ति भरोसे की ज़िम्मेदारी निभाता है. श्रद्धालु और संस्था दोनों उसकी ईमानदारी पर निर्भर करते हैं."
फ़ैसले में आगे कहा गया, "जब ऐसा व्यक्ति मंदिर के संग्रहित धन को अपने इस्तेमाल में लेता हुआ पाया जाता है, तो यह गंभीर कदाचार है. इसकी गंभीरता धनराशि की मात्रा में नहीं, बल्कि भरोसा तोड़ने में है."
मामला क्या है?

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राजेश नायक एक सहायक क्लर्क थे, जिन्हें 11 साल बाद पदोन्नति देकर सेकंड डिविज़न क्लर्क बनाया गया था.
उन पर उडुपी ज़िले के ब्रह्मावर तालुक स्थित श्री दुर्गा परमेश्वरी मंदिर में दान की राशि के लिए डुप्लिकेट रसीदें जारी करने का आरोप लगा था.
23 से 25 अगस्त 2018 के बीच उन्होंने मंदिर के आईटी प्रशासक की आईडी और पासवर्ड का ग़लत इस्तेमाल किया. उन पर मंदिर में "भरोसे का उल्लंघन करने और धन के दुरुपयोग" का आरोप लगाया गया.
उनके ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 409, 468, 471, 420 और 21 के तहत मामला दर्ज किया गया था. नायक ने अपनी सेवा से बर्ख़ास्तगी के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में अपील की थी.
न्यायमूर्ति सुंदराज ने कहा, "यह मामला दिखाता है कि मंदिरों का धन कितनी आसानी से ग़बन किया जा सकता है. साथ ही, ऐसे ग़लत कामों का पता लगाना और उन्हें साबित करना कितना मुश्किल हो सकता है."
उन्होंने कहा कि यह गड़बड़ी संयोग से सामने आई थी.
मैन्युअल मिलान के दौरान एक ही नंबर की दो रसीदें मिल गई थीं और यह घटना के कई दिन बाद पता चला था.
फ़ैसले में कहा गया कि जब जांच इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तक पहुंची, तो सर्वर में डुप्लिकेट रसीदों की छपाई से जुड़ा कोई डेटा नहीं मिला. यह भी तय नहीं किया जा सका कि बैकअप डेटा हटाया गया था या नहीं.
इसके परिणामस्वरूप रिकॉर्ड में छेड़छाड़ के आरोप को पूरी तरह साबित नहीं किया जा सका. फ़ैसले में कहा गया, "कम धनराशि होने से बेईमानी कोई छोटी बात नहीं बन जाती."
जज ने कौन-कौन से सुरक्षा उपाय सुझाए हैं?
न्यायमूर्ति गोविंदराज ने सुझाव दिया है कि नई प्रणाली मंदिर की हर तरह की आय और हर तरह के ख़र्च को कवर करे.
इसमें पूजा और सेवा की रसीदें शामिल हों. विशेष दर्शन और प्रवेश शुल्क का रिकॉर्ड भी इसमें रखा जाए. हुण्डी और अन्य दान को भी इस प्रणाली में दर्ज किया जाए.
प्रसाद, अन्नदान, लड्डू और अन्य वस्तुओं की बिक्री से होने वाली आय भी इसमें शामिल हो. कल्याण मंडप शुल्क, मुंडन, वाहन पूजा और प्रकाशनों से होने वाली कमाई का भी रिकॉर्ड रखा जाए.
पट्टों, किराये और बंदोबस्ती संपत्तियों से होने वाली आय भी इसमें दर्ज हो. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मंदिर के धन का कोई भी स्रोत इस व्यवस्था की निगरानी से बाहर न रहे.
जज ने कहा कि हर रसीद केवल इसी प्रणाली के माध्यम से जारी की जानी चाहिए. हर रसीद पर मशीन की बनाए एक एंट्री, क्रमवार और दोबारा न दोहरायी जाने वाली सीरियल नंबर की होनी चाहिए.
प्रणाली ऐसी होनी चाहिए कि पहले से मौजूद किसी नंबर वाली दूसरी रसीद जारी ही न की जा सके.
फ़ैसले में कहा गया कि अगर किसी वास्तविक कारण से रसीद दोबारा छापना आवश्यक हो, तो उस पर साफ़ और प्रमुख रूप से "डुप्लीकेट, रीप्रिंट" लिखा होना चाहिए. यह शब्द इस तरह छपे हों कि उन्हें छिपाया न जा सके और न ही उन्हें हल्का या अस्पष्ट छापा जा सके.

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ऐसी दोबारा छपाई केवल दर्ज कारण और किसी पर्यवेक्षक की स्वतंत्र अनुमति के बाद ही होनी चाहिए. साथ ही, रसीद दोबारा छापने वाले ऑपरेटर की पहचान और समय स्वतः रिकॉर्ड होना चाहिए.
फ़ैसले में कहा गया कि हर रसीद पर एक प्रिंटिड क्यूआर कोड होना चाहिए. श्रद्धालु उसे स्कैन करके या उसका इस्तेमाल करके केंद्रीय सर्वर से यह सत्यापित कर सकें कि रसीद असली है और यूनीक है.
इससे नकली या डुप्लिकेट रसीद का पता श्रद्धालु काउंटर पर ही लगा सकेंगे.
फ़ैसले में यह भी कहा गया है कि हर लेनदेन बनने के साथ ही केंद्रीय सर्वर को भेज दिया जाए. इससे कोई भी रिकॉर्ड तैयार होने के बाद चुपचाप बदला, मिटाया या उसके साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकेगी.
फ़ैसले में कहा गया कि अगर नेटवर्क कनेक्टिविटी चली जाए तो ऑफ़लाइन दर्ज की गईं एंट्रीज़, कनेक्शन बहाल होने पर खुद ही सिंक्रोनाइज़ हो जाएं. ऑफ़लाइन अवधि को भी जांच के लिए चिह्नित किया जाए.
फ़ैसले में कहा गया कि इस सुरक्षा उपाय का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मौजूदा मामले की तरह इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड कभी ग़ायब न हो. इससे ग़लत काम और उसे छिपाने की किसी भी कोशिश का पता लगाने के लिए हमेशा डिजिटल सबूत उपलब्ध रहेंगे.
कर्मचारियों को फ़िडेलिटी गारंटी देनी होगी
फ़ैसले में कहा गया, "नक़दी, चढ़ावे या क़ीमती वस्तुओं को संभालने वाले हर कर्मचारी को फ़िडेलिटी गारंटी बॉन्ड या बीमा के दायरे में रखा जाना चाहिए. जहां नियम इसकी मांग करते हों, वहां कर्मचारी को सुरक्षा राशि भी जमा करनी चाहिए, ताकि उसकी बेईमानी से होने वाले किसी भी नुक़सान की भरपाई की जा सके."
नक़दी, यूपीआई, क्यूआर कोड, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, नेट बैंकिंग, वॉलेट, टैप-एंड-पे, एनएफ़सी सक्षम उपकरणों या किसी अन्य स्वीकृत इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यम से होने वाले सभी संग्रह को रियल-टाइम में रिकॉर्ड किया जाना चाहिए.
इन सभी लेनदेन की जानकारी केंद्रीय लेखा प्रणाली में दिखाई देनी चाहिए.
हर शिफ़्ट के अंत में और प्रत्येक दिन के समापन पर प्रणाली विस्तृत मिलान विवरण तैयार करे. इसमें कुल लेनदेन की संख्या, विभिन्न मदों के तहत एकत्र राशि, भुगतान का माध्यम, लंबित लेनदेन, रद्द की गई रसीदें, राशि वापसी और अंतिम शेष राशि का ब्यौरा होना चाहिए.
किसी भी कमी, अतिरिक्त राशि, गड़बड़ी, डुप्लिकेट लेनदेन, देरी से की गई एंट्री या बिना वजह के अंतर की पहचान यह सिस्टम स्वतः करे.
ऐसे मामलों की जानकारी तुरंत सत्यापन के लिए नामित पर्यवेक्षण अधिकारी को भेजी जानी चाहिए.
संस्था द्वारा एकत्र की गई हर राशि को निर्धारित बैंक खाते में तुरंत जमा किया जाना चाहिए. सामान्य तौर पर यह राशि उसी कार्य दिवस में जमा होनी चाहिए. अगर ऐसा करना व्यावहारिक रूप से संभव न हो, तो इसे अगले कार्य दिवस में जमा किया जाना चाहिए.
मंदिर की संपत्तियां

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न्यायमूर्ति गोविंदराज ने कहा है कि हर मंदिर की सभी अचल संपत्तियों और बंदोबस्ती की ज़मीनों का पूरा डिजिटाइज्ड रजिस्टर रखा जाए.
इसमें ज़मीन का क्षेत्रफल, सीमाएं, स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज़ और जहां संभव हो, संपत्ति का जियोटैग भी दर्ज किया जाए.
उन्होंने कहा कि इन संपत्तियों की नियमित निगरानी की जाए. इससे अतिक्रमण का जल्द पता लगाया जा सकेगा और उस पर बिना देरी कार्रवाई की जा सकेगी.
प्रणाली में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि किसी भी निर्धारित संदिग्ध स्थिति के पैदा होते ही रियल-टाइम अलर्ट जारी हो.
यह अलर्ट संस्था के कार्यकारी अधिकारी, संबंधित सहायक आयुक्त, उप आयुक्त और केंद्रीय निगरानी प्रकोष्ठ को भेजा जाए.
फ़ैसले में कहा गया है कि आयुक्त और उप आयुक्तों के लिए एक केंद्रीकृत डैशबोर्ड बनाया जाए. इसमें किसी एक काउंटर या किसी एक संस्था के स्तर तक जाकर जानकारी देखने की सुविधा हो.
इससे हर मंदिर की वित्तीय गतिविधियां निगरानी करने वाले अधिकारियों को रियल-टाइम में दिखाई देंगी.
प्रणाली का समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट कराया जाना चाहिए. यह ऑडिट किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराया जाए.
ऑटोमैटिक ऑडिट रिपोर्ट कम से कम महीने में एक बार तैयार की जानी चाहिए.
फ़ैसले में कहा गया है कि ऑडिट केवल औपचारिकता बनकर नहीं रहना चाहिए.
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