शी जिनपिंग के दौरे की चीन पुष्टि क्यों नहीं कर रहा, क्या भारत ने अपनी अहम मांग छोड़ दी

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भारत में 2023 में 9-10 सितंबर को जी-20 समिट हुआ था. इस समिट में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शामिल नहीं हुए थे. लेकिन तब उनके शामिल होने को लेकर अंतिम पलों तक कोई अटकलें नहीं थीं.
चीन ने क़रीब एक हफ़्ता पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि शी जिनपिंग जी-20 समिट में शामिल होने नई दिल्ली नहीं जाएंगे.
अब इसी हफ़्ते नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को ब्रिक्स समिट है लेकिन चीन ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दौरे की पुष्टि नहीं की है.
चीन के विदेश मंत्रालय ने बुधवार शाम तक कहा कि अभी इसे लेकर कोई जानकारी नहीं है. भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी यही बात कही है.
कई लोग हैरानी जता रहे हैं कि चीन आख़िर कन्फ़र्म क्यों नहीं कर रहा है. थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान ने एक्स पर लिखा है, ''चीन ने किर्गिस्तान में एससीओ समिट के लिए शी जिनपिंग की यात्रा की घोषणा 26 अगस्त को की थी. यानी उनके रवाना होने से क़रीब चार दिन पहले. मुझे नहीं पता कि यह प्रोटोकॉल से जुड़ी कोई बात है या फिर इसके पीछे कोई और वजह है, जैसे कि चीन भारत की ओर से पहले घोषणा किए जाने का इंतज़ार कर रहा हो.''
रक्षा विश्लेषक प्रवीण साहनी भी चीन के रुख़ से हैरान हैं. उन्होंने एक्स पर लिखा है, ''चीन के लिए यह असामान्य है. अभी तक यह घोषणा नहीं कर रहा है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे या नहीं.''
''समिट अब सिर्फ़ दो दिन दूर है. ऐसा लगता है कि 2023 के जी20 की तरह इस बार भी चीनी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व प्रधानमंत्री ली चियांग कर सकते हैं. अगर शी जिनपिंग नहीं आते हैं, तो यह ब्रिक्स में भारत की भूमिका के लिए एक बड़ा झटका होगा.''
हालांकि इंडियाज चाइना चैलेंज के लेखक अनंत कृष्णन इसे बहुत असामान्य नहीं मान रहे हैं. कृष्णन ने लिखा है, ''बुधवार को भी चीन के विदेश मंत्रालय से पुष्टि नहीं होना अपने आप में किसी ख़ास बात का संकेत नहीं है. चीन के लिए किसी यात्रा से दो दिन पहले उसकी घोषणा करना असामान्य नहीं है और आमतौर पर यही प्रोटोकॉल अपनाया जाता है. कोई बड़ा द्विपक्षीय राजकीय दौरा होता तब उसकी घोषणा तीन-चार दिन पहले की जा सकती है.''

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भारत का बदला रुख़
अगर शी जिनपिंग ब्रिक्स समिट में आते हैं तो यह क़रीब सात साल में उनकी पहली भारत यात्रा होगी. ब्रिक्स में ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और सात अन्य देश शामिल हैं.
ब्रिक्स को अमेरिकी दबदबे वाली दुनिया के विकल्प के रूप देखा जाता है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार धमकी दे चुके हैं.
दोनों देशों के बीच जून 2020 में क़रीब 2,200 मील लंबी सीमा पर हुई झड़पों में 20 भारतीय सैनिकों और कम से कम चार चीनी सैनिकों की मौत हुई थी, जिसके बाद दोनों देशों के रिश्ते बुरी तरह प्रभावित हुए थे.
दोनों देशों के पास संबंधों को स्थिर करने की कई अच्छी वजहें हैं. इनमें भारत के मामले में राष्ट्रपति ट्रंप की अनिश्चित विदेश नीति को लेकर चिंता भी शामिल है.

अमेरिका में काउंसिल फॉरन रिलेशन्स के सीनियर फेलो सदानंद धुमे ने वाल स्ट्रीट जर्नल में लिखा है, ''रिश्तों को पूरी तरह सामान्य करने के लिए कोई जादुई रीसेट बटन नहीं है. भारत और चीन के बीच मतभेदों की कई वजहें हैं. इनमें एक-दूसरे के साथ टकराते सीमाई दावे, कथित ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों का नेतृत्व करने की होड़ और पाकिस्तान के साथ चीन की क़रीबी साझेदारी को लेकर गहरे मतभेद हैं. ऐसे में वास्तविक मेल-मिलाप आसान नहीं है.''
चीन में भारत के पूर्व राजदूत गौतम बंबावले भारत-चीन संबंधों में रीसेट की बात को जल्दबाज़ी मानते हैं. बंबावले ने सदानंद धुमे से कहा, ''2020 की झड़पों ने "रिश्तों को 10 क़दम पीछे धकेल दिया जबकि हाल में रिश्तों में नरमी के संकेत "ज़्यादा से ज़्यादा तीन क़दम आगे बढ़ने" का संकेत देते हैं.''
2020 की हिंसा के बाद भारत ने सीमा पर हज़ारों सैनिकों की तैनाती बढ़ा दी थी, टिकटॉक और वीचैट समेत क़रीब 60 चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगा दिया, ख़्वावे और ज़ेडटीई जैसी चीनी कंपनियों को भारत के 5G टेलीकॉम नेटवर्क के विस्तार में प्रभावी रूप से बाहर कर दिया, चीनी नागरिकों के लिए पर्यटक वीज़ा निलंबित कर दिए और अमेरिका, जापान के अलावा ऑस्ट्रेलिया वाले क्वॉड समूह के साथ सहयोग और गहरा किया.

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क्यों हो रहे हैं बदलाव?
लेकिन पिछले दो वर्षों में भारत-चीन संबंधों में आंशिक सुधार देखने को मिला है. 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से अलग शी जिनपिंग से मुलाक़ात की थी.
पिछले साल क़रीब सात वर्षों में अपनी पहली चीन यात्रा के दौरान मोदी शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (एससीओ) की बैठक में शामिल होने के लिए तियानजिन गए थे. यह चीन और रूस के नेतृत्व वाला एक सुरक्षा गठबंधन है.
दोनों देशों ने सीमा विवाद पर उच्चस्तरीय बातचीत फिर से शुरू की है और दो विवादित इलाक़ों में सैन्य गश्त को लेकर समझौते किए हैं. अक्तूबर में भारतीय एयरलाइन इंडिगो ने कोलकाता से ग्वांगचोउ के लिए उड़ान शुरू की, जिससे पाँच साल बाद भारत और चीन के बीच सीधी उड़ानों की बहाली हुई.
आख़िर इन बदलावों की वजह क्या है? इसका संकेत पिछले हफ़्ते भारत के पूर्व चीफ़ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने दिया था.
चौहान ने कहा था, ''चीन के साथ हमारे संबंधों को केवल सीमा विवादों के मुद्दे के कारण बंधक नहीं बनाया जा सकता. चीन और भारत एशिया की दो बड़ी शक्तियां, बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और प्राचीन सभ्यताएं हैं. यह बात भी महत्वपूर्ण है. दोनों देश कुछ क्षेत्रों में सहयोग करते हैं, प्रभाव और बाज़ारों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं और क्षेत्रीय के साथ वैश्विक व्यवस्था के कुछ पहलुओं पर उनके विचार अलग-अलग हैं."
थिंक टैंक तक्षशिला इंस्टिट्यूशन के चीन मामलों के विशेषज्ञ मनोज केवालरामानी ने वाल स्ट्रीट जर्नल के कॉलमिस्ट सदानंद धुमे से कहा कि भारत ने शायद चुपचाप इस आग्रह को छोड़ दिया है कि संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि चीन सीमा पर 2020 की झड़पों से पहले वाली स्थिति पर सहमत हो. उनका कहना है कि नई दिल्ली में इस बात की शांत समझ बन रही है कि दुनिया बदल चुकी है और चीन और भारत के बीच शक्ति का अंतर है."
सदानंद धुमे ने लिखा है, ''ट्रंप की अनिश्चित विदेश नीति ने भारत में चीन के प्रति सख़्त रुख़ रखने वाले लोगों की स्थिति कमज़ोर की है. अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने रूसी तेल ख़रीदने के लिए भारत पर भारी टैरिफ़ लगाए हैं, पाकिस्तान के साथ नज़दीकी बढ़ाई है और क्वॉड को भी कम महत्व दिया है. उन्होंने चीन के साथ जी-2 व्यवस्था बनाने की संभावना पर भी विचार किया है.''
एक सितंबर को एससीओ समिट से पहले इस साल चीनी राष्ट्रपति ने सिर्फ़ एक बार विदेश यात्रा की थी. जून में उन्होंने सात साल में पहली बार उत्तर कोरिया की राजकीय यात्रा की थी. इस बीच, दुनिया चीन पहुंचती रही है.

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ट्रंप का असर
अमेरिका स्थित थिंक टैंक सेंटर फोर स्ट्रैटिजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के मुताबिक़, साल की पहली छमाही में 20 से अधिक नेता, जिनमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी शामिल हैं, बीजिंग का दौरा कर चुके हैं.
शी जिनपिंग 30 अगस्त को एससीओ समिट में शामिल होने किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक पहुँचे थे. इसके बाद शी जिनपिंग ने एक दशक में पहली बार मिस्र की राजकीय यात्रा की. चीन ने मिस्र के स्वेज नहर क्षेत्र में द्विपक्षीय आर्थिक और व्यापार सहयोग क्षेत्र के ज़रिए अपनी मौजूदगी मजबूत की है.
इसके बाद शी के एक और ग़ैर-पश्चिमी देशों के नेताओं के शिखर सम्मेलन ब्रिक्स में शामिल हो सकते हैं. यह 2019 के बाद शी की पहली भारत यात्रा होगी और 2020 में दोनों देशों के बीच हुई जानलेवा सीमा झड़पों के बाद भी उनकी पहली भारत यात्रा होगी.
चीनी कस्टम डेटा के मुताबिक, पिछले साल चीन और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार 12.4 फ़ीसदी बढ़कर रिकॉर्ड 155 अरब डॉलर पर पहुँच गया, जो 10 साल पहले दर्ज किए गए 71.6 अरब डॉलर से दोगुने से भी अधिक है. इस साल के पहले सात महीनों में द्विपक्षीय व्यापार पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 23 फ़ीसदी और बढ़ गया.
वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक स्टिमसन सेंटर के चाइना प्रोग्राम की निदेशक यून सन ने ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स से कहा कि चीन की नज़र में ट्रंप की नीतियों के कारण भारत फ़िलहाल बदलाव के दौर से गुज़र रहा है. इसलिए भारत तक पहुँच बढ़ाने और संबंधों को सुधारने के उपायों का मक़सद नई दिल्ली को चीन के और क़रीब लाना है.
उन्होंने कहा, "चीन भारत के रणनीतिक विकल्प को प्रभावित करना चाहता है. वह ऐसा भारत चाहता है जो चीन को ख़तरे के रूप में न देखे. वह यह भी चाहता है कि चीन की वजह से भारत अमेरिका के साथ खड़ा न हो."
बीजिंग में हालिया भारत-चीन वार्ता के बाद चीनी सरकारी मीडिया में प्रकाशित एक लेख में पीपल्स डेली के टिप्पणीकार डिंग गांग ने कहा कि दोनों पक्षों ने "इस बात को स्वीकार किया कि अमेरिकी प्रभाव ने उनके संबंधों पर असर डाला है और यह एक निरंतर, अनकही मौजूदगी रही है. लेकिन अब यह स्थिति बदल रही है. कई साल पहले की बातचीत में जो अमेरिकी छाया इतनी स्पष्ट रूप से मौजूद रहती थी, वह अब धीरे-धीरे धुंधली हो रही है. दोनों पक्षों के कूटनीतिक प्रयासों की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ही एक गहरा बदलाव चल रहा है."
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