ज़ोहरान ममदानी के बयान से फिर चर्चा में कोहिनूर हीरा, ये ब्रिटेन के पास कैसे पहुंचा था?

सारांश
  • न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने कहा था कि अगर ब्रिटेन के किंग चार्ल्स से उनकी अलग से बात हुई तो वह उन्हें कोहिनूर लौटाने के लिए कहेंगे
  • किंग चार्ल्स और ममदानी की मुलाक़ात हुई, लेकिन उनके बीच कोहिनूर को लेकर बात हुई या नहीं, यह पता नहीं है
  • लेकिन ममदानी के इस बयान के बाद एक बार फिर कोहिनूर को लेकर चर्चा होने लगी
  • ब्रिटिश ताज पर लगे कोहिनूर की कहानी बीबीसी हिंदी पर पहली बार मई 2021 में प्रकाशित हुई थी
  • पढ़िए कोहिनूर हीरे का सफर, जो नादिरशाह से होता हुआ ब्रिटिश ताज तक पहुंचा
  • पढ़ने का समय: 12 मिनट

बात 29 मार्च, 1849 की है. किले के बीचोबीच स्थित शीश महल में 10 साल के महाराजा दलीप सिंह को लाया गया. उस बालक के पिता महाराजा रणजीत सिंह एक दशक पहले ही दिवंगत हो चुके थे. उनकी माँ रानी जिंदन कौर को कुछ समय पहले जबरदस्ती शहर के बाहर एक दूसरे महल में भेज दिया गया था.

दलीप सिंह के चारों ओर लाल कोट और हैट पहने अंग्रेज़ों ने घेरा बनाया हुआ था.

थोड़ी देर बाद एक सार्वजनिक समारोह में उन्होंने अपने दरबार के बचे-खुचे सरदारों के सामने उस दस्तावेज़ पर दस्तखत कर दिया, जिसका अंग्रेज़ सरकार बरसों से इंतजार कर रही थी.

कुछ ही मिनटों में लाहौर किले पर सिख खालसा का झंडा नीचे उतारा गया और उसकी जगह ईस्ट इंडिया कंपनी का धारियों वाला झंडा लहराने लगा.

इसके साथ ही सिख साम्राज्य पर न सिर्फ ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रभुत्व हो गया, बल्कि दुनिया का सबसे मशहूर हीरा कोहिनूर भी उनके कब्जे में आ गया.

मुर्गी के छोटे अंडे के बराबर हीरा

कोहिनूर के बारे में कहा जाता है कि इसे संभवत: तुर्कों ने किसी दक्षिण भारतीय मंदिर में एक मूर्ति की आँख से निकाला था.

'कोहिनूर द स्टोरी ऑफ़ द वर्ल्ड्स मोस्ट इनफेमस डायमंड' पुस्तक के लेखक विलियम डेलरिम्पल कहते हैं, "कोहिनूर का पहला आधिकारिक ज़िक्र 1750 में फ़ारसी इतिहासकार मोहम्मद मारवी के नादिरशाह के भारत के वर्णन में मिलता है. मारवी लिखते हैं कि उन्होंने अपनी आँखों से कोहिनूर को देखा था.

"वह उस समय तख्त-ए-ताऊस के ऊपरी हिस्से में जड़ा हुआ था, जिसे नादिरशाह दिल्ली से लूटकर ईरान ले गया था. कोहिनूर मुर्गी के छोटे अंडे के बराबर था और जिसके बारे में कहा जाता था कि उसे बेचकर पूरी दुनिया के लोगों को ढाई दिन तक खाना खिलाया जा सकता था."

"तख्त-ए-ताऊस को बनाने में ताजमहल से दोगुना धन लगा था. बाद में कोहिनूर को तख्त-ए-ताऊस से निकाल लिया गया था ताकि नादिरशाह इसे अपनी बाँह में बाँध सके."

नादिरशाह ने दिल्ली में करवाया क़त्ले-आम

नादिरशाह ने करनाल के पास अपने डेढ़ लाख सैनिकों की बदौलत मुग़ल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला की दस लाख की सेना को हराया था. दिल्ली पहुंचने पर नादिरशाह ने ऐसा क़त्लेआम कराया, जिसके उदाहरण इतिहास में बहुत कम मिलते हैं.

मशहूर इतिहासकार सर एचएम इलियट और जॉन डॉसन अपनी किताब 'द हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया ऐज़ टोल्ड बाय इट्स ओन हिस्टोरियंस' में लिखते हैं, "जैसे ही नादिरशाह के चालीस हजार सैनिक दिल्ली में घुसे, अनाज के दाम आसमान पर चले गए. जब नादिरशाह के सैनिकों ने मोलभाव करना चाहा तो उनमें और दुकानदारों में झड़प शुरू हो गई और लोगों ने सैनिकों पर हमला करना शुरू कर दिया."

दोपहर तक नौ सौ फ़ारसी सैनिक मारे जा चुके थे. तब नादिरशाह ने दिल्ली की आबादी के क़त्लेआम का आदेश दिया. क़त्लेआम सुबह नौ बजे शुरू हुआ. सबसे ज्यादा लोग लाल किला, जामा मस्जिद, दरीबा और चांदनी चौक के आसपास मारे गए. कुल मिलाकर तीस हजार लोगों का कत्ल हुआ.

एक और इतिहासकार विलेम फ्लोर अपनी किताब 'न्यू फैक्ट्स ऑफ़ नादेर शाहज़ इंडिया कैंपेन' में लिखते हैं, "मोहम्मद शाह के सेनापति निजामुल मुल्क बिना पगड़ी के नादिरशाह के सामने गए.

उनके दोनों हाथ पीछे की तरफ उनकी ही पगड़ी से बंधे हुए थे. उन्होंने उनके सामने घुटनों के बल बैठकर कहा कि दिल्ली के लोगों से बदला लेने के बजाय वह उनसे अपना बदला लें.

नादिरशाह ने इस शर्त पर क़त्लेआम रुकवाया कि वह उनके दिल्ली छोड़ने से पहले उन्हें सौ करोड़ रुपए देंगे. अगले कुछ दिनों तक निजामुल मुल्क ने अपनी ही राजधानी को लूटकर वह धन चुकाया. संक्षेप में, "एक क्षण में 348 सालों से मुग़लों की जमा की हुई दौलत का मालिक कोई दूसरा हो गया."

नादिरशाह का पगड़ी बदल कर कोहिनूर हथियाना

विलियम डेलरिम्पल और अनीता आनंद ने कोहिनूर का इतिहास खंगालने में बहुत मेहनत की है.

डेलरिम्पल कहते हैं, "मैंने मुग़ल रत्नों के विशेषज्ञों से बातचीत कर अपने शोध की शुरुआत की. उनमें से अधिकतर की राय थी कि कोहिनूर के इतिहास के बारे में जो आम बातें प्रचलित हैं, वह सही नहीं हैं. नादिरशाह के पास जाने के बाद ही कोहिनूर पर पहली बार लोगों का ध्यान गया."

थियो मेटकाफ लिखते हैं कि दरबार की एक नर्तकी नूर बाई ने नादिरशाह से मुखबरी की कि मोहम्मद शाह ने अपनी पगड़ी में कोहिनूर को छिपा रखा है. नादिरशाह ने यह सुनकर मोहम्मद शाह से कहा कि आइए, दोस्ती की खातिर हम अपनी पगड़ियां आपस में बदल लें.

इस तरह कोहिनूर नादिरशाह के हाथ में आया. जब उसने पहली बार कोहिनूर को देखा तो देखता ही रह गया. उसी ने उसका नाम कोहिनूर यानी रोशनी का पहाड़ रखा."

दिल्ली की लूट अफगानिस्तान ले जाने का बहुत दिलचस्प बयान फ़ारसी इतिहासकार मोहम्मद काज़िम मारवी ने अपनी किताब 'आलम आरा-ए-नादरी' में लिखा है. मारवी लिखते हैं, "दिल्ली में 57 दिनों तक रहने के बाद 16 मई, 1739 को नादिरशाह ने अपने देश का रुख किया. अपने साथ वह पीढ़ियों से जुटाई गई मुग़लों की सारी दौलत ले गया. उसकी सबसे बड़ी लूट थी तख्त-ए-ताऊस, जिसमें कोहिनूर और तैमूर की रूबी जड़ी हुई थी.

लूटे गए सारे खजाने को 700 हाथियों, 400 ऊंटों और 17000 घोड़ों पर लादकर ईरान के लिए रवाना किया गया. जब पूरी सेना चेनाब के पुल से गुजरी तो हर सैनिक की तलाशी ली गई. कई सिपाहियों ने हीरे-जवाहरात जब्त किए जाने के डर से उन्हें जमीन में गाड़ दिया. कुछ ने तो उन्हें इस उम्मीद में नदी में फेंक दिया कि वह बाद में आकर उन्हें नदी की तली से उठाकर वापस ले जाएंगे."

1813 में कोहिनूर महाराजा रणजीत सिंह के पास पहुंचा

नादिरशाह के पास भी कोहिनूर बहुत दिनों तक नहीं रह पाया. उसकी हत्या के बाद यह हीरा उसके अफगान अंगरक्षक अहमद शाह अब्दाली के पास आया और कई हाथों से होता हुआ 1813 में महाराजा रणजीत सिंह के पास पहुंचा.

भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार में रखे वृत्तांत में बताया गया है, "महाराजा रणजीत सिंह कोहिनूर को दीवाली, दशहरे और बड़े त्योहारों के मौके पर अपनी बाँह में बांधकर निकलते थे. जब भी कोई ब्रिटिश अफसर उनके दरबार में आता था तो उसे यह हीरा खास तौर पर दिखाया जाता था. जब भी वह मुल्तान, पेशावर या दूसरे शहरों के दौरों पर जाते थे, कोहिनूर उनके साथ जाता था."

1839 में रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई. कड़े सत्ता संघर्ष के बाद 1843 में पांच वर्षीय दलीप सिंह को पंजाब का राजा बनाया गया. लेकिन दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध में अंग्रेज़ों की जीत के बाद उनके साम्राज्य और कोहिनूर पर अंग्रेज़ों का कब्जा हो गया. दलीप सिंह को उनकी माँ से अलग कर एक अंग्रेज़ दंपती के साथ रहने के लिए फतेहगढ़ किले भेज दिया गया.

लॉर्ड डलहौज़ी खुद कोहिनूर लेने लाहौर आए. वहां के तोशेखाने से हीरे को निकलवाकर डलहौज़ी के हाथों में रखा गया. उस समय उसका वजन था 190.3 कैरेट. लॉर्ड डलहौज़ी ने कोहिनूर को पानी के जहाज 'मेडिया' से महारानी विक्टोरिया को भेजने का फैसला किया. उस जहाज को रास्ते में कई परेशानियों का सामना करना पड़ा.

कोहिनूर ले जाने वाला जहाज़ मुसीबतों में फंसा

'कोहिनूर द स्टोरी ऑफ वर्ल्ड्स मोस्ट इनफेमस डायमंड' की सहलेखिका अनीता आनंद बताती हैं, "जब कोहिनूर को जहाज पर चढ़ाया गया तो जहाज के चालकों को इसकी भनक भी नहीं पड़ने दी गई कि वह अपने साथ क्या ले जा रहे हैं. मेडिया नाम के इस जहाज के इंग्लैंड रवाना होने के एक-दो हफ्तों तक तो कोई समस्या नहीं आई, लेकिन फिर कुछ लोग बीमार हो गए और जहाज पर हैजा फैल गया. जहाज के कप्तान ने चालकों से कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि मॉरिशस आने वाला है.

वहां हमें दवाई और खाना मिलेगा और सब कुछ ठीक हो जाएगा. लेकिन जब जहाज मॉरिशस पहुंचने वाला था, वहां के लोगों तक जहाज पर बीमार लोगों के बारे में खबर पहुंच गई. उन्होंने धमकी दी कि अगर जहाज उनके तट के पास भी पहुंचा तो वह उसे तोपों से उड़ा देंगे.

चालक दल, जो हैजा फैलने से बहुत मुश्किल में आ गया था, यही मनाता रहा कि वह किसी तरह इंग्लैंड पहुंच भर जाए. रास्ते में उन्हें एक बहुत बड़े समुद्री तूफान का भी सामना करना पड़ा, जिसने लगभग जहाज को दो हिस्सों में तोड़ दिया. जब वह इंग्लैंड पहुंचे, तब जाकर उन्हें पता चला कि वह अपने साथ कोहिनूर ला रहे थे और शायद इसी वजह से उन्हें इतनी मुसीबतों का सामना करना पड़ा."

लंदन में कोहिनूर का अभूतपूर्व स्वागत

जब कोहिनूर लंदन पहुंचा तो उसे क्रिस्टल पैलेस में ब्रिटेन की जनता के सामने प्रदर्शित किया गया. विलियम डेलरिम्पल कहते हैं, "कोहिनूर को ब्रिटेन ले जाए जाने के तीन साल बाद इसकी वहां नुमाइश की गई. द टाइम्स ने लिखा कि लंदन में इससे पहले लोगों का इतना बड़ा जमावड़ा कभी नहीं देखा गया. प्रदर्शनी जब शुरू हुई तो लगातार बूंदाबांदी हो रही थी.

जब लोग प्रदर्शनी के द्वार पर पहुंचे तो उन्हें अंदर घुसने के लिए घंटों लाइन लगानी पड़ी. यह हीरा पूरब में ब्रिटिश शासन की ताकत का प्रतीक बन गया था और ब्रिटेन की फौजी ताकत के बढ़ते असर को भी दिखाता था."

इस बीच फतेहगढ़ किले में रह रहे महाराजा दलीप सिंह ने लंदन जाकर महारानी विक्टोरिया से मिलने की इच्छा प्रकट की. रानी इसके लिए तैयार भी हो गईं. वहीं पर दलीप सिंह ने रानी विक्टोरिया के पास रखे कोहिनूर हीरे को उन्हें भेंट किया. अनीता आनंद बताती हैं, "रानी विक्टोरिया को हमेशा बुरा लगता था कि उनकी हुकूमत ने एक बच्चे के साथ क्या किया था.

वह दलीप सिंह को दिल से चाहती थीं. इसलिए उन्हें उनके साथ किए गए व्यवहार पर दुख था. हालांकि कोहिनूर उनके पास दो साल पहले पहुंच चुका था, लेकिन उन्होंने उसे सार्वजनिक तौर पर अभी तक नहीं पहना था. उन्हें लगता था कि अगर दलीप ने इसे देखा तो वह उनके बारे में क्या सोचेगा. उस जमाने में एक मशहूर चित्रकार हुआ करता था फ्रांज जेवर विंटरहाल्टर."

रानी ने उनसे दलीप सिंह का एक चित्र बनाने के लिए कहा, जिसे वह अपने महल में लगाना चाहती थीं. जब दलीप सिंह बकिंघम पैलेस के व्हाइट ड्राइंग रूम में मंच पर खड़े होकर अपना चित्र बनवा रहे थे, तब रानी ने एक सैनिक को बुलाकर एक बक्सा लाने के लिए कहा, जिसमें कोहिनूर रखा हुआ था.

उन्होंने दलीप सिंह से कहा कि मैं आपको एक चीज दिखाना चाहती हूं. दलीप सिंह ने कोहिनूर को देखते ही अपने हाथों में उठा लिया. उसे उन्होंने खिड़की के पास ले जाकर धूप में देखा. तब तक उस कोहिनूर की शक्ल बदल चुकी थी और उसे काटा जा चुका था.

अब वह वह कोहिनूर नहीं रह गया था, जिसे दलीप सिंह उस समय पहना करते थे जब वह पंजाब के महाराजा हुआ करते थे. थोड़ी देर तक कोहिनूर को देखते रहने के बाद दलीप सिंह ने महारानी से कहा, "योर मेजेस्टी, मेरे लिए यह बहुत सम्मान की बात है कि मैं यह हीरा आपको तोहफे में दूं." विक्टोरिया ने वह हीरा उनसे लिया और अपनी मृत्यु तक लगातार उसे पहने रखा.

दलीप सिंह अपनी माँ से मिलने भारत पहुंचे

विक्टोरिया के बहुत प्रिय होने के बावजूद कुछ सालों बाद दलीप सिंह ने इच्छा प्रकट की कि वह अपनी असली मां जिंदन कौर से मिलने भारत जाना चाहते हैं. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें भारत जाने की अनुमति दे दी. जिंदन तब नेपाल में रह रही थीं. उन्हें अपने बेटे से मिलाने कलकत्ता लाया गया. अनीता आनंद बताती हैं, "दलीप वहां पहले से ही पहुंचे हुए थे. रानी जिंदन कौर को उनके सामने लाया गया. जिंदन ने कहा कि वह अब कभी उनका साथ नहीं छोड़ेंगी.

वह जहां भी जाएंगे, वह उनके साथ जाएंगी. उस समय तक जिंदन अपनी आंखों की रोशनी खो चुकी थीं. उन्होंने जब दलीप सिंह के सिर पर हाथ फेरा तो उन्हें झटका लगा कि उन्होंने अपने बाल कटवा दिए हैं. दुख में उनकी चीख निकल गई. उसी समय कुछ सिख सैनिक ओपियम वार में भाग लेकर चीन से वापस आ रहे थे.

उन्हें जब पता चला कि जिंदन कलकत्ता पहुंची हुई हैं तो वह स्पेंस होटल के बाहर पहुंच गए, जहां जिंदन अपने बेटे दलीप से मिल रही थीं. उन्होंने जोर-जोर से नारे लगाने शुरू कर दिए, "बोलो सो निहाल, सत श्री अकाल." इससे घबराकर अंग्रेज़ों ने दोनों मां-बेटे को पानी के जहाज पर बैठाया और इंग्लैंड के लिए रवाना कर दिया."

दलीप सिंह धीरे-धीरे रानी विक्टोरिया के खिलाफ होते चले गए. उन्हें लगने लगा कि उनके साथ बेइंसाफी की गई है. उनके मन में यह बात भी घर कर गई कि वह अपने पुराने साम्राज्य को दोबारा जीतेंगे. वह भारत के लिए रवाना भी हुए, लेकिन अदन से आगे नहीं बढ़ पाए.

21 अप्रैल, 1886 को उन्हें और उनके परिवार को पोर्ट सईद में गिरफ्तार कर लिया गया. बाद में उन्हें छोड़ा गया, लेकिन उनका सब कुछ छीन लिया गया. 21 अक्टूबर, 1893 को पेरिस के एक बहुत मामूली होटल में उनकी लाश मिली. उस समय उनके साथ उनके परिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं था. इसके साथ ही महाराजा रणजीत सिंह का वंश हमेशा के लिए खत्म हो गया.

महारानी विक्टोरिया के बाद उनके बेटे महाराजा एडवर्ड सप्तम ने कोहिनूर को अपने ताज में नहीं लगाया. लेकिन उनकी पत्नी महारानी एलेक्ज़ेंड्रा के ताज में कोहिनूर को जगह मिली. कोहिनूर के साथ एक अंधविश्वास फैल गया कि जो कोई पुरुष उसे हाथ लगाएगा, ये उसे बरबाद कर देगा. लेकिन महिलाओं को इसे पहनने में कोई दिक्कत नहीं थी.

बाद में भावी राजा जार्ज पंचम की पत्नी राजकुमारी मेरी ने भी उसे अपने ताज के बीच में पहना. लेकिन इसके बाद महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने कोहिनूर को अपने ताज में जगह नहीं दी. आजकल दुनिया का ये सबसे मशहूर हीरा टावर ऑफ़ लंदन के जेवेल हाउज़ में रखा हुआ है.

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