ईरान की जंग के बीच 'बादलों की चोरी' की अफ़वाहें तेज़, क्या है हक़ीक़त?

    • Author, मैक्रो सिल्वा और लामीज़ अल्टालेबी
    • पदनाम, बीबीसी वैरिफ़ाई और बीबीसी न्यूज़ अरबी
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

सोशल मीडिया पर यह झूठा दावा तेज़ी से फैल रहा है कि ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल युद्ध की वजह से मध्य पूर्व में "बादल चोरी" अभियान प्रभावित हुआ है.

एक हफ्ते से ज़्यादा पहले अल-रशीद टीवी को दिए इंटरव्यू में इराकी सांसद अब्दुल्ला अल-ख़ैकानी ने दावा किया कि पड़ोसी देश तुर्की और ईरान ने कथित अमेरिकी कोशिशों को लेकर "शिकायत दर्ज" कराई है.

उनका आरोप था कि अमेरिका विमानों की मदद से बादलों को "तोड़ने" और "चुराने" की कोशिश कर रहा है.

बिना कोई सबूत पेश किए उन्होंने आगे कहा कि हाल के दिनों और महीनों में इराक़ में फिर से बारिश हुई है, क्योंकि अमेरिका ईरान में युद्ध को लेकर "व्यस्त" रहा है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी कोई ज्ञात तकनीक मौजूद नहीं है, जिससे इंसान बादलों को "चुरा" सके.

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इराक़ी मौसम विभाग के प्रवक्ता अमर अल-जाबिरी के अनुसार यह दावा 'न तो वैज्ञानिक और न ही तार्किक' है. उन्होंने यह भी कहा कि पिछले साल सितंबर में ही यह अनुमान लगाया गया था कि 2026 इराक़ में बारिश वाला साल होगा.

बीबीसी से संपर्क करने पर अल-ख़ैकानी ने फिर यह आरोप दोहराया कि 'वायुमंडलीय संशोधन का हथियार' इराक़ में 'जानबूझकर सूखा पैदा करने के लिए' इस्तेमाल किया गया है, लेकिन उन्होंने कोई सबूत नहीं दिया.

हालांकि उनकी बातें हाल के हफ़्तों में सोशल मीडिया पर फैल रहे दावों से मेल खाती हैं.

राजनीतिक हथियार बना 'क्लाउड सीडिंग'

तुर्की में कुछ यूज़र्स ईरान युद्ध और वहां हो रही तेज़ बारिश के बीच संबंध जोड़ रहे हैं. तुर्की के पर्यावरण, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, फ़रवरी में पिछले 66 सालों की सबसे ज़्यादा बारिश दर्ज की गई.

एक यूज़र ने दावा किया कि तुर्की में 'लगातार' बारिश हो रही है क्योंकि युद्ध की वजह से उनका हवाई क्षेत्र बंद है और इससे अमेरिका 'बादल चोरी' नहीं कर पा रहा. इस पोस्ट को दस लाख से ज़्यादा बार देखा गया.

कुछ अन्य यूज़र्स ने यह ग़लत दावा किया कि कई दशकों से ईरान में जारी सूखा, ईरान के मध्य पूर्व में अमेरिकी ठिकानों पर हमला करने के बाद 'सिर्फ़ पांच दिन में ख़त्म हो गया'.

संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य संस्थान के निदेशक कावेह मदनी कहते हैं, "इस सबकी वजह भरोसे की कमी और जलवायु की समझ की कमी है."

सोशल मीडिया पर ये बेबुनियाद दावे साझा करने वाले कहते हैं कि समस्या के केंद्र में 'क्लाउड सीडिंग' नामक प्रक्रिया है.

कावेह मदनी के अनुसार इसे राजनीतिक कारणों से हथियार बनाया जा रहा है.

क्लाउड सीडिंग एक मौसम संशोधन तकनीक है जिसमें मौजूदा बादलों को इस तरह प्रभावित किया जाता है कि वे ज़्यादा बारिश या बर्फ़ पैदा करें.

यह काम हवाई जहाज़ों से छोटे-छोटे कणों, जैसे सिल्वर आयोडाइड, को बादलों पर छोड़कर किया जाता है ताकि पानी की बूंदें बनें और बारिश हो.

पिछले साल ईरान में बहुत कम बारिश हो रही थी और लगभग सभी जलाशय सूख रहे थे. तब ईरानी अधिकारियों ने उर्मिया झील बेसिन के ऊपर क्लाउड सीडिंग करने का फैसला किया.

हालांकि इस तकनीक का इस्तेमाल अमेरिका, चीन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे कई अन्य देशों में किया गया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके प्रभाव बहुत सीमित हैं, और यह मौजूदा बादलों से होने वाली बारिश को 15% से ज्यादा नहीं बढ़ाता.

अबू धाबी स्थित ख़लीफ़ा यूनिवर्सिटी में पर्यावरण और भूभौतिकी विज्ञान लैब की प्रमुख प्रोफेसर डायना फ्रांसिस कहती हैं, "इसे ऐसे समझिए कि यह पहले से मौजूद बादल को हल्का सा धक्का देने जैसा है, मौसम को नियंत्रित करने जैसा नहीं."

"क्लाउड थेफ्ट" सिद्धांत के कुछ समर्थकों का आरोप है कि जब एक इलाके में क्लाउड सीडिंग की जाती है, तो पड़ोसी क्षेत्रों से बारिश छिन जाती है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि शोध इससे अलग संकेत देते हैं.

यूनिवर्सिटी ऑफ वायोमिंग में वायुमंडलीय विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. जेफ फ्रेंच कहते हैं, "इस बारे में जो सीमित सबूत हैं, वे बताते हैं कि यह प्रभाव बेहद छोटा है."

वास्तव में, वैज्ञानिकों का कहना है कि मौसम प्रणालियों की दिशा या तीव्रता को सीधे नियंत्रित करने वाली कोई तकनीक मौजूद नहीं है. इसके बजाय, वे बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन मध्य पूर्व में चरम मौसम की घटनाओं को अधिक संभावित और अधिक तीव्र बना रहा है.

... झूठे दावे आसानी से फैलते हैं

कोयले, गैस और तेल जैसे जीवाश्म ईंधन के जलाए जाने से दुनिया का तापमान बढ़ रहा है.

विश्व मौसम संगठन के अनुसार, मध्य पूर्व में तापमान हाल के दशकों में वैश्विक औसत दर से दोगुनी गति से बढ़ा है.

संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) का कहना है कि जलवायु परिवर्तन लंबी और ज़्यादा तेज़ गर्मी की लहरें (लू) पैदा कर रहा है.

साथ ही, बारिश का पैटर्न अधिक अनिश्चित होता जा रहा है. कुल मिलाकर बारिश कम बार हो रही है, लेकिन कभी-कभी कम समय में बहुत अधिक बारिश भी हो रही है, जिससे अचानक बाढ़ आ सकती है.

जॉर्डन की मुताह यूनिवर्सिटी में जल और पर्यावरण इंजीनियरिंग की सहायक प्रोफेसर डॉक्टर इस्रा तारावनेह कहती हैं, "ये परिस्थितियाँ जल सुरक्षा को लेकर जनता की चिंता बढ़ाती हैं."

विशेषज्ञ कहते हैं कि इस तरह के दबाव बढ़ने के चलते मौसम या जल संसाधनों को नियंत्रित करने की कथित कोशिशों के बारे में झूठे दावे आसानी से फैलते हैं.

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में जलवायु भौतिकी की पोस्ट-डॉक्टोरल शोध वैज्ञानिक डॉक्टर सारा स्मिथ कहती हैं, "जटिलता और अनिश्चितता अक्सर षड्यंत्रकारी सोच के लिए चुंबक होती हैं. 'लोग खाली जगह को किसी सरल और संतोषजनक चीज़ से भर देते हैं, लेकिन ऐसा करते हुए वे असली कहानी को खो देते हैं."

बीबीसी मॉनिटरिंग की निहान कल्ले की अतिरिक्त रिपोर्टिंग

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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