ममता बनर्जी ने क्या एसआईआर को सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर भूल की?

ममता बनर्जी

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इमेज कैप्शन, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस 100 सीटों का आंकड़ा भी नहीं छू पाई है
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देश के चार राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल के साथ एक केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के चुनाव नतीजे 4 मई को आए.

एक राज्य जहाँ बीजेपी लंबे समय से जीत का सपना संजोए हुई थी, उसका वो सपना पूरा हुआ और उसे पश्चिम बंगाल में जीत मिली.

वहीं, तमिलनाडु में महज साल भर पहले बनी पार्टी टीवीके ने उथल-पुथल मचा दिया.

हालाँकि टीवीके को स्पष्ट बहुमत तो नहीं मिला, लेकिन वह सबसे बड़ी पार्टी बनी और सरकार बनाने की दौड़ में सबसे आगे है.

असम में एक बार फिर बीजेपी की सरकार बनने जा रही है, वहीं केरल में एलडीएफ़ को हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूडीएफ़ को जीत मिली.

पुडुचेरी में एनडीए गठबंधन जीतने में सफल रहा.

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इस जीत के बाद कई सवाल उभरे, जैसे-आख़िर क्यों बहुत से लोग पश्चिम बंगाल का ये मूड समझने में नाकाम रहे?

कैसे तमिलनाडु में एक नई पार्टी ने राजनीतिक भूचाल ला दिया? ममता बनर्जी क्या अब दिल्ली पर निशाना साधेंगी? विपक्ष के सामने अब क्या विकल्प हैं? चुनाव आयोग की आलोचना होनी चाहिए या सराहना?

'द लेंस' के इस एपिसोड में इन सभी मुद्दों पर चर्चा की गई.

इस चर्चा में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा के साथ शामिल हुए पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा, हिंदुस्तान टाइम्स की राजनीतिक संपादक सुनेत्रा चौधरी और राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार.

इन्हीं दिलचस्प नतीजों पर बात के साथ हम आपके लिए वापस ला रहे हैं बीबीसी न्यूज़ हिंदी का वीकली शो द लेंस. 'द लेंस' का ये स्पेशल एपिसोड है. इसके बाद हर शनिवार ये शो आपके बीच आएगा.

द लेंस

चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल

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एपिसोड

समाप्त

इन विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठे हैं. एक वजह तो यह थी कि इतने बड़े पैमाने पर लोगों के नाम कटे. 90 लाख के आस-पास लोगों के नाम कटे. 27 लाख लोगों के नाम अपील में चल रहे थे.

दूसरी तरफ़ ऐसा कहा जाता रहा है कि पश्चिम बंगाल के चुनावों में पहले से भी हिंसा होती रही है. इस बार जो चुनाव हुए उसमें हिंसा नहीं दिखाई दी. चुनाव आयोग की भूमिका ख़ासतौर से पश्चिम बंगाल के चुनाव को देखते हुए क्या रही?

इस सवाल के जवाब में पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा कहते हैं, "जहाँ तक चुनाव शांतिपूर्वक ढंग से करवाने की बात है, मुझे लगता है कि चुनाव आयोग ने अच्छी तरह से यह चुनाव करवाया और इसकी दो वजह हैं. पहले छह-सात चरणों में चुनाव होता था. इस बार आयोग ने दो चरणों में चुनाव करवाया. यह भी है कि जो सरकार की तरफ से सुरक्षा बल उपलब्ध करवाए जाते हैं, वह बड़ी संख्या में चुनाव आयोग को उपलब्ध करवाए गए, जिससे वह उनको तैनात कर सका और दो चरणों में यह चुनाव करवा दिए."

"लेकिन विपक्ष का कहना है कि बहुत ज्यादा फ़ोर्स लगाई गई और इससे लोगों में एक डर का माहौल बना. यह सही है कि पहले की तुलना में ज़्यादा फ़ोर्स लगाई गई है, लेकिन उस आकलन से विवाद पैदा करना मेरे ख़्याल से उचित नहीं है."

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लवासा कहते हैं, "दरअसल जो असली टेस्ट है, वह यह है कि क्या लोग वोट डालने आ सके. क्या उनको वोट डालने में सहूलियत हुई या कोई दुविधा या अड़चन आई? उस पैमाने से अगर आप देखें तो मुझे नहीं लगता कि ऐसी शिकायतें बहुत ज़्यादा आई हैं. थोड़ी बहुत शिकायतें तो हमेशा रहती हैं."

"मुझे लगता है कि इस बार चुनाव आयोग ने जो तरीका अपनाया और जो उपलब्धि उन्होंने हासिल की है, उसके लिए उन्हें बधाई दी जानी चाहिए."

लेकिन सवाल चुनाव से पहले की तैयारियों को लेकर भी हैं.

लवासा कहते हैं, "यह कहना तो मुनासिब नहीं है कि चुनाव आयोग ने कोई संदेहास्पद काम किया है, लेकिन हाँ विवादास्पद चीज़ें ज़रूर हुई हैं. जैसे एसआईआर का मुद्दा है. यह पश्चिम बंगाल से पहले बिहार में हो चुका था, लेकिन बिहार में अलग प्रक्रिया अपनाई गई थी."

"पश्चिम बंगाल में एसआईआर में जो एक तो लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी का टूल इस्तेमाल किया और जितने लोगों को निकाला गया था, पूरी प्रणाली के दृष्टिकोण से उसमें सबसे आपत्तिजनक बात है कि एक ऐसी प्रक्रिया बनाई गई जिसमें 60 लाख लोग जिनका नाम वोटर लिस्ट में था उनको अंडर एडजुडिकेशन (विचाराधीन) दिखाया गया."

वह आगे कहते हैं, "हमने यह देखा कि कोर्ट के दखल से 700-800 जुडिशियल ऑफ़िसर लगाए गए और उसके बाद अपीलीय ट्राइब्यूनल बनाया. लेकन समय पर्याप्त नहीं था कि उन लोगों पर निर्णय किया जा सके. इस लिहाज से जिन 27 लाख लोगों को यह अवसर ही नहीं मिला कि वह अपनी बात समझा सकें या अपनी बात मनवा सकें."

"वह कामयाब होते या नहीं, वह अलग चीज़ है लेकिन वह अधर में लटक गए और उनको कहा गया कि कोई बात नहीं, इस बार आप वोट न दें, अगली बार दे सकते हैं. मैं समझता हूँ कि लोकतंत्र के लिए और वोटर्स के अधिकारों के लिहाज़ से एक आपत्तिजनक चीज़ है."

भारतीय निर्वाचन आयोग

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इमेज कैप्शन, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू के साथ (फ़ाइल फ़ोटो)

चुनाव प्रक्रिया के हिसाब से जिन लोगों का नाम नहीं आ पाया, उन 27 लाख लोगों के सामने अब आने वाले समय में क्या विकल्प है?

इस सवाल के जवाब में लवासा कहते हैं, "अब विकल्प तो जो सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आप अपीलीय ट्राइब्यूनल में जाएँ और हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी फ़ैसला दिया कि वोटिंग के 48 घंटे पहले जिन लोगों का निर्णय हो जाता है, उनके लिए एक सप्लीमेंट्री लिस्ट निकाली जाए. क़रीब डेढ़ हज़ार लोगों की लिस्ट जारी भी हुई. इससे बड़ा दिलचस्प आँकड़ा सामने आया कि जिन-जिन लोगों की अपील सुनी गई, उसमें से 98% के क़रीब लोग सही पाए गए."

"मैं यह समझता हूँ कि किसी वोटर को अपने संवैधानिक अधिकार से महरूम रखना प्रणाली के लिए अच्छी बात नहीं है."

राजनीति के लहज़े से और उसके नज़रिए से भी एक सवाल है. जो लोग भी चुनाव आयोग की आलोचना करते हैं या समर्थन करते हैं वे बहुत ही राजनीतिक नज़रिए से करते हैं. क्योंकि जहाँ-जहाँ बीजेपी हार जाती है, वहां कोई सवाल नहीं उठाता लेकिन जहाँ किसी क्रिटिकल चुनाव में बीजेपी जीत जाती है, वहाँ सवाल ज़्यादा उठते हैं. चुनाव आयोग को इसको कैसे टैकल करना चाहिए?

अशोक लवासा कहते हैं, "चुनाव आयोग की या किसी भी ऐसी संस्था की, जो एक तरह से रेफ़री होता है, उसकी विडंबना ही है कि जब स्पर्धा ज़्यादा होती है और कॉन्टेस्ट बड़ा हॉट होता है तब भी उनको सतर्क रहना पड़ता है. जब यह होता है कि एकतरफ़ा कॉन्टेस्ट हो जो कि कुछ हद तक मुनासिब या संभव है. तो मुमकिन है कि जो हार रहा है वह आप पर (रेफ़री पर) आरोप लगाएगा."

"चुनावी प्रक्रिया में वोटर्स के बाद राजनीतिक दल सबसे बड़े स्टेक होल्डर हैं. उनके साथ निरंतर खुला संवाद होना बहुत ज़रूरी है. और कुछ हद तक मुझे लगता है कि जैसे चुनाव आयोग ने एक ट्वीट कर दिया. किसी एक पार्टी को सचेत करते हुए तो उससे यह हुआ कि भाई आपने तो किसी को येलो कार्ड दिखा दिया जबकि खेल तो शुरू ही नहीं हुआ. तो उस पार्टी का पीड़ित महसूस करना कुछ हद तक जायज़ है."

लवासा चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच पैदा हुए तनाव को भी ठीक नहीं मानते.

वह कहते हैं, "पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच कुछ तनाव हुआ. जिस स्केल पर बाहर के लोगों को लगाया गया उससे ऐसा महसूस हुआ कि राज्य की मशीनरी और चुनाव आयोग एक पटरी पर नहीं है. यह एक अविश्वास का माहौल है यह काफ़ी नुक़सानदायक हो सकता है."

संजय कुमार का आकलन

राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार
इमेज कैप्शन, राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार

आँकड़ों के लिहाज से देखें और बीजेपी के धीरे-धीरे हो रहे विस्तार को देखें तो पश्चिम बंगाल बहुत बड़ा क़िला था जो बहुत लंबे समय से बीजेपी भेदना चाहती थी. अब बीजेपी का अगला लक्ष्य क्या होगा? वह कौन से राज्य हो सकते हैं, जहाँ उसके लिए संभावना है और वह उसको और मज़बूत करेगी?

चुनाव विश्लेषक संजय कुमार इस सवाल के जवाब में कहते हैं, "आपको याद है कि तेलंगाना के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था. विधानसभा चुनावों में उनका प्रदर्शन उतना अच्छा नहीं था."

"अब देखिए कैसे धीरे-धीरे बीजेपी का विस्तार हुआ. पहले उन्होंने उन राज्यों में सरकारें बनाई जहाँ कांग्रेस की सरकार रही थी, लंबे समय तक. कहीं पाँच साल, कहीं 10 साल, कहीं 15 साल. इसके बाद अब सिलसिला शुरू हुआ रीजनल पार्टी का."

संजय कहते हैं, "लोकसभा के साथ-साथ जब ओडिशा के चुनाव हुए थे तब वहाँ बीजेपी की सरकार बनी. इसके बाद अब आपने देखा कि बंगाल में किस तरह से बीजेपी ने अपना परचम लहराया, तो तेलंगाना ऐसा राज्य होगा जहाँ मुझे लगता है बीजेपी अच्छा प्रदर्शन कर सकती है और कांग्रेस और रीजनल पार्टी का जो क़िला है, उसे भेद सकती है."

लेकिन इसके साथ ही संजय कुमार यह भी कहते हैं कि बीजेपी के विस्तार की गुंज़ाइश दक्षिण भारत के एक और राज्य में है.

"इसके साथ ही साथ शायद केरल… क्योंकि केरल में भले ही इन चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन उतना अच्छा नहीं रहा, जितना वह उम्मीद करती थी. फिर भी लोकसभा के चुनाव में उनका प्रदर्शन अच्छा रहा था और उसके बाद तिरुवनंतपुरम में लोकल बॉडी इलेक्शन में भी उनका प्रदर्शन अच्छा रहा. और केरल लगभग तमिलनाडु के जैसा है जहाँ दो ध्रुवीय राजनीति है. यह केरल में भी है और तमिलनाडु में भी रही है. इसलिए केरल में भी उम्मीद बनती है."

संजय कहते हैं कि उत्तर भारत में अगले साल जब पंजाब में चुनाव होने वाले हैं और बीजेपी वहाँ भी दम लगाएगी, ज़ोर लगाएगी.

वह यह ध्यान दिलाते हैं कि बीजेपी दूसरी पार्टियों की जैसी नहीं है कि चुनाव के दो महीने पहले या तीन महीने पहले अपना कार्यक्रम शुरू करेगी या मेहनत शुरू करेगी.

वह कहते हैं, "मुझे लग रहा है कि जिन राज्यों का हम जिक्र कर रहे हैं, वहाँ बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने, उनके नेताओं ने अपना काम शुरू कर दिया होगा."

सुनेत्रा चौधरी का क्या कहना है

हिंदुस्तान टाइम्स की राजनीतिक संपादक सुनेत्रा चौधरी
इमेज कैप्शन, हिंदुस्तान टाइम्स की राजनीतिक संपादक सुनेत्रा चौधरी

दो साल पहले, आम चुनाव के नतीजों के बाद कहा जाने लगा था कि अब बीजेपी के ढलान का समय शुरू हो गया है. तो दो साल में ऐसा क्या बदल गया कि बीजेपी एक के बाद एक राज्यों के चुनाव जीतती जा रही है?

हिंदुस्तान टाइम्स की राजनीतिक संपादक सुनेत्रा चौधरी कहती हैं, "आप देखें तो पिछले एक साल में तृणमूल की सरकार बस एसआईआर पर कन्सन्ट्रेट हो गई थी. हम लोग जो बाहर से देख रहे थे, हमें लगा कि ममता बनर्जी बहुत लड़ रही हैं, लेकिन इसी से अब लग रहा है कि शायद ममता बनर्जी और तृणमूल की सरकार का ध्यान भटक गया. उन लोगों ने यही सोचा कि यही बहुत बड़ा मुद्दा है. उनके वोटर कटेंगे और लोग इसी पर जुटेंगे. लेकिन आँकड़ों से देखें तो ऐसा नहीं हुआ."

"एसआईआर का सबसे बड़ा प्रभाव यह लगा कि टीएमसी इस पर फ़ोकस हो गई. 2021 का चुनाव भी ममता बनर्जी के लिए मुश्किल था. 2021 के चुनाव से पहले उन्होंने कई कल्याणकारी योजनाएँ शुरू कीं लेकिन इस बार आप सोचें कि ममता बनर्जी का बड़ा आइडिया क्या था? आपको शायद याद न आए, यही याद आएगा कि 2026 का चुनाव ममता बनर्जी एसआईआर पर लड़ीं."

"चुनाव क्या है? चुनाव तो नेरेटिव है. लोगों को यह बताना है कि मेरी यह कहानी है और इस वजह से आप मुझे वोट दीजिए. लेकिन ममता यह नहीं कर पाईं, शायद उन्हें जिस चीज़ पर फ़ोकस करना चाहिए था वह नहीं कर पाईं."

बीजेपी एक के बाद एक राज्य में जीत रही है. तो क्या क्या देश में लोग सांप्रदायिक लाइंस पर इतना बँट गए हैं कि बीजेपी अपना नेरेटिव चला पा रही है. क्या सिर्फ़ यही नैरेटिव है जिसे लोग हाथों-हाथ ले रहे हैं या इसके साथ वेलफ़्यर स्कीम्स, प्रधानमंत्री मोदी की इमेज, हुत सारी चीज़ें एक साथ काम करती हैं? क्या हो रहा है देश में?

इसके जवाब में सुनेत्रा चौधरी कहती हैं, "बीजेपी का तो कोर इश्यू वही था, राम मंदिर और आर्टिकल 370... वह तो कुछ ग़लत नहीं कर रही क्योंकि यह उनका मुख्य मुद्दा है. सवाल यह है कि जो दूसरी पार्टी है वह क्या ऑफ़र कर रही है. उदाहरण के लिए हम उत्तर प्रदेश को देखते हैं क्योंकि लोकसभा में वहाँ पर समाजवादी पार्टी की सीटें ज़्यादा हैं और बीजेपी की कम रहीं."

"अखिलेश यादव जानते थे कि बीजेपी की पूरी हिंदुत्व के ध्रुवीकरण की रणनीति है तो उन्होंने अपने सिर्फ़ यादव-मुस्लिम के आधार का विस्तार किया. उन्होंने अपना नैरेटिव बदल दिया और पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नैरेटिव लाए. उन्होंने अपना पूरा नया आधार तय करने की कोशिश की. री-इन्वेंटिंग... विपक्ष को यह करना ही पड़ेगा."

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