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यूएई के ओपेक से बाहर होने का भारत पर क्या असर होगा
- Author, शुभांगी मिश्रा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
अमेरिका और इसराइल के ईरान के साथ युद्ध के कारण वैश्विक ईंधन बाजार में अनिश्चितता के बीच, संयुक्त अरब अमीरात ने मंगलवार को घोषणा की कि वह एक मई को पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) से बाहर हो जाएगा.
ओपेक 12 सदस्य देशों का एक समूह है, जो प्रमुख तेल उत्पादक देशों का कार्टेल है. ओपेक अपने सदस्य देशों के लिए तेल उत्पादन का कोटा तय करता है.
यूएई के बाहर होने का मतलब है कि अब वह तेल उत्पादन पर लगाए गए इस गठबंधन के कोटा सिस्टम से बंधा नहीं रहेगा. यूएई 2016 में बने ओपेक प्लस गठबंधन से भी बाहर हो जाएगा. इसमें ओपेक के सभी सदस्य देशों के साथ 10 अतिरिक्त देश शामिल हैं.
यूएई के ऊर्जा मंत्रालय ने एक्स पर जारी बयान में कहा कि यह फ़ैसला 'राष्ट्रीय हितों की जरूरतों को देखते हुए' लिया गया है.
बयान में कहा गया, "यह फ़ैसला संयुक्त अरब अमीरात की दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि के अनुरूप है और इसके ऊर्जा क्षेत्र के विकास को दिखाता है. इसमें घरेलू ऊर्जा उत्पादन में निवेश बढ़ाने में तेजी लाना शामिल है. साथ ही वैश्विक ऊर्जा बाजार के भविष्य को देखते हुए एक जिम्मेदार और भरोसेमंद उत्पादक के रूप में अपनी भूमिका के प्रति प्रतिबद्धता को मजबूत करना भी शामिल है."
यूएई ने यह क़दम ऐसे समय उठाया है जब ईरान के साथ युद्ध के कारण तेल का व्यापार ख़ासा प्रभावित हुआ है. यह फ़ैसला सऊदी अरब के साथ यूएई के बढ़ते मतभेदों के बीच भी आया है. सऊदी अरब को ओपेक का वास्तविक नेता माना जाता है.
भारत पर असर
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम के डिप्टी डायरेक्टर विवेक मिश्रा कहते हैं कि ऊर्जा की बड़ी जरूरत वाले देश भारत के लिए यूएई का इस गठबंधन से बाहर होना "अच्छी ख़बर" हो सकती है, हालांकि इस पर अंतिम निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाज़ी होगी.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "संयुक्त अरब अमीरात भारत का मज़बूत साझेदार है. उम्मीद है कि वह अपने कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाकर 50 से 60 लाख बैरल प्रतिदिन तक ले जाएगा. यह हमारे लिए सकारात्मक है, क्योंकि हम रणनीतिक साझेदार भी हैं और कच्चे तेल के उपभोक्ता भी."
विशेषज्ञों का कहना है कि ओपेक से यूएई का बाहर होना भारत के लिए सकारात्मक असर डाल सकता है.
फरवरी 2026 तक भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 91 प्रतिशत आयात करता था. इनमें से 54 प्रतिशत आयात मध्य पूर्व के देशों से होता है.
यूएई लगातार भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में रहा है. भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 10 प्रतिशत वहीं से आता है.
'मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट नई दिल्ली' की वरिष्ठ फेलो मीना सिंह रॉय ने कहा, "यूएई भारत का रणनीतिक साझेदार है. अगर वह अपना उत्पादन बढ़ाता है, तो अतिरिक्त तेल की आपूर्ति कर सकेगा क्योंकि अब वह ओपेक के नियमों से बंधा नहीं रहेगा."
उन्होंने यह भी कहा कि यूएई पहले से ही यह कदम उठाने की तैयारी में था.
मीना सिंह रॉय ने कहा, "तेल की मांग बढ़ने की स्थिति में यूएई अपनी संभावनाएं खुली रखना चाहता है. यह मांग मुख्य रूप से चीन, जापान, कोरिया और भारत से आती है."
विवेक मिश्रा ने यह भी कहा कि जब तक होर्मुज़ स्ट्रेट बंद रहेगा, तब तक यूएई के ओपेक छोड़ने का कोई तात्कालिक असर नहीं होगा. उन्होंने कहा कि यूएई के पूर्वी तट पर स्थित फुजैराह बंदरगाह अभी इतनी क्षमता नहीं रखता कि वह लाखों बैरल तेल का निर्यात कर सके.
वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का 25 प्रतिशत और वैश्विक एलएनजी निर्यात का 20 प्रतिशत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से गुजरता है. 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद से यह स्ट्रेट प्रभावी रूप से बंद है.
तेल और गैस की आवाजाही में आई बाधा के कारण भारत की एलपीजी और एलएनजी आपूर्ति भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई है.
क्लाइमेट ट्रेंड्स की संस्थापक आरती खोसला ने कहा कि यूएई का ओपेक से बाहर होना तेल की कीमतों को कम करने में मदद कर सकता है.
आरती खोसला ने कहा, "यह बदलाव भारत को राहत दे सकता है क्योंकि यूएई के साथ हमारी एक व्यापक व्यापारिक साझेदारी है. स्थिर आपूर्ति और कीमतों में कमी के अलावा, यह फिलहाल भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताओं में भी राहत दे सकता है."
ओपेक और ओपेक प्लस का इतिहास
ओपेक एक स्थायी अंतर-सरकारी संगठन है, जिसका मुख्यालय ऑस्ट्रिया के वियना में है. इसकी वेबसाइट के अनुसार इसका उद्देश्य सदस्य देशों की पेट्रोलियम नीतियों को एकजुट करना और तेल बाजार को स्थिर बनाए रखना है.
इसकी स्थापना ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने सितंबर 1960 में बग़दाद में की थी. इसके बाद यह 12 देशों का समूह बन गया, जिसमें अब तक संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल था.
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार, ओपेक देश दुनिया के 35 प्रतिशत कच्चे तेल का उत्पादन करते हैं. दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक सऊदी अरब इस समूह का वास्तविक नेता माना जाता है.
यह समूह कई दशकों से सदस्य देशों को दिए गए कोटा के आधार पर आपूर्ति बढ़ाकर या घटाकर तेल की कीमतों को नियंत्रित करता रहा है.
यह कार्टेल उस समय बना था जब वैश्विक बाज़ार पर 'सेवन सिस्टर्स' नाम की ताकतवर पश्चिमी कंपनियों का दबदबा था. इनमें एक्सॉन, शेल, मोबिल, टेक्साको, ब्रिटिश पेट्रोलियम, स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ कैलिफोर्निया और गल्फ शामिल थे.
2016 में ओपेक प्लस का गठन हुआ, जिसमें रूस और बहरीन सहित 10 अतिरिक्त देश शामिल हैं.
यूएई इस गठबंधन से बाहर होने वाला पहला देश नहीं है. इससे पहले कतर, इंडोनेशिया, इक्वाडोर, अंगोला और गैबॉन भी इससे बाहर हो चुके हैं.
ओपेक में यूएई चौथा सबसे बड़ा तेल उत्पादक है और 2024 में वह प्रतिदिन 29.2 लाख बैरल तेल उत्पादन कर रहा था.
यूएई के बाहर होने के फैसले के बाद ऑयल एंड गैस जर्नल ने मंगलवार को बताया कि यूएई और ओपेक नेतृत्व के बीच उत्पादक कोटा को लेकर लंबे समय से तनाव बना हुआ था.
हाल के वर्षों में यूएई ने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में निवेश किया है, जो उसे ओपेक सदस्य के रूप में दिए गए कोटे से अधिक है.
यह फ़ैसला सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच संबंधों में आई खटास को भी दिखाता है. दोनों देश खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्य हैं, जो छह अरब देशों का एक संगठन है.
मीना सिंह रॉय कहती हैं, "खाड़ी सहयोग परिषद कभी एकजुट ताक़त नहीं रही है. सऊदी अरब और यूएई इस क्षेत्र के दो बड़े खिलाड़ी हैं, इसलिए सहयोग भी होगा और प्रतिस्पर्धा भी. लेकिन वे अपनी भौगोलिक स्थिति नहीं बदल सकते."
(सुमेधा पाल की अतिरिक्ति रिपोर्टिंग)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित