नोएडा में श्रमिकों के प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा के बाद पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल

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- Author, प्रेरणा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश की औद्योगिक नगरी नोएडा में श्रमिकों के हिंसक विरोध प्रदर्शन के एक सप्ताह बाद भी कई एक्टिविस्ट, पत्रकार और मज़दूर संगठनों से जुड़े कुछ लोगों समेत दर्जनों मज़दूर जेल में बंद हैं.
बीते 13 अप्रैल को वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हुए व्यापक प्रदर्शन के हिंसक हो जाने के बाद नोएडा पुलिस ने क़रीब 300 लोगों को गिरफ़्तार किया था. हालांकि, ये कुछ गिरफ़्तारियां उसके बाद भी हुई हैं.
पुलिस जहां इस प्रदर्शन के पीछे साज़िश की आशंका जता रही है, वहीं सिविल सोसायटी संगठनों ने जिन परिस्थितियों में और जितने बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां हुई हैं, उन पर सवाल उठाए हैं.
नोएडा प्रदर्शन के बाद गिरफ़्तार लोगों के परिजनों से हमने बात करने की और ये जानने की कोशिश की कि अभी क्या हालात हैं.
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इस बीच दिल्ली के प्रेस क्लब में बीते हफ़्ते दो प्रेस कॉन्फ़्रेंस आयोजित की गईं. इसमें पहुंचे मज़दूर संगठनों ने दावा किया कि पुलिस ने घरों पर बिना अनुमति छापे मारे और पूछताछ के नाम पर लोगों का उत्पीड़न किया.
मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया कि राज्य के बाहर गिरफ़्तारी से जुड़े नियमों और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया गया है.
हमने नोएडा के अलग-अलग इलाक़ों में रहने वाले उन परिवारों से संपर्क करने की कोशिश की, जिनका कोई अपना गिरफ़्तार हुआ.
लेकिन जो पुलिस की गिरफ़्तारी से रिहा हो गए और जो अब भी सलाखों के पीछे हैं, दोनों ही तरह के परिवारों ने हमसे कैमरे पर बात करने से इनकार कर दिया.
'सब डरे हुए हैं'

पहचान छुपाने की शर्त पर हम एक परिवार को बात करने के लिए राज़ी कर पाए. इस परिवार की एक बेटी अभी सलाखों के पीछे है.
उनके भाई हमसे कहते हैं, ''कोई मीडिया से बात करने के लिए तैयार नहीं होगा. सब डरे हुए हैं. ग़रीब परिवार के लोग ये जोखिम नहीं उठा सकते. आप कुछ भी कर लो, अब वो नहीं बोलेंगे, चाहे उनको थप्पड़ मार दो, चाहे उनको कुछ भी करो, उनके साथ कोई भी क्राइम होता रहेगा. वो बोलने को तैयार नहीं होंगे.''
लड़की की मां दावा करती हैं, "14 अप्रैल को सुबह छह बजे पुलिस उनके घर पहुंची और उनकी बेटी को उठा ले गई. न तो कोई अरेस्ट वारंट दिखाया गया, न ही कोई जानकारी दी गई कि वो उसे किस थाने ले जा रहे हैं. वह रातभर थाने-दर-थाने अपनी बेटी को ढूंढती रहीं."
सुबह मीडिया की मदद से उन्हें पता चला कि उनकी बेटी को नोएडा की कासना जेल ले जाया गया है.
लड़की के भाई ने आरोप लगाया, "पहले पुलिस ने कहा कि उन्होंने उनकी बहन के ख़िलाफ़ धारा 151 में चालान किया है."
उन्होंने कहा कि धारा 151 का इस्तेमाल शांतिभंग की आशंका होने पर किया जाता है. फिर पुलिस ने कहा कि प्रिवेंटिव अरेस्ट है, एक-दो दिनों में छोड़ देंगे.
उनके अनुसार, "प्रिवेंटिव अरेस्ट यानी किसी अपराध को होने से पहले ही रोकने के लिए की गई गिरफ़्तारी. मगर जब एक-दो दिन बीत गए तो 109 (हत्या की कोशिश) जैसी संगीन धारा में मुकदमा दर्ज कर दिया गया."
हमने पूछा, "आपकी बहन ने क्या किया था?"
उन्होंने कहा, ''वह घरों में काम करती थी. 13 अप्रैल को जब वह काम के लिए सोसाइटी में जा रही थी, तब दो-तीन हज़ार घरेलू कामगार प्रोटेस्ट कर रही थीं. उनकी मांग थी कि सैलरी बढ़ाई जाए और छुट्टी दी जाए."
"वही बात मेरी बहन ने मीडिया के कैमरे पर रिपीट कर दी. यही दोष था उसका. ऐसे मुकदमे लगाए गए हैं कि जैसे तलवार लेकर गई हो, कोई मारपीट की हो, हिंसा की हो...वो न तो यूनियन लीडर थी, न तो कोई हथियार लेकर गई थी."
ये परिवार अब बेल के लिए नोएडा के सेशन्स कोर्ट के चक्कर काट रहा है.
कुल गिरफ़्तारियों की जानकारी नहीं दी गई

लेकिन लेबर राइट्स एक्टिविस्ट्स और रिसर्चर राखी सहगल दावा करती हैं कि कई परिवारों को अब तक ये भी नहीं पता कि उनके अपने किस धारा में गिरफ़्तार हुए हैं.
वह कहती हैं, ''आपने अगर गिरफ़्तार किया, प्रिवेंटिव डिटेंशन की है...तो आपकी ज़िम्मेदारी बनती है कि आप इसकी सूचना परिवार को दें. ये उनका क़ानूनी अधिकार है. यहां तो रिमांड भी हो गई और फ़ैमिली मेंबर को नहीं पता कि बच्चा जेल के अंदर है."
"अभी तक हमारे पास कोई लिस्ट नहीं है कि कितने लोग अभी भी जेलों में हैं, कितने बंदे डीटेन हुए थे, उनमें कितनी महिलाएं थीं, कितने बच्चे थे क्योंकि कुछ जुवेनाइल भी उठाए गए हैं.''
उन्होंने दावा किया कि हमने नोएडा पुलिस से प्रदर्शन के बाद हुई हिंसा से जुड़ी एफ़आईआर और कुल गिरफ़्तारियों की जानकारी मांगी, लेकिन ये उपलब्ध नहीं कराई गई.
हालांकि, इससे पहले नोएडा की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने बीबीसी को बताया था कि सात एफ़आईआर दर्ज हुई हैं और 300 से ज़्यादा लोग गिरफ़्तार किए जा चुके हैं. लेकिन इसके बाद भी गिरफ़्तारियां हुई हैं.
पुलिस ने साज़िश के आरोप में आदित्य आनंद को मुख्य अभियुक्त बनाया है. उन्हें 19 अप्रैल को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ़्तार किया गया.
गिरफ़्तारी के बाद यूपी की स्पेशल टास्क फ़ोर्स ने एक प्रेस नोट जारी कर बताया, ''श्रमिक आंदोलन की आड़ में हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने की घटना को अंजाम देने वाले प्रमुख साज़िशकर्ताओं में से एक अभियुक्त आदित्य आनंद उर्फ़ रस्टी को गिरफ़्तार कर लिया गया है.''
लेकिन आदित्य के भाई केशव का कहना है कि 'आदित्य केवल मज़दूरों के हक़ की आवाज़' उठा रहे थे.
कई एक्टिविस्ट गिरफ़्तार

केशव कहते हैं, ''एक संवेदनशील इंसान की तरह आदित्य ने भी यही सोचा कि श्रमिकों के प्रोटेस्ट में शामिल हों. इस प्रोटेस्ट को आयोजित करने की तो हमारी ताक़त ही नहीं थी. हम तो बस उनके साथ खड़े थे. साथ खड़े होने के क्रम में आदित्य श्रमिकों को एकजुट होने की अपील कर रहे थे, लेकिन शांति के साथ."
"वह बार-बार अपील करते रहे कि हिंसा नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे कंपनियों और पुलिस को ही फ़ायदा होगा. उन्होंने श्रमिकों से कहा था कि 'मुनाफ़े का चक्का जाम होना चाहिए' और कोई चक्का जाम नहीं होना चाहिए. और इससे उनका मतलब ये था कि अगर मज़दूर काम पर जाना बंद कर देंगे तो उनका शोषण करने वाले लोगों के मुनाफ़े पर मार पड़ेगी."
उन्होंने कहा, "प्रोटेस्ट तो ऐसे ही किया जाता है. लेकिन इसके बाद पूरी मीडिया ने मिलकर आदित्य को और उनके दूसरे साथी जैसे रूपेश रॉय को, जो एक ऑटोचालक हैं, सत्यम वर्मा जो एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने भगत सिंह पर किताब लिखी है, आकृति, मनीषा, हिमांशु, जो कि छात्र हैं...सबको देश के दुश्मन के तौर पर पेश कर दिया."
रूपेश रॉय, एक मज़दूर संगठन मज़दूर बिगुल से जुड़े हैं. मज़दूर बिगुल ने अपने फ़ेसबुक पर एक बयान जारी कर कहा कि रूपेश को घटना के दो दिन पहले 11 अप्रैल को ही गिरफ़्तार कर लिया गया था. बयान में पुलिस हिरासत के दौरान रूपेश का उत्पीड़न करने का आरोप लगाया गया है.
केशव ने कहा कि पुलिस के पास अगर एक भी सबूत है तो वो दिखा दे, "इससे उलट अगर आप हमसे सबूत मांगेंगे तो हम ऐसे कई वीडियो आपके सामने पेश कर सकते हैं, जिनमें आदित्य बार-बार शांति से प्रदर्शन करने की अपील करते सुनाई देते हैं.''
यूपी सरकार और पुलिस का दावा है कि नोएडा हिंसा एक सुनियोजित साज़िश का हिस्सा हो सकती है.
प्रदेश के श्रम मंत्री अनिल राजभर ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा था, ''जो नोएडा में हुआ है, उसमें किसी बड़ी और गहरी साज़िश की बू आ रही है. पुलिस जांच कर रही है. आप देखिएगा, जब दो-तीन दिनों बाद बात बाहर आ जाएगी तो ऐसे लोग बेनकाब हो जाएंगे, जो उत्तर प्रदेश के विकास को पचा नहीं पा रहे.''
प्रशासन का क्या कहना है?

वहीं नोएडा की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने दावा किया कि प्रदर्शन से कुछ दिनों पहले कई नए सोशल मीडिया अकाउंट्स और व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए गए थे.
समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने दावा किया, "पिछले तीन दिनों में क्यूआर कोड की मदद से कई व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए गए हैं. इनमें से कई सोशल मीडिया अकाउंट्स फ़र्ज़ी हैं. और जिस तकनीक का इस्तेमाल इन ग्रुप्स को बनाने के लिए किया गया है, उसे देखकर पहली नज़र में लगता है कि ऐसे ग्रुप्स हैं, जिनकी फंडिंग होती है और जिनका इस्तेमाल देश के अलग-अलग हिस्सों में अस्थिरता और हिंसा फैलाने के लिए किया जाता है."
श्रमिक अधिकारों की एक्टिविस्ट राखी सहगल पुलिस अधिकारी और श्रम मंत्री के इन बयानों पर सवाल उठाती हैं.
उनका कहना है, ''आपने इतने सालों से न्यूनतम वेतन नहीं बढ़ाए. जहां बढ़ाते हैं, वहां लागू नहीं करते, तो साज़िशकर्ता तो आप हो गए न! आपने अधिकार संपन्न नागरिकों को बंधुआ मज़दूर बना दिया है. एक तरफ़ आप वर्कर्स को बेबस करते जा रहे हैं, दूसरी तरफ़ लंबे समय से यूनियन मूवमेंट पर आप हमला करते रहे."
"तो ये जो इतना एंटी यूनियन रवैया रहा है पूंजीपति, उद्योगपति और सरकार का...इससे श्रमिकों के सामने कोई संस्थागत तंत्र बचा ही नहीं, जहां वह अपनी आवाज़ उठा सकें. ऐसे में गुस्सा कहां जाएगा? अगर अनुभवी यूनियन लीडर उनके साथ होते इस प्रदर्शन में, तो हिंसा की नौबत ही नहीं आती.''
मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल ने क्या कहा

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मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) दिल्ली ने उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री धर्मवीर प्रजापति और राज्य के वरिष्ठ जेल अधिकारियों को पत्र लिखकर मज़दूरों के उत्पीड़न को लेकर चिंता ज़ाहिर की है.
पीयूसीएल ने बयान जारी कर कहा है कि 'ज़िला जेल कासना में हिरासत के दौरान हिंसा और वसूली के आरोप 'गंभीर चिंता' का विषय है.
बयान के अनुसार, "हिरासत में रखे गए युवकों के साथ जेल परिसर के अंदर बार-बार शारीरिक हमला किया जा रहा है. इन आरोपों ने जेल में सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी प्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं."
संगठन ने कहा कि हिरासत में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की ज़िम्मेदारी है और इसमें किसी भी तरह की विफलता संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगी.
पीयूसीएल ने इस मामले में स्वतंत्र जांच की मांग की है.
वेतन बढ़ा, पर असर लंबा रहने की आशंका

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वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण का कहना है कि साज़िश के आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए न्यायिक जांच ज़रूरी है.
उनके मुताबिक़, ''लोग इसी की मांग कर रहे हैं कि आप इस पर न्यायिक जांच करा लीजिए. और जो जज अप्वाइंट हो, वो सरकार न करे, बल्कि हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का चीफ़ जस्टिस करे. और फिर पूरी जांच करा लीजिए कि किसने किया, क्या किया.''
वह आरोप लगाते हैं कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को दबाने के लिए सरकार साज़िश जैसे हथकंडों का इस्तेमाल करती है.
वेतन में बढ़ोतरी, ओवरटाइम का भुगतान और बेहतर कामकाजी हालात की मांगों के साथ अप्रैल की शुरुआत में मानेसर से शुरू हुआ प्रदर्शन 13 अप्रैल तक नोएडा पहुंचा और एक बड़े विरोध में बदल गया.
इससे पहले ही हरियाणा सरकार ने वेतन बढ़ोतरी की मांग को स्वीकार कर लिया था और अब उत्तर प्रदेश सरकार ने भी नोएडा में न्यूनतम मज़दूरी 11,313 रुपये से बढ़ाकर 13,690 रुपये कर दी है.
दूसरी मांगों को भी पूरा करने की सहमति दी गई है. लेकिन ज़मीन पर इन फ़ैसलों का असर कितना और कब तक दिखेगा, ये अभी साफ़ नहीं है.
दूसरी तरफ़ वे मज़दूर हैं, जिन्होंने आवाज़ उठाई और अब सलाखों के पीछे हैं. कुछ ऐसे भी हैं, जिनका दावा है कि उनका इस आंदोलन से कोई सीधा राब्ता नहीं था, फिर भी वे गिरफ़्तारी झेल रहे हैं.
उनके सामने अब दोहरी चुनौती है. एक ओर घर चलाने की और दूसरी ओर न्याय की लड़ाई लड़ने की.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
































