कानपुर के वकील प्रियांशु की मौत से पहले क्या हुआ था, परिवार ने क्या बताया?

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- Author, गौरव गुलमोहर
- पदनाम, कानपुर से बीबीसी हिन्दी के लिए
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
(इस घटना के कुछ ब्योरे आपको विचलित कर सकते हैं.)
कानपुर के रहने वाले 23 साल के प्रियांशु श्रीवास्तव की 23 अप्रैल को कचहरी में मौत हो गई थी.
वो पेशे से वकील थे. इस मामले की जांच में शामिल पुलिस अधिकारी ने बताया है कि दो पन्नों का एक कथित सुसाइड नोट भी सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया था, जिसकी वो जांच कर रहे हैं.
पुलिस के मुताबिक इस नोट में पिता पर मानसिक प्रताड़ना और सख़्ती बरतने के आरोप के साथ ही बचपन की कड़वी यादों का भी ज़िक्र है.
हालांकि, प्रियांशु के पिता का दावा है कि उन्हें अपने बेटे की सुरक्षा की चिंता रहती थी और वो उनका बहुत ख़याल रखते थे.
(आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुज़र रहे हैं तो भारत सरकार की हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.)
पूरा मामला क्या है?

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पेशे से वकील प्रियांशु अपने पिता के चैंबर में उनके साथ बैठते थे. वो साइबर कैफ़े का अतिरिक्त काम भी करते थे.
कानपुर के डीसीपी ईस्ट सत्यजीत गुप्ता ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी को बताया, "घटना का सीसीटीवी फ़ुटेज हमें मिला है. वो उसमें फ़ोन पर बात करते दिखे हैं और थोड़ी देर बाद आत्महत्या कर ली. उन्होंने आत्महत्या करने से पहले एक सुसाइड नोट भी सोशल मीडिया पर डाला था, जिसकी हम जांच कर रहे हैं."
एसीपी आशुतोष कुमार सिंह ने बताया, "प्रथमदृष्टया यह आत्महत्या की घटना है. परिवार की ओर से अभी तक कोई तहरीर नहीं दी गई है."
दूसरी ओर कानपुर शहर से दस किलोमीटर दूर बर्रा में दो कमरों के घर में अब प्रियांशु के पिता राजेंद्र कुमार श्रीवास्तव अपनी पत्नी और बेटी के साथ रह रहे हैं.
पुलिस ने बताया कि सोशल मीडिया पर जो दो पन्नों का नोट मिला है, उसमें प्रियाशुं ने पिता पर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं.

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पुलिस के मुताबिक सुसाइड नोट में बचपन के कड़वे अनुभवों के ज़िक्र के अलावा यह आरोप लगाया गया है कि वो एक तरह के मानसिक टॉर्चर से गुज़र रहे थे.
प्रियांशु की मां नीतू श्रीवास्तव कहती हैं कि उनके पति और वो दोनों बच्चों का ख़याल रखते थे और बचपन की जिन घटनाओं का ज़िक्र नोट में है, उसमें उनके पति की कोई भूमिका नहीं थी.
राजेंद्र कुमार श्रीवास्तव कहते हैं, "हम लोग हमेशा बहुत केयर करते थे. अगर वो बोले हम आज दोस्तों के साथ ढाबे पर खाना खाने जाएंगे तो हम मना कर देते थे क्योंकि वो बहुत व्यस्त सड़क है. हम उसे कहते थे कि ऑनलाइन मंगवा कर खा लो."
उन्होंने आगे कहा, "उसकी सुरक्षा के लिए हम लोग बहुत सचेत रहते थे. अगर कहीं रात आठ बजे जा रहा होता तो हम लोग पूछते थे कहाँ जा रहे हो? किसके साथ जा रहे हो? अपने दोस्त का नाम बता दो, फिर जाओ."
घटना वाले दिन क्या हुआ था?

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राजेंद्र कुमार श्रीवास्तव बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताते हैं, "घटना वाले दिन मैं ऑफ़िस के लिए निकल रहा था. मैंने दरवाज़ा बंद किया तो पर्दा बाहर रह गया था. जब वो (प्रियांशु) बाहर निकलने के लिए दरवाज़ा खोला तो दरवाज़े के साथ-साथ पर्दा भी खुलता गया. तो उसने चिल्लाकर बोला कि किस बेवकूफ़ ने इस तरह पर्दा लगाया है. मैंने उसे बुलाकर बोला कि यही संस्कार तुमने सीखा है? तुमको पढ़ाया-लिखाया आज इस तरह बात कर रहे हो? हम बेवकूफ़ हैं?"
परिवार के लोगों ने बताया कि प्रियांशु और उनके पिता के संबंध हमेशा से ही तनावपूर्ण रहे थे. लेकिन वो अपनी मां और बहन के बेहद क़रीब था और बहन ने ही उसे फ़ोन पर समझाने की कोशिश भी की थी.
गरिमा श्रीवास्तव अपने भाई को याद करते हुए बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहती हैं, "भैया मेरा बहुत अच्छा था. सबको बहुत प्यार करता था. लेकिन उसके ऊपर काम का बोझ ज़्यादा था. दो-तीन साल पुराने काम उसके पेंडिंग थे. बहुत लोगों का एक-डेढ़ लाख का काम कर दिया लेकिन उनसे पैसा नहीं ले पाया. उसे टेंशन थी."
वो कहती हैं, "घटना वाले दिन मैं परीक्षा देने गई थी. घर पहुंची तो देखा भैया बहुत परेशान था, रो रहा था. शायद पिता जी ने डांटा हो. उसको लगता था कि पिता जी हमारे पीछे पड़े रहते हैं, हमें परेशान करते हैं. उसका व्यवहार ऐसा था कि एक पल को अच्छा हो जाए, एक पल को ख़राब हो जाए."
मनोवैज्ञानिक क्या कहते हैं?

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पुलिस ने बताया है कि नोट में प्रियांशु ने कई घटनाओं का ज़िक्र किया गया है.
भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के पूर्व सदस्य और मनोवैज्ञानिक प्रोफ़ेसर आरसी त्रिपाठी ने बातचीत में कहा कि इस घटना को संबंधित व्यक्ति के बचपन की किसी एक घटना से जोड़कर देखना सही नहीं होगा.
उन्होंने कहा, "बचपन की घटना ही एकमात्र कारण नहीं है. अभी हाल में ऐसी कोई घटना घटी होगी. बच्चों को डांटा जाता है और सभी के माता-पिता ने किया होगा. दूसरों के सामने उसका जो अपमान था, वह अधिक महत्वपूर्ण है. उसका असर ज़्यादा हुआ होगा."
"भारतीय समाज में माता-पिता का संबंध महत्वपूर्ण है. वह अगर टूट जाए तो बच्चा भी टूट सकता है. वयस्क भी टूट सकता है. यहां यह समझ में आ रहा है कि वह कह रहा है कि पिता ने उसे वह सम्मान नहीं दिया जिसका उसे हक़ था."
वो कहते हैं, "अगर माता-पिता बच्चों से जुड़ाव रखने के बारे में सोचते हैं तो उन्हें बच्चों को एक व्यक्ति (इंडिविजुअल) की तरह ट्रीट करने की ज़रूरत है. उनकी अपनी ज़िंदगी है. अपने विचार हैं. उनके विचार हमारे विचारों से भिन्न हो सकते हैं. उनके मूल्य अलग हो सकते हैं. उनके सोचने का तरीक़ा अलग हो सकता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































