यूएई ने छोड़ा ओपेक और ओपेक प्लस का साथ, क्या ये संगठन के 'अंत की शुरुआत' है?

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संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने घोषणा की है कि वह प्रमुख तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक और ओपेक प्लस से बाहर हो रहा है.
तक़रीबन 60 साल बाद यूएई ने ये फ़ैसला तब लिया है जब ईरान जंग की वजह से ऐतिहासिक रूप से दुनियाभर में ऊर्जा को लेकर एक बड़ा संकट पैदा हुआ है और जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है.
यूएई ने कहा है कि यह फ़ैसला उसकी "दीर्घकालिक रणनीति, इकोनॉमिक विज़न और बदलती एनर्जी प्रोफ़ाइल" को दर्शाता है.
यूएई के ऊर्जा मंत्री सुहैल अल मज़रूई ने कहा है कि इन समूहों के तहत किसी बाध्यता से मुक्त होने पर देश को ज़्यादा लचीलापन मिलेगा.

ओपेक की स्थापना
ओपेक की स्थापना 1960 में पांच देशों ईरान, इराक़, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेज़ुएला ने मिलकर की थी, ताकि उत्पादन का तालमेल बैठाकर तेल निर्यातकों के हितों की रक्षा की जा सके और सदस्यों के लिए स्थिर आय सुनिश्चित हो.
समय के साथ इस उत्पादक संघ में देशों की संख्या बदलती रही है, लेकिन पांच संस्थापक सदस्यों के अलावा इसमें अल्जीरिया, इक्वेटोरियल गिनी, गैबॉन, लीबिया, नाइजीरिया और कांगो गणराज्य भी शामिल हैं.
यूएई 1967 में इसमें शामिल हुआ था, और इसके बाहर होने के बाद इसमें 11 सदस्य रह जाएंगे. वहीं ओपेक प्लस गठबंधन में इनके अलावा 10 ग़ैर-ओपेक सदस्य भी हैं, जिनमें रूस भी शामिल है.
यूएई के बाहर होने का क्या होगा असर?
इस फ़ैसले को इस उत्पादक संघ के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, और एक विश्लेषक ने इससे बाहर निकलने को "ओपेक के अंत की शुरुआत" बताया है.
एमएसटी फाइनेंशियल में ऊर्जा अनुसंधान के प्रमुख शाऊल कावोनिक ने कहा कि यह गठबंधन के "अंत की शुरुआत" हो सकती है.
उन्होंने कहा, "यूएई के जाने के साथ, ओपेक अपनी क्षमता का लगभग 15% खो देगा."
इस फ़ैसले को ओपेक के साथ-साथ इस गुट के सर्वेसर्वा माने जाने वाले सऊदी अरब के लिए झटका माना जा रहा है.
ब्रिटिश अख़बार द गार्डियन के मुताबिक़, यूएई जैसे लंबे समय से ओपेक के सदस्य के बाहर होने से समूह में अव्यवस्था पैदा हो सकती है और यह उसे कमज़ोर कर सकता है, जबकि यह समूह आम तौर पर भू-राजनीति से लेकर उत्पादन कोटा जैसे कई मुद्दों पर आंतरिक मतभेदों के बावजूद एकजुटता दिखाने की कोशिश करता रहा है.
ब्लैक गोल्ड इन्वेस्टर्स के सीईओ और ओपेक के अनुभवी पर्यवेक्षक गैरी रॉस समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहते हैं कि
"उन्होंने (यूएई) पिछले कुछ वर्षों से उत्पादन कोटा को नज़रअंदाज़ किया है और लगभग अधिकतम उत्पादन की नीति अपनाई है. आख़िर में, सऊदी अरब ही वास्तव में ओपेक था."
"वही एक देश है जिसके पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता थी. रूस का शामिल होना अच्छा है, जिससे उसकी आपूर्ति बढ़ाने की क्षमता पर कुछ हद तक नियंत्रण रहता है."

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ओपेक के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, यूएई सालाना 29 लाख बैरल तेल का उत्पादन करता है. ओपेक का सबसे बड़ा उत्पादक देश सऊदी अरब सालाना 90 लाख बैरल तेल निकालता है.
रॉयटर्स के मुताबिक़ इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने कहा कि ओपेक प्लस का ग्लोबल तेल उत्पादन में हिस्सा मार्च में घटकर 44% रह गया, जो फ़रवरी में लगभग 48% था.
अप्रैल में इसके और गिरने की संभावना है, क्योंकि उत्पादन में कटौती और ज़्यादा साफ़ तौर पर दिखाई देने लगेगी.
एडीसीबी बैंक की चीफ़ इकोनॉमिस्ट मोनिका मलिक ने रॉयटर्स को बताया, "जंग थमने के बाद जब हालात सामान्य हो जाएंगे तब यूएई के लिए ग्लोबल मार्केट में अपना हिस्सा बढ़ाने का रास्ता खुल जाएगा."
उन्होंने आगे कहा कि यह कदम उपभोक्ताओं और बड़े पैमाने पर ग्लोबल अर्थव्यवस्था के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है.

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ट्रंप क्यों हो सकते हैं ख़ुश
यूएई का बाहर होना अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक जीत माना जा रहा है, जिन्होंने पहले ओपेक पर "दुनिया का शोषण करने" का आरोप लगाया था.
जनवरी में उन्होंने सऊदी अरब और अन्य ओपेक देशों से "तेल की क़ीमत कम करने" को कहा था और टैरिफ़ लगाने की अपनी धमकी को भी दोहराया था.
यूएई का यह फ़ैसला ऐसे समय आया है जब वर्ल्ड बैंक ने चेतावनी दी है कि मध्य पूर्व में युद्ध के कारण तेल आपूर्ति में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज हुई है.
उसका कहना है कि इसके परिणामस्वरूप इस साल ऊर्जा की क़ीमतें औसतन लगभग एक-चौथाई तक बढ़ेंगी, जबकि अहम होर्मुज़ स्ट्रेट के ज़रिए शिपिंग को युद्ध से पहले के हालात पर लौटने में छह महीने तक लग सकते हैं.
वर्ल्ड बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री इंदरमीत गिल ने कहा, "सबसे ग़रीब लोग, जो अपनी आय का सबसे बड़ा हिस्सा भोजन और ईंधन पर ख़र्च करते हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे."
होर्मुज़ स्ट्रेट के बंद रहने के कारण यूएई के ओपेक छोड़ने का वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर तुरंत असर नहीं पड़ेगा, लेकिन इससे लंबे समय में असर बढ़ सकता है.
अर्थशास्त्रियों ने कहा कि इस देश ने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश किया है और वह लंबे समय से अधिक तेल उत्पादन करना चाहता रहा है.
कैपिटल इकोनॉमिक्स के मुख्य जलवायु और कमोडिटी अर्थशास्त्री डेविड ऑक्सले ने कहा कि इसके बाहर होने से आने वाले दशकों में तेल की क़ीमतें कम हो सकती हैं, लेकिन बाज़ार में अस्थिरता बढ़ सकती है.

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वो कहते हैं कि भले ही यूएई छोटा देश है, लेकिन अगर अन्य सदस्य देश भी बाहर निकलते हैं, या रूस और सऊदी अरब जैसे देश इसके परिणामस्वरूप उत्पादन बढ़ाने का फैसला करते हैं तो इसका असर बड़ा हो सकता है.
क्रिस्टोल एनर्जी की मुख्य कार्यकारी अधिकारी और अरब एनर्जी क्लब की महासचिव कैरोल नाखले ने बीबीसी से कहा कि यूएई का यह फ़ैसला "काफ़ी समय से तैयार हो रहा था".
उन्होंने कहा, "अबू धाबी ने उत्पादन क्षमता बढ़ाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य अपनाए, लेकिन अक्सर समूह के कोटा के कारण ख़ुद को सीमित महसूस किया, खासकर जब कुछ सदस्य इन नियमों का समान रूप से पालन नहीं कर रहे थे."
नाखले ने यह भी कहा कि ओपेक सदस्य के रूप में ईरान की गतिविधियों ने यूएई के इस फ़ैसले को और मज़बूत किया होगा.
कावोनिक ने कहा, "सऊदी अरब के लिए बाकी ओपेक को एकजुट रखना मुश्किल होगा, और उसे आंतरिक अनुपालन और बाज़ार प्रबंधन का ज़्यादातर बोझ अकेले ही उठाना पड़ेगा." उन्होंने यह भी कहा कि अन्य ओपेक सदस्य भी ऐसा क़दम उठा सकते हैं.
उन्होंने कहा, "यह मध्य पूर्व और तेल बाज़ारों में एक बुनियादी भू-राजनीतिक बदलाव को दर्शाता है."
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