चीन और तुर्की की मदद से तैयार पाकिस्तान का नया एयर डिफ़ेंस सिस्टम क्या ब्रह्मोस को रोक पाएगा?

एयर डिफ़ेंस सिस्टम

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तानी एयर फ़ोर्स की ओर से सात सितंबर को जारी किए गए वीडियो में तीन अलग-अलग वायु रक्षा प्रणालियां दिखाई गई हैं.
    • Author, मुनज़्ज़ा अनवार
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

ड्रोन और यूएवी हथियारों के बढ़ते इस्तेमाल ने दुनिया भर की सेनाओं के लिए हवाई रक्षा को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है.

ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि कम लागत वाले, छोटे ड्रोनों के बड़े पैमाने पर होने वाले हमलों को कैसे रोका जाए?

अब पाकिस्तान की एयर फ़ोर्स अपनी कम दूरी की हवाई रक्षा (शॉर्ट-रेंज एयर डिफ़ेंस सिस्टम यानी एसएचओआरएडी) को मज़बूत करने के लिए चीन और तुर्की की मदद ले रही है.

इनमें मिसाइलें, ऑटोमैटिक तोपें और ड्रोन-रोधी तकनीक शामिल हैं.

पाकिस्तानी एयर फ़ोर्स की ओर से सात सितंबर को जारी किए गए वीडियो में तीन अलग-अलग वायु रक्षा प्रणालियां दिखाई गई हैं. ये हैं -

- चीन में बनी एचक्यू-17एई कम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली

- तुर्की की एसेलसन कोरकुट 35 मिमी ऑटोमैटिक एयर डिफ़ेंस गन सिस्टम

- और तुर्की का ही एसेलसन साहिन 40 मिमी काउंटर-ड्रोन सिस्टम

ये सभी सिस्टम मिलकर एक एकीकृत रक्षा कवच बनाती हैं. इसका मक़सद अहम सैन्य प्रतिष्ठानों को ड्रोन, यूएवी हथियारों, हेलीकॉप्टर, क्रूज़ मिसाइल और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों सहित अलग-अलग हवाई ख़तरों से बचाना है.

ये सिस्टम कैसे काम करता है?

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तीन स्तरीय कम दूरी की हवाई रक्षा की मूल अवधारणा यह है कि आने वाले ख़तरे से निपटने के लिए एक ही हथियार पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग दूरियों पर विभिन्न रक्षा प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाए.

इससे हवाई लक्ष्य को उसके लक्षित स्थान तक पहुंचने से पहले ही पता लगाने, उसका पीछा करने और उसे नष्ट करने के कई मौके मिलते हैं.

पाकिस्तानी रक्षा विश्लेषक फ़ारूक़ चौधरी के अनुसार, ओपन सोर्स से मिली जानकारी से पता चलता है कि पाकिस्तानी वायु सेना ने ड्रोन और अन्य निम्न-स्तरीय हवाई ख़तरों से निपटने के लिए चीनी निर्मित एचक्यू-17एई मिसाइल प्रणाली के साथ तोपख़ाने पर आधारित रक्षा की कई परतों को जोड़ने की रणनीति अपनाई है.

उनके अनुसार, ड्रोन के ख़िलाफ़ इस्तेमाल की जाने वाली इस रक्षात्मक संरचना में तोप आधारित रक्षा की तीन अलग-अलग परतें या लेयर्स शामिल हैं.

साहिन 40 मिलीमीटर का इस्तेमाल लगभग 700 मीटर तक की कम दूरी पर छोटे ड्रोन के ख़िलाफ़ किया जा सकता है.

कोरकुट 35 मिलीमीटर की प्रभावी मारक क्षमता लगभग चार किलोमीटर है.

76 मिलीमीटर एलडी-76 तोपख़ाने पर आधारित यह रक्षा प्रणाली लगभग 10 किलोमीटर तक की मारक क्षमता के साथ एक अतिरिक्त बाहरी परत प्रदान कर सकती है.

हालांकि, फ़ारूक़ के अनुसार, पाकिस्तानी वायु सेना की ओर से जारी वीडियो में एलडी-76 को आधिकारिक तौर पर नहीं दिखाया गया था. उन्होंने कहा कि कुछ हफ़्ते पहले वायु सेना के आधिकारिक प्रतीक चिन्ह की एक तस्वीर सामने आई थी, जिस पर पाकिस्तान और चीन के झंडे के साथ एलडी-76 भी दिखाई दे रहा था.

इसके आधार पर उनका मानना है कि भविष्य में इस प्रणाली का ऑर्डर दिया जा सकता है.

उनके अनुसार, इन तोप आधारित प्रणालियों को चीन निर्मित एचक्यू-17एई मिसाइल पर आधारित एक कम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली की मदद मिलती है.

यह प्रणाली लगभग 15 किलोमीटर की दूरी तक ड्रोन के ख़िलाफ़ प्रभावी है और इसका इस्तेमाल विभिन्न हवाई हथियारों के ख़िलाफ़ भी किया जा सकता है, जिन्हें तोपों से रोका नहीं जा सकता है.

एक टैंक

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इमेज कैप्शन, एचक्यू-17एई चीन में बनी सतह से हवा में मार करने वाली कम दूरी की मिसाइल प्रणाली है.

पहली डिफ़ेंस लेयर: चीन में बनी एचक्यू-17एई

बाहरी रक्षात्मक परत एचक्यू-17एई से मिलती है. यह चीन में निर्मित सतह से हवा में मार करने वाली कम दूरी की मिसाइल प्रणाली है.

इसे विमानों, हेलीकॉप्टरों, ड्रोनों, क्रूज़ मिसाइलों और अन्य हवाई लक्ष्यों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल के लिए डिज़ाइन किया गया है. इसकी गतिशील प्रकृति इसे अलग-अलग स्थानों पर तैनात करने की अनुमति देती है.

इस रक्षात्मक संरचना में एचक्यू-17एई अपेक्षाकृत लंबी दूरी पर हवाई ख़तरों को निशाना बनाकर सुरक्षित सैन्य प्रतिष्ठानों के लिए रक्षा की पहली पंक्ति के रूप में काम करता है.

तुर्की में बनी कोरकुट: तोप आधारित रक्षा

कोरकुट

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इमेज कैप्शन, तुर्की में हथियारों की एक प्रदर्शनी में दिख रहे एसेलसन कंपनी के एयर डिफ़ेंस सिस्टम

रक्षा की दूसरी परत या लेयर में तुर्की की कंपनी एसेलसन की ओर से निर्मित कोरकुट 35 मिलीमीटर ऑटोमैटिक एयर डिफ़ेंस गन सिस्टम है.

ट्रैक वाले प्लेटफ़ॉर्म पर लगे इस सिस्टम में दो 35 मिलीमीटर की ऑटोमैटिक तोपें शामिल हैं.

कोरकुट प्रोग्रामेबल हवाई विस्फोटक गोला-बारूद का इस्तेमाल करता है, जो हवा में फटकर टुकड़ों का एक बादल-सा बनाता है. यह ड्रोन, होवरक्राफ़्ट और अन्य कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों को निशाना बना सकता है.

यह प्रणाली बड़े पैमाने पर ड्रोन हमलों के ख़िलाफ़ विशेष रूप से प्रभावी मानी जाती है.

यह कम लागत वाले हवाई ख़तरों के ख़िलाफ़ महंगी मिसाइलों का इस्तेमाल करने के मुक़ाबले में बेहतर विकल्प होता है.

आख़िरी डिफ़ेंसिव लाइन: तुर्की में बनी साहिन

23 अक्तूबर 2024 को तुर्की में इंटरनेशनल डिफेंस एंड एयरोस्पेस एग्ज़िबिशन के दौरान एसेलसन के बूथ पर 'कोरकुट 25 एमएम क्लोज़ एयर डिफ़ेंस सिस्टम'

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इमेज कैप्शन, 23 अक्तूबर 2024 को तुर्की में इंटरनेशनल डिफेंस एंड एयरोस्पेस एग्ज़िबिशन के दौरान एसेलसन के बूथ पर 'कोरकुट 25 एमएम क्लोज़ एयर डिफ़ेंस सिस्टम'

सबसे भीतरी रक्षात्मक परत में 40 मिलीमीटर की काउंटर-ड्रोन प्रणाली शामिल है.

इसे विशेष रूप से छोटे और बेहद-छोटे मानवरहित हवाई वाहनों का मुक़ाबला करने के लिए डिज़ाइन किया गया है.

साहिन प्रणाली रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और एक ऑटोमैटिक फ़ायर कंट्रोल सिस्टम से लैस है. यह 40 मिलीमीटर एयरबर्स्ट ग्रेनेड का इस्तेमाल करती है, जो टार्गेट के पास पहुंचने पर हवा में फट जाते हैं.

अहम जगहों के आसपास रक्षा की आख़िरी पंक्ति के रूप में काम करते हुए, यह प्रणाली उन छोटे हवाई ख़तरों को ख़त्म करने के लिए डिज़ाइन की गई है, जो रक्षा की पहली दो लेयर से बच निकलते हैं.

एयर डिफ़ेंस सिस्टम

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तानी एयर फ़ोर्स ड्रोन के ख़िलाफ़ कम दूरी की हवाई रक्षा प्रणालियों को शामिल करने को प्राथमिकता दे रही है.

पाकिस्तानी एयर फ़ोर्स की बदलती रणनीति

रक्षा विश्लेषक फ़ारूक़ चौधरी के अनुसार, 2025 तक पाकिस्तानी एयर फ़ोर्स का ध्यान पारंपरिक रूप से हवाई रक्षा के लिए अपने लड़ाकू जेट विमानों और हवाई क्षमताओं पर रहा है.

उनके अनुसार, ड्रोन और अन्य हवाई हथियारों से पैदा हुए ख़तरे के कारण वायु सेना को अब अपनी रणनीति बदलनी पड़ी है और वह ज़मीनी हवाई रक्षा में भारी निवेश कर रही है.

उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी वायु सेना की ओर से हाल ही में प्रदर्शित की गई तीन बेहद कम दूरी की हवाई रक्षा (एसएचओआरएडी) प्रणालियां एक व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं.

इस रणनीति के तहत पाकिस्तानी एयर फ़ोर्स ड्रोन के ख़िलाफ़ इस्तेमाल के लिए कम दूरी की हवाई रक्षा प्रणालियों को शामिल करने को प्राथमिकता दे रही है.

फ़ारूक़ चौधरी के अनुसार, यह भी उल्लेखनीय है कि पाकिस्तानी वायु सेना ने मई 2025 के बाद एक साल के भीतर इन प्रणालियों को अपनी रक्षा संरचना में शामिल कर लिया.

ड्रोन के ख़िलाफ़ कई स्तर की रक्षा प्रणाली

पाकिस्तानी रक्षा विश्लेषकों के मुताबिक़ ये बदलाव हाल में पाकिस्तान के भारत और अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ हुए संघर्षों से सीखे गए सबक़ की वजह से हो रहे हैं.

इन संघर्षों में ड्रोन और यूएवी हथियारों के बढ़ते इस्तेमाल ने पारंपरिक हवाई रक्षा प्रणालियों की कमियों को उजागर किया है और उनके लिए नई चुनौतियां पैदा की हैं.

अब दुनिया भर की सेनाएं कई स्तरों की हवाई रक्षा प्रणालियों को अपनाने की ओर बढ़ रही हैं. ये प्रणालियां अलग-अलग किस्म के हवाई ख़तरों का प्रभावी ढंग से मुक़ाबला कर सकती हैं.

हर आने वाले ड्रोन या हवाई ख़तरे के ख़िलाफ़ महंगी मिसाइलों का इस्तेमाल करने के बजाय, बहुस्तरीय रक्षा प्रणालियां मिसाइलों, एयर डिफ़ेंस गन्स और ड्रोन-रोधी प्रणालियों को जोड़ती हैं.

यह रणनीति ख़तरे की प्रकृति, दूरी और आकार के आधार पर मिसाइलों, ऑटोमैटिक तोपों या ड्रोन-रोधी प्रणालियों के चयन की इजाज़त देती है. इससे रक्षा संसाधनों के अधिक प्रभावी इस्तेमाल में मदद मिलती है.

चीनी मिसाइलें और तुर्की की तोपें

पाकिस्तानी वायु सेना के वीडिया का ग्राफ़िक्स

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इमेज कैप्शन, तुर्की में बनी तोप टेक्नोलॉजी और चीनी मिसाइल प्रणालियों को मिलाकर पाकिस्तानी वायु सेना एक 'एकीकृत बेस रक्षा प्रणाली' बनाना चाहती है

फ़ारूक़ चौधरी के अनुसार, पाकिस्तानी एयर फ़ोर्स तुर्की में बनी तोप प्रौद्योगिकी को चीनी मिसाइल प्रणालियों के साथ मिलाकर एक 'एकीकृत बेस रक्षा प्रणाली' बनाना चाहती है. इसे वह सीआईडब्ल्यूएस (क्लोज़-इन वेपन सिस्टम) कहती है.

उनके अनुसार, इस नज़रिए से पाकिस्तानी वायु सेना ड्रोन से लेकर कम ऊंचाई वाली क्रूज़ मिसाइलों और लंबी दूरी के बमों तक, अलग-अलग हवाई हथियारों का मुक़ाबला करने की क्षमता हासिल करना चाहती है.

यह सहयोग चीन और तुर्की के साथ पाकिस्तान के बढ़ते रक्षा संबंधों का भी सबूत है.

क्या ये हर तरह के हवाई ख़तरे बचाव के लिए काफ़ी हैं?

ये प्रणालियां मुख्य रूप से कम दूरी और कम ऊंचाई वाले हवाई ख़तरों से निपटने के लिए डिज़ाइन की गई हैं, इसलिए इन्हें पाकिस्तान के लिए पूर्ण हवाई रक्षा का विकल्प नहीं माना जा सकता है.

फ़ारूक़ चौधरी के अनुसार, ये प्रणालियां भारत के ब्रह्मोस जैसी उच्च गति वाली क्रूज़ मिसाइलों से सुरक्षा नहीं देती हैं और पाकिस्तानी वायु सेना को इस तरह के ख़तरों से निपटने के लिए शायद किसी और रक्षात्मक क्षमता पर निर्भर रहना होगा.

पाकिस्तानी वायु सेना की ओर से कम दूरी की मिसाइलों, ऑटोमैटिक तोपों और ड्रोन-रोधी तकनीक को एकीकृत रक्षा संरचना में शामिल करना इस बात का संकेत देता है कि ड्रोन ने हवाई रक्षा की प्राथमिकताओं को किस हद तक बदल दिया है.

इस दौर में चुनौती केवल तेज़ गति वाले लड़ाकू विमानों या क्रूज़ मिसाइलों को रोकना ही नहीं है, बल्कि छोटे और अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन से भी निपटना है, जिनका इस्तेमाल बड़ी संख्या में किया जा सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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