अज़रबैजान का अतेशगाह अग्नि मंदिर, जहाँ देवनागरी में लिखा है श्री गणेशाय नमः, जानिए इतिहास

इमेज स्रोत, @DrSJaishankar
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर अज़रबैजान के दौरे पर हैं.
शुक्रवार को एस जयशंकर ने अज़रबैजान की राजधानी बाकू स्थित अतेशगाह अग्नि मंदिर का दौरा किया.
इस दौरे की तस्वीरें पोस्ट करते हुए भारतीय विदेश मंत्री ने लिखा है, ''बाकू स्थित ऐतिहासिक अतेशगाह अग्नि मंदिर का दौरा किया. यह दोनों देशों के लोगों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक है.''
अज़रबैजान कैस्पियन सागर के तट पर स्थित छोटा-सा मुस्लिम बहुल देश है. यह पहले सोवियत संघ का हिस्सा था.
सुराखानी के पास स्थित अग्नि मंदिर अतेशगाह में देवनागरी में श्री गणेशाय नमः लिखा हुआ है.
देवनागरी लिपि में इसकी पाँच अन्य पंक्तियां भी हैं, जिनमें हिन्दू अग्नि देवी ज्वाला जी सहित अन्य देवी-देवताओं का आह्वान किया गया है.
बाकू स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार, अतेशगाह में देवनागरी लिपि में 18 अभिलेख हैं. इनमें से अधिकांश की शुरुआत भगवान गणेश की वंदना से होती है, जबकि ज्वाला जी का उल्लेख एक दर्जन से अधिक बार किया गया है.
- अधिकांश अभिलेखों की शुरुआत ओम श्री गणेशाय नमः से होती है.
- देवी ज्वाला जी का उल्लेख एक दर्जन से अधिक बार किया गया है.
- छह अभिलेखों में हिंदू धर्म का पवित्र स्वस्तिक चिह्न मौजूद है.
अग्नि वेदी और भारतीय अभिलेखों के लिए प्रसिद्ध यह मंदिर अबशेरोन प्रायद्वीप की अग्नि-पूजा परंपराओं और भारतीय उपमहाद्वीप से आने वाले व्यापारियों के अलावा तीर्थयात्रियों के बीच संबंधों को रेखांकित करता है.
यूनेस्को के मुताबिक़ यहाँ मौजूद इमारतें 17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच की हैं.
मंदिर का इतिहास

इमेज स्रोत, @DrSJaishankar
यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक़, मंदिर का भौगोलिक परिवेश इसके इतिहास में अहम भूमिका निभाता है.
अबशेरोन प्रायद्वीप में ज़मीन के भीतर से प्राकृतिक गैस निकलने के कारण आग की लपटें उठती थीं, जिससे इस स्थान को धार्मिक महत्व मिला.
इसके शुरुआती इतिहास को पारसी धर्म से जोड़ा गया है, लेकिन आज मौजूद परिसर मुख्य रूप से बहुत बाद के निर्माण काल का है.
इसलिए इस स्थान से जुड़ी प्राचीन धार्मिक मान्यताओं और यहाँ मौजूद इमारतों की वास्तविक उम्र के बीच अंतर करना ज़रूरी है.
17वीं शताब्दी में यहां तीर्थयात्रियों का आना-जाना फिर बढ़ने लगा. आधिकारिक विवरण के अनुसार, 1683 में यहाँ आए जर्मन यात्री एंगेलबर्ट कैम्फर ने दर्ज किया था कि तीर्थयात्रियों ने उसी शताब्दी के मध्य के आसपास मंदिर का पुनर्निर्माण शुरू कर दिया था.
निर्माण कार्य जारी रहा और 19वीं शताब्दी की शुरुआत तक इस परिसर ने अपना मौजूदा स्वरूप हासिल कर लिया.
अतेशगाह का भारतीय संबंध इसकी प्रमुख विशेषताओं में से एक है. यूनेस्को को सौंपे गए अज़रबैजान के दस्तावेज़ में इसे मुल्तान के श्रद्धालुओं के लिए तीर्थ स्थान और दार्शनिक केंद्र बताया गया है.
ये श्रद्धालु कैस्पियन क्षेत्र के साथ व्यापार भी करते थे.
मुल्तान अब पाकिस्तान में है, लेकिन यह व्यापक भारतीय उपमहाद्वीप के वाणिज्यिक और धार्मिक नेटवर्क का हिस्सा था.
भारतीय व्यापारियों और तीर्थयात्रियों ने इस परिसर के निर्माण और रखरखाव के लिए आर्थिक सहायता दी और इसका उपयोग भी किया.
सिल्क रूट और भारतीय यात्रियों का ठिकाना

इमेज स्रोत, Getty Images
यहां के अभिलेखों में हिंदू और सिख परंपराओं से जुड़े संस्कृत के साथ पंजाबी के लेख शामिल हैं. हिंदू प्रार्थनाओं में गणेश और शिव सहित विभिन्न देवताओं का उल्लेख मिलता है, जबकि पवित्र अग्नि की पूजा का संबंध ज्वाला जी से था.
'द श्राइन ऑफ डेथ' की लेखिका दिव्या कुमार ने 2018 में इस मंदिर को लेकर प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू में एक रिपोर्ट लिखी थी.
दिव्या कुमार ने लिखा था, ''अतेशगाह इतिहास, वैश्वीकरण और भारतीय उपमहाद्वीप के साथ यूरोप के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान की एक दिलचस्प ऐतिहासिक धरोहर है, जिसका इतिहास 16वीं शताब्दी तक जाता है.''

दिव्या कुमार ने लिखा है, ''अज़रबैजान सिल्क रूट का हिस्सा था, जो एशिया और यूरोप को जोड़ता था. माना जाता है कि भारतीय उपमहाद्वीप के व्यापारियों को अबशेरोन प्रायद्वीप की 'जलती धरती' और 'अनंत ज्वालाओं' की किंवदंतियों के बारे में पता चला था."
"यह प्रायद्वीप इन प्राकृतिक अग्निशिखाओं के लिए प्रसिद्ध था. दरअसल, अज़रबैजान को अक्सर 'अग्नि की भूमि' भी कहा जाता है. इसके बाद 16वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और 17वीं शताब्दी की शुरुआत में भारतीय यात्री और तीर्थयात्री यहाँ पहुँचे."
"उन्होंने अतेशगाह को इसका मौजूदा स्वरूप दिया और गणेश के साथ शिव जैसे अपने देवी-देवताओं की पूजा के साथ-साथ यहाँ की पवित्र अग्नि की भी आराधना की.''
दिव्या कुमार ने लिखा है, ''जिस दिन हम मंदिर देखने पहुँचे, उस दिन हवा बहुत तेज़ चल रही थी और चारों ओर धूल उड़ा रही थी. आख़िरकार, हम अज़रबैजान की राजधानी बाकू से 20 किलोमीटर से भी कम दूरी पर थे."
"बाकू को स्थानीय अज़ेरी भाषा में अनौपचारिक रूप से 'हवाओं का शहर' कहा जाता है. लेकिन मंदिर परिसर के केंद्र में बने ऊंचे मुख्य अग्नि कुंड में पवित्र ज्वाला तेज़ हवाओं के बावजूद लगातार जल रही थी.''
''केंद्र में जलने वाली इस ज्वाला और बगल में बने दो गोलाकार चबूतरों पर जलने वाली खुली आग को आज बाकू की मुख्य गैस पाइपलाइन से गैस की आपूर्ति की जाती है. लेकिन सैकड़ों, बल्कि संभवतः हज़ारों वर्षों तक ये ज्वालाएं प्राकृतिक रूप से जलती रही थीं."
"देश के विशाल प्राकृतिक गैस भंडार से गैस चट्टानी सतह में मौजूद छिद्रों से बाहर निकलती थी और हवा के संपर्क में आते ही आग पकड़ लेती थी.''
पारसी धर्म से जुड़ी उत्पत्ति

इमेज स्रोत, @DrSJaishankar
दिव्या कुमार लिखती हैं, ''अज़रबैजान के इतिहास में अग्नि-पूजकों ने इन 'अनंत ज्वालाओं' की पूजा की है. इस क्षेत्र में आने वाले यात्रियों के विवरणों में सातवीं शताब्दी तक इनका उल्लेख मिलता है."
"इतिहासकारों का मानना है कि भारतीय यात्रियों के यहाँ पहुँचने से बहुत पहले पारसी धर्म के अनुयायियों ने इस अग्नि मंदिर का एक पुराना स्वरूप बनाया था.''
''1969 में मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान मौजूदा संरचना के नीचे एक पुरानी इमारत के हिस्से मिले थे. 'अतेशगाह' नाम फ़ारसी भाषा से आया है, जिसका अर्थ है 'अग्नि का घर'."
"ऐसे संकेत भी मिले हैं कि पुराना मंदिर मौजूदा परिसर की सीमा से आगे तक फैला हुआ हो सकता था. हालांकि, 19वीं शताब्दी से आसपास की ज़मीन में तेल और गैस की खोज के दौरान इसके शेष अवशेष संभवतः नष्ट हो गए.''
यूनेस्को को सौंपे गए अज़रबैजान के दस्तावेज़ के अनुसार, सुराखानी में पेट्रोलियम उद्योग से जुड़ी इकाइयों के विस्तार के बाद 1883 में मंदिर में पूजा बंद हो गई.
इसके बाद इस स्थल को संग्रहालय में बदल दिया गया. अब इसे ऐतिहासिक-वास्तुशिल्प रिज़र्व के रूप में संरक्षित किया गया है.
दिव्या कुमार ने लिखा है, ''सौभाग्य से, लगभग 500 साल पुराना यह मंदिर आज भी खड़ा है और अपने बहुसांस्कृतिक अतीत के निशान संजोए हुए है. मंदिर की केंद्रीय अग्नि वेदी की संरचना पूरी तरह हिंदू शैली की नहीं है, बल्कि इसमें पारंपरिक पारसी अग्नि वेदियों से भी समानताएं दिखाई देती हैं. मंदिर परिसर में मौजूद एक अभिलेख फ़ारसी भाषा में भी है.''
''अज़रबैजान में पारसी धर्म का प्रभाव प्राचीन होने के साथ-साथ गहराई से जुड़ा हुआ है. यह उस दौर की विरासत है, जब इस क्षेत्र पर इस्लाम के आगमन से पहले फ़ारसी राजवंशों का शासन था. आज भी नवरोज, यानी पारसी नववर्ष का उत्सव, यहां के त्योहारों के कैलेंडर का एक प्रमुख पर्व है. इतिहास के विवरणों के अनुसार, 19वीं शताब्दी में अतेशगाह बॉम्बे से आने वाले पारसियों के लिए भी एक तीर्थस्थल बन गया था. वे इस भारतीय मंदिर के दर्शन करने आते थे, जो कभी पारसी धर्म के अनुयायियों का पूजा स्थल हुआ करता था.''
1969 में जीर्णोद्धार के बाद, 1975 में मंदिर को संग्रहालय में बदल दिया गया. वर्ष 1998 में इसे आधिकारिक तौर पर यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल किया गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.






























