दो सौ साल पहले आज ही के दिन अनजाने में ईजाद हुई थी माचिस, जानिए ग़ुमनाम आविष्कारक की कहानी

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- Author, स्वामीनाथन नटराजन
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
आज से ठीक दो सौ साल पहले 1826 में मानवता को एक आकस्मिक घटना का लाभ मिला और हमेशा के लिए आग पैदा करने और रोशनी जलाने के तरीके बदल गए.
यह वो वक्त था जब एक प्रयोगधर्मी लेकिन ग़ुमनाम फार्मासिस्ट जॉन वॉकर अपनी लैब में केमिकल मिला रहे थे और अनजाने में उन्होंने माचिस का आविष्कार कर दिया.
यह ऐसी घटना थी जो इतिहास में कभी नहीं हुई थी और इसने इंसान के लिए आग के उपयोग को आसान बना दिया.
ऐसा कारनामा करने वाले इंग्लैंड के प्रयोगधर्मी फार्मासिस्ट जॉन वॉकर थे. वे उस समय विस्फोटक बनाने के प्रयास में रसायनों को मिला रहे थे, तभी लकड़ी पर लगा एक मिश्रण गलती से उनके फायरप्लेस के पत्थर से टकराया और उसने अचानक आग पकड़ ली.
1827 में माचिस का व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू हुआ.
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भाप के इंजन को वॉकर की माचिस ने कैसे दी स्पीड

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वॉकर का जन्म 1781 में ब्रिटेन के डरहम के बंदरगाह नगर स्टॉकटन-ऑन-टीज़ में हुआ था. इस वक्त औद्योगिक क्रांति अपने चरम पर थी. इस क्रांति का प्रमुख आधार जेम्स वॉट का भाप का इंजन था. बाद में वॉकर के माचिस के आविष्कार ने भाप के इंजन में आग को आसानी से जलाए रखने में मदद की.
बात जेम्स वॉट के बनाए भाप इंजन के व्यावसायिक उपयोग की करें तो इसकी शुरुआत 1776 में हुई थी. मगर इससे बनी सार्वजनिक रेलवे को वॉकर के शहर स्टॉकटन पहुंचने में 49 साल लग गए. यानी 1825 में पहुंची.
इसके चार साल बाद 1829 में जॉर्ज स्टीफेंसन के भाप इंजन से एक लोकोमोटिव (इंजन) रॉकेट बनाया, इसने साबित कर दिया कि भाप इंजन 50 किमी प्रति घंटा की गति से यात्री ट्रेनों को खींच सकते हैं. इस तरह यात्राएं आसान हो गईं, जो यात्रा घोड़े से 12 दिन में पूरी होती थी, वो सिर्फ़ आठ घंटे में पूरी होने लगी.
हालांकि इन भाप के इंजनों को चलाने के लिए आग जलाना अब भी कठिन था. लोग चकमक पत्थर और इस्पात का इस्तेमाल करते थे. या अंगारों को लगातार जलाए रखते रखते थे. यह स्थिति तब बदली जब वॉकर की आकस्मिक खोज ने आग के उत्पादन, उपयोग और आसानी से ले जाने की क्षमता में क्रांति ला दी.
वॉकर ने कैसे बनाई माचिस

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माचिस के आविष्कारक जॉन वॉकर एक प्रशिक्षित सर्जन थे लेकिन 18वीं सदी के रक्तरंजित दौर में उन्होंने अपने पेशा बदल लिया. वे सर्जन से औषधि विक्रेता बन गए.
लेखक एलन मिडलटन ने अपनी किताब "ए टेल ऑफ होप एंड डिस्पेयर : नॉर्थ ऑफ़ इंग्लैंड मैच कंपनी, वेस्ट हार्टलपूल (1932–1954)" में जॉन वॉकर का ज़िक्र किया है.
इसके मुताबिक, वॉकर ने 1826 में अपना अधिकांश समय इंसानों के साथ-साथ घोड़ों, मवेशियों और यहां तक कि मुर्गियों के लिए भी दवाएं बनाने में लगाना शुरू कर दिया. साथ में वे रसायनों के साथ प्रयोग भी करने लगे.
एलन मिडलटन कहते हैं, "वॉकर एक बुद्धिमान और बहुत दयालु व्यक्ति थे और कुछ लोग उन्हें एक अलग किस्म का इंसान भी मानते हैं. उनकी एक खास रुचि रसायन विज्ञान में थी और वे अपने किसान दोस्तों के लिए परकशन कैप (बंदूक चलाने के उपकरण) बनाने के लिए रसायनों को मिलाते थे.
एक दिन वे एक मिश्रण तैयार कर रहे थे और उसे सूखने के लिए छोड़ दिया.
"जब वह सूख गया, तो उन्होंने बस उसे एक लकड़ी के टुकड़े पर रगड़ा और वह जल उठा.
वह कहते हैं, "यह एक अद्भुत क्षण था, जो इससे पहले किसी ने नहीं किया था."
माचिस बेचनी शुरू की लेकिन पेटेंट नहीं कराया

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मिडलटन ने यह भी लिखा है कि वॉकर ने इस तरह आग लगने के आविष्कार की व्यावसायिक संभावना को साल 1826 में किसी वक्त समझा, हालांकि इसकी सही तारीख़ पता नहीं है. फिर अप्रैल- 1827 में इसकी पहली बिक्री शुरू हुई.
लेख के मुताबिक, "वॉकर ने इसे 'फ्रिक्शन मैच' नाम दिया और शुरुआत में इसे टिन में सैकड़ों की संख्या में बेचा जाता था."
वॉकर के "फ्रिक्शन लाइट्स" पतली लकड़ी की तीलियां थीं, जिनके एक सिरे को पोटैशियम क्लोरेट, एंटीमनी सल्फाइड, गोंद अरेबिक और पानी के मिश्रण में डुबोया जाता था. जब इन्हें सैंडपेपर से रगड़ा जाता, तो ये जल उठती थीं.
वॉकर ने अपने फार्मूले को गुप्त रखा लेकिन उसका पेटेंट नहीं कराया. उनकी बनाई माचिस का उत्पाद सस्ता था और वे अपने शहर स्टॉकटन में उसकी मांग पूरी करने में सक्षम थे.
हालांकि, फार्मास्यूटिकल जर्नल के अनुसार, "वॉकर की माचिस पूरी तरह बेहतर नहीं थी. जलता हुआ सल्फर कभी-कभी लकड़ी से गिर जाता था, जिससे माचिस जलाने वाले व्यक्ति के कपड़ों या फर्श को नुक़सान होने का ख़तरा रहता था."
वॉकर की माचिस की नक़ल बाज़ार में उतरी और छा गई

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1829 तक लंदन के सैमुअल जोन्स ने "लूसिफ़र्स" नाम से माचिस बाजार में उतार दी, जो वॉकर की "फ़्रिक्शन लाइट्स" की बिल्कुल नकल थीं. साथ ही बड़े पैमाने पर उत्पादन वाली यह पहली माचिस थी.
ब्रिटिश मैचबॉक्स लेबल एंड बुकमैच सोसाइटी के अध्यक्ष डेरेक जूड ने बीबीसी न्यूज़ से कहा कि अन्य लोग भी इस नुस्ख़े में सुधार करने लगे थे. माचिस के डिब्बों के आकार और डिजाइन में भी बदलाव हुए.
वह बताते हैं, साल 1844 में स्वीडन में माचिस का एक वर्जन सामने आया, जहां से आधुनिक रूप में माचिस लोकप्रिय बनी.
डेरेक जूड बताते हैं कि कई जगहों पर माचिस बनाना घरेलू उद्योग बन गया. परिवार इसे घर पर बनाते थे, जो एक जोखिम भरा लेकिन अतिरिक्त आय का स्रोत था.
डेरेक जूड बताते हैं, "महिलाएं और बच्चे कारखाने के आसपास घरों में डिब्बे बनाते थे और उन्हें उत्पादन के अनुसार भुगतान मिलता था. बाद में मशीनों के आने से यह एक विशाल उद्योग बन गया."
लाइटर से माचिस के बाज़ार में असर पड़ा

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बाद में सिगरेट लाइटर के आविष्कार ने माचिस के इस्तेमाल पर काफी असर डाला. जूड कहते हैं, "समय के साथ यह कारोबार छोटा होता गया और कई कंपनियां बंद हो गईं."
मिडलटन के मुताबिक, माचिस आज भी दुनिया भर में आम है और आवश्यक वस्तु बनी हुई है. अब यह एक फैशन आइटम भी बन चुकी है. खास डिजाइन वाले पैक 250 डॉलर तक में बिकते हैं.
लेकिन इसके आविष्कारक वॉकर आज भी काफी हद तक गुमनाम हैं. मिडलटन और जूड दोनों मानते हैं कि 200 साल बाद अब उन्हें पहचान मिलनी चाहिए.
जूड कहते हैं, "वॉकर ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपने आविष्कार को आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं की, अगर करते तो वे मशहूर हो सकते थे."
स्टॉकटन में वॉकर के 200वें जन्मदिन समारोह 29 मई से शुरू हो रहे हैं.
स्थानीय लोग उम्मीद करते हैं कि इन समारोहों से ज्यादा लोग वॉकर के योगदान के बारे में जानेंगे.
काउंसिल लीडर लिसा इवांस कहती हैं, "फ्रिक्शन मैच के आविष्कार ने आग को तुरंत और आसानी से पैदा करना संभव बना दिया. इससे औद्योगिक और घरेलू दोनों जरूरतों में बहुत तेजी आई. उनकी बनाई चिंगारी आज भी लोगों को प्रेरित करती है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.




























