इसराइल के लोग मिडटर्म में ट्रंप की पार्टी की हार को कैसे देख रहे हैं?

अमेरिका मिडटर्म
इमेज कैप्शन, अब्दुल अल-सैयद को डेमोक्रेटिक पार्टी के प्राइमरी चुनाव में हराने के लिए अमेरिकन इसराइल पब्लिक अफ़ेयर्स कमिटी (एआईपीएसी) ने तीन करोड़ डॉलर से ज़्यादा ख़र्च किए थे
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अमेरिका के मिडटर्म इलेक्शन में रिपब्लिकन पार्टी की हार के बाद इसराइल में बहस हो रही है कि यह नतीजा उनके लिए कितना ख़राब है.

इस चुनाव में उन लोगों को भी जीत मिली है, जो इसराइल की नीतियों की खुली आलोचना करते थे.

अब्दुल अल-सैयद ने मिशिगन में अमेरिकी सीनेट सीट के चुनाव में माइक रोज़र्स को हरा दिया.

इसराइल के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार हारेत्ज ने अब्दुल की जीत पर लिखा है, ''इस नतीजे से यह भी ज़ाहिर हुआ कि इसराइल के ख़िलाफ़ कड़ा विरोध जताना भी प्रतिस्पर्धी फेडरल इलेक्शन जीतने में बाधा नहीं बनता.

हारेत्ज ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''अल-सैयद ने यह जीत ऐसे समय में हासिल की, जब अमेरिकन इसराइल पब्लिक अफेयर्स कमिटी (एआईपीएसी) ने डेमोक्रेटिक पार्टी के प्राइमरी चुनाव में उन्हें हराने के लिए तीन करोड़ डॉलर से ज़्यादा ख़र्च किए थे. इसके अलावा, आम चुनाव में रोज़र्स के समर्थन में भी क़रीब 90 लाख डॉलर खर्च किए जाने की ख़बरें थीं.''

अल-सैयद ने इस ख़र्च को ही एआईपीएसी के ख़िलाफ़ अपने पक्ष में इस्तेमाल किया. उन्होंने अपने ख़िलाफ़ संगठन के विरोध को इस बात के सबूत के तौर पर पेश किया कि वह इतिहास के सही पक्ष में खड़े हैं.

हारेत्ज ने लिखा है, ''मंगलवार को आए चुनावी नतीजों ने संगठित यहूदी समुदाय की राजनीतिक ताक़त की सीमाओं को उजागर किया.''

''अल-सैयद यहूदी समुदाय के कार्यक्रमों में शामिल हुए और उसके नेताओं से मुलाक़ात भी की, लेकिन उन्होंने इसराइल समर्थक मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए अपनी बयानबाज़ी या नीतिगत रुख़ में बदलाव करने से काफ़ी हद तक इनकार किया.''

''इसराइल समर्थक संगठन 'द जूइश मेजॉरिटी' की ओर से जारी शुरुआती मतदान करने वाले यहूदी मतदाताओं के एक सर्वे में पाया गया कि 60 फ़ीसदी मतदाताओं ने अल-सैयद को वोट दिया था.''

ट्रंप-नेतन्याहू
इमेज कैप्शन, इसराइल में कहा जा रहा है कि नेतन्याहू ने ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी पर निर्भरता कुछ ज़्यादा ही बढ़ा ली थी

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इसराइली प्रसारक एन12 न्यूज़ के चीफ़ पॉलिटिकल एनलिस्ट अमिग सेगल ने लिखा है कि इसराइल के लिए बुरी ख़बरों का दौर थम नहीं रहा है.

उन्होंने एक्स पर लिखा है, ''बुरी ख़बरों का सिलसिला लगातार जारी है. कल रात अमेरिका में जो कुछ हुआ, वह एक बड़ी तबाही है. एआईपीएसी के सबसे बुरे डर की कल्पना कीजिए और उसे दोगुना कर दीजिए, तब भी स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा नहीं लगेगा."

"इसमें एकमात्र राहत की बात यह है कि अब्दुल अल-सैयद ने सीनेट की सीट उम्मीद से कम अंतर से जीती. क्या डेमोक्रेट्स यह समझेंगे कि इसराइल विरोधी राजनीति और यहूदी-विरोधी रुख़ अपनाने से उन्हें वोटों का नुक़सान होता है? मुझे ऐसा नहीं लगता. और इसके बावजूद बड़ी संख्या में यहूदियों ने उन्हें वोट दिया."

"स्थिति और ख़राब हो रही है. पहले डेमोक्रेट्स ने अमेरिका की समस्याओं के लिए इसराइल को ज़िम्मेदार ठहराया. इनमें किराने के सामान की बढ़ती क़ीमतें, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की घटती साख और ईरान के साथ युद्ध शामिल हैं."

उन्होंने लिखा, "अब जेडी वेंस के ट्वीट और डोनाल्ड ट्रंप जूनियर की ओर से उसे साझा किए जाने के बाद रिपब्लिकन भी अपनी पार्टी की मुश्किलों के लिए इसराइल को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. वेंस का संदेश था कि अमेरिका इसराइल के बहुत क़रीब चला गया था."

"यह कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है. इसराइल के सामने अब वॉशिंगटन में कम से कम 1975 के बाद की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. उस समय राष्ट्रपति जेराल्ड फोर्ड और विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने इसराइल पर दबाव बनाने के लिए हथियारों के सौदों पर रोक लगा दी थी. इसे 'रीअसेसमेंट' यानी अमेरिका की इसराइल नीति की पुनर्समीक्षा के तौर पर जाना जाता है."

आख़िर में सेगल लिखते हैं, "मुझे इस स्थिति का केवल एक ही समाधान नज़र आता है - इसराइल में राष्ट्रीय एकता की सरकार का गठन. नए चुनाव की संभावना से खेलना, अरब पार्टियों के समर्थन से अल्पमत सरकार बनाना या अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय की पार्टियों के साथ समझौता करना एक बहुत बड़ी ग़लती होगी.''

नेतन्याहू की नीति पर सवाल

जेडी वेंस
इमेज कैप्शन, अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इसराइल की आलोचना कई बार कर चुके हैं

प्रमुख अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि इन नतीजों ने इस बात को भी उजागर किया कि प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ लंबे समय से चली आ रही दोस्ती पर निर्भरता की भी अपनी सीमाएं हैं.

एनवाईटी ने लिखा है, ''रिपब्लिकन पार्टी के ख़िलाफ़ डेमोक्रेट्स की बड़ी जीत और चुनाव से पहले हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के साथ सीनेट के कुछ सदस्यों की ओर से इसराइल की बढ़ती आलोचना ने युद्ध के कई वर्षों के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसराइल के बढ़ते अलगाव की भावना को और गहरा कर दिया है. ये नतीजे इसराइल के लिए ऐसे संवेदनशील समय में आए हैं, जब वह अपने अनिर्णायक चुनावी नतीजों से जूझ रहा है और ईरान के साथ एक बार फिर संघर्ष की आशंका का सामना कर रहा है.''

''अब अमेरिका के साथ उसके भविष्य के रिश्ते भी दांव पर हैं. अमेरिका इसराइल का सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी है. इसके साथ ही हर साल मिलने वाली अरबों डॉलर की अमेरिकी सैन्य सहायता भी दांव पर है. यह इस बात का संकेत है कि डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन, दोनों ही पार्टियों में इसराइल के लिए पारंपरिक समर्थन कितना कम हुआ है. नेतन्याहू के आलोचकों और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों ने इन चुनावी नतीजों को इसराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को संभालने में उनकी नाकामी के सबूत के तौर पर पेश किया.''

जर्मनी में इसराइल के पूर्व राजदूत जेरेमी इस्साकारॉफ ने एनवाईटी से कहा, "आज हम जो नतीजे देख रहे हैं, वे ठीक यही वजह हैं कि इसराइल ने हमेशा अमेरिका के प्रति द्विदलीय नीति बनाए रखने की कोशिश की."

अपने लंबे राजनयिक करियर के दौरान इस्साकारॉफ ने अमेरिका के साथ इसराइल के रणनीतिक संबंधों के कई पहलुओं पर काम किया था. इस दौरान वह वॉशिंगटन स्थित इसराइली दूतावास में दो बार तैनात रहे थे.

इस्साकारॉफ के मुताबिक, रूढ़िवादी नेता नेतन्याहू ने क़रीब एक दशक पहले इस नीति को काफ़ी हद तक छोड़ दिया था. उन्होंने कहा कि नेतन्याहू "अमेरिकी राष्ट्रपति पर सबसे ज़्यादा निर्भर रहने वाले इसराइली प्रधानमंत्री" बन गए.

अमेरिका में चुनाव के दिन ट्रंप ने यह घोषणा करके चौंका दिया कि वह हर साल इसराइल को मिलने वाली क़रीब चार अरब डॉलर की अमेरिकी सहायता "इस साल के अंत में" बंद कर देंगे. हालांकि, अमेरिका और इसराइल के बीच मौजूदा सैन्य सहायता समझौता 2028 में समाप्त होना है.

फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि यह क़दम राजनीतिक वजहों से उठाया जा रहा है. उनका मकसद डेमोक्रेटिक पार्टी के वामपंथी धड़े के हाथ से एक नकारात्मक मुद्दा छीनना था. मिडटर्म चुनाव के दौरान इसराइल को दी जाने वाली अमेरिकी सहायता एक विवादास्पद मुद्दा बन गई थी.

मिडटर्म इलेक्शन
इमेज कैप्शन, मिडटर्म चुनाव में हार के बाद ट्रंप की ताक़त पहले जैसी नहीं रही

अमेरिका में इसराइल विरोधी भावना और मज़बूत हुई?

नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार में पूर्व मंत्री रहीं त्ज़िपी लिवनी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा, "नेतन्याहू ने रिपब्लिकन पार्टी पर दांव लगाया, उस गठबंधन को तोड़ दिया जिसे हमने वर्षों से दोनों पार्टियों के साथ बनाए रखा था. अब उनके पास यह वैधता साबित करने का कोई रास्ता नहीं है कि यहूदी लोगों के राष्ट्र के रूप में इसराइल के अस्तित्व का अधिकार है और हमें अपनी रक्षा करने का अधिकार है."

लिवनी ने यह टिप्पणी इसराइल के कुछ मुखर आलोचकों के चुनाव जीतने के संदर्भ में की. इसराइल के समाचार चैनल 'चैनल 14' की वेबसाइट ने बुधवार को अमेरिकी मिडटर्म इलेक्शन को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी. इस चैनल को व्यापक रूप से प्रधानमंत्री नेतन्याहू का समर्थक माना जाता है.

हालांकि, वेबसाइट ने व्हाइट हाउस की ओर से चुनावी नतीजों के बाद सोशल मीडिया पर की गई एक पोस्ट को प्रमुखता दी. इसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तस्वीर के साथ लिखा था, "ट्रंप अब भी आपके राष्ट्रपति हैं."

लंबे समय तक अमेरिका में इसराइल को डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन, दोनों पार्टियों का समर्थन हासिल रहा था. इसराइल इसे अपनी एक बड़ी रणनीतिक ताक़त मानता था.

लेकिन अमेरिकी जनमत में बदलाव के साथ ही दोनों पार्टियों में इसराइल के लिए राजनीतिक समर्थन कमज़ोर हुआ है. ख़ासकर ग़ज़ा में जारी युद्ध को लेकर. यह युद्ध सात अक्तूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में इसराइल पर हुए हमले के बाद शुरू हुआ था.

अमेरिका में इसराइल के पूर्व राजदूत माइकल ओरेन ने कहा, "फ़िलहाल एकमात्र ऐसा मुद्दा है, जिस पर दोनों पार्टियां सहमत हैं और वह है इसराइल की आलोचना."

उन्होंने अमेरिकी प्रसारक सीएनएन से कहा, "यह डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए एकजुट होने का आधार बन गया है और अब रिपब्लिकन पार्टी के भी बड़े हिस्से के लिए एकजुट होने का आधार बनता जा रहा है."

ओरेन ने कहा कि अमेरिकी सहायता का ख़त्म होना उस प्रक्रिया की सिर्फ़ शुरुआत है, जिसके प्रभाव अब सामने आने शुरू हुए हैं.

उन्होंने कहा कि इस बात की आशंका है कि अमेरिका इसराइल के साथ ख़ुफ़िया जानकारी साझा करना बंद कर सकता है. इसके अलावा आयरन डोम जैसे महत्वपूर्ण सैन्य सिस्टम के संयुक्त विकास पर भी रोक लग सकती है. आयरन डोम इसराइल की चर्चित एयर डिफेंस सिस्टम है.

उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का भी ज़िक्र किया, जहाँ रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक, दोनों पार्टियों के राष्ट्रपतियों ने अमेरिकी वीटो का इस्तेमाल कर इसराइल को संरक्षण दिया है.

उन्होंने कहा, "हम एक दौर के अंत पर पहुँच चुके हैं."

यरूशलम पोस्ट के पूर्व प्रधान संपादक याकोव काट्ज ने चेतावनी दी कि अभी और बदलाव होने बाक़ी हैं.

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "कल ट्रंप ने सैन्य सहायता को लेकर जो घोषणा की, वह उन संभावित बदलावों की सिर्फ़ एक झलक है, जो हो सकते हैं. हथियारों की बिक्री रोकी जा सकती है, प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव लाए जा सकते हैं और संयुक्त आर्थिक कार्यक्रमों की फंडिंग बंद की जा सकती है."

सीएनएन ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''ईरान के साथ युद्ध के दौरान अमेरिका में इसराइल विरोधी भावना और मज़बूत हुई. अमेरिकी मतदाताओं के एक वर्ग का मानना था कि अमेरिका और इसराइल के संयुक्त हमले एक ऐसा युद्ध था, जिसमें नेतन्याहू ने ट्रंप को शामिल होने के लिए राज़ी किया था.''

''अब भी नेतन्याहू ईरान पर दोबारा हमले शुरू करने की पैरवी कर रहे हैं. ऐसा होने पर वह युद्ध फिर भड़क सकता है, जिसके कारण गैस की क़ीमतें और जीवनयापन की लागत बढ़ी थी. इन मुद्दों ने मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के ख़राब प्रदर्शन में भी योगदान दिया.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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