ईरान ने कैसे हासिल की ड्रोन तकनीक में महारत

    • Author, अहमद रवाब
    • पदनाम, बीबीसी अरबी
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

ईरान और अमेरिका-इसराइल गठबंधन के बीच जारी टकराव के बीच, सैन्य विशेषज्ञ अकरम ख़रीफ़ की एक किताब आई है- 'अंडर द शैडो ऑफ़ अ विटनेस'.

इसमें उन्होंने ईरान में ड्रोन इंडस्ट्री की शुरुआत और उसके विकास की पड़ताल की है. उन्होंने ईरान की उस रणनीति का ज़िक्र किया है, जिसकी वजह से वह अमेरिकी पाबंदियों का सामना कर सका और ग्लोबल मिलिट्री इंडस्ट्री में एक अहम खिलाड़ी बन गया.

ईरानी ड्रोन का पहली बार ज़िक्र इसराइल सीमा पर हिज़्बुल्लाह की गतिविधियों से जुड़ी सैन्य रिपोर्टों में सामने आया. बाद में यमन में हूतियों के इस्तेमाल किए गए ड्रोन के मलबे की जांच के बाद इनका संबंध ईरानी मैन्युफ़ैक्चरिंग से जोड़ा गया.

लेकिन सितंबर 2022 में दुनिया इस हैरान कर देने वाली ख़बर से जागी कि ईरान, रूसी सेना को ड्रोन तकनीक दे रहा है. इसके बाद यूक्रेन की राजधानी कीएव के आसमान में उड़ते गेरानियम-2 (शाहिद-136) ड्रोन की पहली तस्वीरें सामने आईं.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

एक ऐसा देश जिसपर 40 साल से प्रतिबंध लगे हुए हैं, वह अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में खेल के नियम कैसे बदल सका?

1979 के बाद पाबंदियों ने ईरान के नेताओं को मजबूर किया कि वे मौजूदा विकल्पों और मुश्किलों से निकलने के तरीक़े तलाशें.

पाबंदियों की वजह से उन्होंने विदेशों में सप्लाई नेटवर्क बनाने की कोशिश की, जिससे वे अपनी ज़रूरत की चीज़ें हासिल कर सकें. उन्होंने कभी-कभी सिविल तकनीक का सहारा लिया. लेकिन सबसे अहम यह था कि संसाधनों की कमी के बावजूद, ईरानियों ने रणनीतियां विकसित कीं और उन्हें धैर्य के साथ लागू किया.

जब जनवरी 1979 में शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी ने देश छोड़ा, तो वह पीछे एक ऐसी सेना छोड़ गए जो हथियारों के मामले में क्षेत्र की सबसे मज़बूत सेना थी. ईरानी सेना के पास उस वक़्त एफ़-14 टॉमकैट, एफ-4 फ़ैंटम और एफ़-5 टाइगर विमानों जैसे फ़ाइटर जेट थे.

उस समय ईरानी सेना सैन्य उपकरणों के मामले में अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और फ़्रांस के बाद. दुनिया में पांचवें स्थान पर थी.

ख़ास तौर पर ईरानी वायुसेना जर्मनी, चीन और इसराइल से भी ज़्यादा उन्नत थी, जिसके पास एफ़-14 टॉमकैट जैसे उस समय के सबसे उन्नत विमान थे. हालांकि, इनका संचालन और रखरखाव ईरान में तैनात बड़ी संख्या में अमेरिकी तकनीशियनों और इंजीनियरों पर निर्भर था.

कलपुर्ज़े सीधे अमेरिकी कंपनी ग्रुमैन देती थी.

शाह की हुकूमत गिरने के बाद, सैन्य नेता देश छोड़कर भाग गए, मारे गए या जेल में डाल दिए गए. अमेरिकी तकनीशियन और इंजीनियर भी चले गए. अमेरिकी कंपनियों ने नई सरकार से संबंध तोड़ लिए. जिन विमानों को ईरान ने अरबों डॉलर में खरीदा था, वे बेकार हो गए.

आवश्यकता आविष्कार की जननी है

सितंबर 1980 में, इराक़ी फ़ौजों ने ईरान पर हमला किया. दोनों देशों के बीच एक ऐसा ख़ूनी युद्ध शुरू हुआ, जो आठ साल तक चला. इसमें मारकाट और तबाही के सबसे भयानक तरीक़े इस्तेमाल किए गए. इस जंग में क़रीब 10 लाख लोग मारे गए.

युद्ध के शुरुआती दौर में इराक़ी फ़ौजों को हवाई दबदबे के कारण बढ़त मिली. इराक़ी सेना ने सोवियत संघ से टोही विमान खरीदे और उनसे सैटेलाइट तस्वीरें हासिल कीं, जिससे उन्हें दुश्मन की स्थिति और उसकी गतिविधियों पर नज़र रखने में मदद मिली.

वहीं ईरानी सेना बिना स्पष्ट रणनीति के लड़ रही थी. वे न तो उन उन्नत विमानों को चला पा रही थीं जिन्हें अमेरिका ने ज़मीन पर खड़ा छोड़ दिया था और न ही अपनी ज़रूरत की तकनीक खरीद पा रही थीं.

ईरानियों को ऐसी तकनीक की सख़्त ज़रूरत थी जिससे वे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ सकें. लेकिन आर्थिक पाबंदियों ने उन्हें ज़रूरी चीज़ें खरीदने से रोक दिया. इसलिए उन्होंने तय किया कि वे दूसरों से हासिल करने के बजाय इस तकनीक को खुद ईजाद करेंगे.

आइडिया बहुत साधारण था. अगर आप दुश्मन की सीमा के ऊपर टोही विमान नहीं उड़ा सकते, तो शायद दूर से नियंत्रित किए जाने वाले ऐसे उपकरण भेज सकते हैं जो सस्ते हों और पकड़ में भी कम आएं.

ईरानियों ने 1981 से ही इन छोटे उपकरणों पर सोचना शुरू कर दिया था. उन्होंने इनमें कैमरे लगाने पर सोच विचार किया. यह विचार इस्फ़हान यूनिवर्सिटी से आया. छात्रों और इंजीनियरों ने इस पर काम किया. उन्होंने डिज़ाइन, निर्माण, परीक्षण और प्रोटोटाइप विकसित की और फिर इन्हें रिवोल्यूशनरी गार्ड की सेना के सामने पेश किया.

यह बहुत आसान और शुरुआती उपकरण था. प्लास्टिक के टुकड़े और बोर्ड, और पक्के इरादों वाले दिमाग़.

यूनिवर्सिटी में एक साधारण वर्कशॉप में आने वाले स्टूडेंट "कंस्ट्रक्शन जिहाद" और "यूनिवर्सिटी जिहाद" जैसे शब्दों में यक़ीन रखते थे. इस्लामिक क्रांति के बाद देश की सरकार ने इन शब्दों को अपनाया था.

सालों की कोशिशों, नाकामियों और लगातार मेहनत के बीच, तीन युवा इस्फ़हान की यूनिवर्सिटी वर्कशॉप में डिज़ाइन बना रहे थे और फिर ख़ुज़ेस्तान के मैदानों में उनका परीक्षण कर रहे थे.

एक सिविल पायलट था जिसका नाम फ़रशीद था, दूसरा फ़िज़िक्स का छात्र सईद और तीसरा एक पेशेवर सुनार मसूद ज़ाहेदी था.

जब उन्होंने पहली बार यह प्रोटोटाइप सैन्य अधिकारियों को दिखाया, तो कुछ ने इसका मज़ाक़ उड़ाया. यह किसी बच्चे के खिलौने जैसा लग रहा था, जो इधर उधर की चीज़ों से बना था. इसका फ़्यूल टैंक अस्पताल में इस्तेमाल होने वाला आईवी बैग था.

पहला कॉम्बैट ड्रोन

1983 में मोर्चे से 40 किलोमीटर दूर, यह 'खिलौना' विमान पहली बार इराक़ी फ़ौजों की पोजीशंस के ऊपर उड़ा. यह सैन्य ठिकानों की साफ़ तस्वीरों के साथ वापस लौटा.

इसके बाद थंडर बटालियन बनाने और ड्रोन विकास का औपचारिक कार्यक्रम शुरू करने के आदेश दिए गए. यह कार्यक्रम इस्फ़हान यूनिवर्सिटी के छात्र वर्कशॉप से निकलकर रिवोल्यूशनरी गार्ड के सैन्य कमांडरों तक पहुंचा.

ज़रूरी पुर्ज़े हासिल करने के लिए उन्हें देश पर लगी पाबंदियों को दरकिनार करना पड़ा और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुंच बनानी पड़ी. रिवोल्यूशनरी गार्ड ने दुबई में कंपनियों का नेटवर्क बनाया और सिंगापुर में बिचौलियों के ज़रिए दर्जनों देशों से अलग-अलग हिस्सों में पुर्ज़े खरीदे. इन्हें इस्फ़हान भेजा गया, जहां उन्हें जोड़ा गया.

यही वजह है कि यूक्रेन में गिराए गए शाहिद-136 ड्रोन में अमेरिकी चिप्स पाए गए.

ड्रोन ने अपनी टोही क्षमता साबित की और 1983 के बाद ईरानी फ़ौजों ने इराक़ी फ़ौजों के ख़िलाफ़ अहम लड़ाइयों में इनका इस्तेमाल किया.

ईरान की राद बटालियन के इंजीनियर और सैन्य अधिकारी 1987 से ही लड़ाकू ड्रोन विकसित करने के बारे में सोचने लगे थे.

ये सोच थी एक ऐसे ड्रोन की जो दुश्मन के ऊपर उड़कर उसकी गतिविधियों की वीडियो बनाता है अगर उसमें हथियार लगा दिए जाएं तो वह हमला कर सकता है और उसे नष्ट कर सकता है.

लेकिन इसके लिए अलग तरह की तकनीक और क्षमता चाहिए, जिसे बाद में राद ब्रिगेड ने विकसित किया और 'मुहाजिर' नाम के लड़ाकू ड्रोन बनाए.

1988 में ईरान उन शुरुआती देशों में था जिसने हथियारबंद मानव रहित विमान यानी ड्रोन का इस्तेमाल किया. आज अमेरिका, तुर्की और इसराइल इनके निर्माण के लिए मशहूर हैं, लेकिन इस क्षेत्र में ईरान भी शुरुआती देशों में शामिल था.

1988 में ईरानी ड्रोन काफ़ी अनगढ़ थे, जिनकी रेंज 50 किलोमीटर से ज़्यादा नहीं थी.

2026 तक उनके उन्नत ड्रोन कई देशों के हवाई क्षेत्र से होते हुए इसराइल में लक्ष्यों पर हमला कर चुके हैं, जिन्हें ईरानी क्षेत्र से लॉन्च किया गया था.

असल में, अमेरिका समेत इसराइल उन पहले देशों में था जिसने सैन्य मक़सद के लिए मानव रहित विमान का इस्तेमाल किया. 1973 के युद्ध में उसने इनका इस्तेमाल मिस्र की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों को भ्रमित और कमज़ोर करने के लिए किया.

यही सिद्धांत बाद में ईरानी ड्रोन कार्यक्रम में अपनाया गया.

1982 में लेबनान पर हमले के दौरान, इसराइल ने अपने स्काउट और मैस्टिफ़ ड्रोन का इस्तेमाल सीरियाई मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाने के लिए किया. यह सशस्त्र संघर्ष में लड़ाकू ड्रोन का पहला इस्तेमाल था.

बदलता नज़रिया

ईरानी विशेषज्ञों ने लेबनान में हो रहे विकास पर क़रीबी नज़र रखी. हिज़्बुल्लाह में उनके सहयोगियों ने उन्हें इसराइली ड्रोन के बारे में सटीक जानकारी जुटाने में मदद की.

उन्होंने पाया कि ये ड्रोन बहुत जटिल नहीं थे और उनके विशेषज्ञ ऐसा ही उपकरण बना सकते थे.

कई सैन्य विश्लेषकों ने अपनी रिपोर्टों में बताया कि शुरुआती ईरानी ड्रोन मॉडल में इसराइली स्काउट और मैस्टिफ़ ड्रोन जैसी कई विशेषताएं थीं. उनका मानना है कि ईरानी इंजीनियरों ने इन विशेषताओं के लिए इसराइली मॉडलों से प्रेरणा ली.

1970 के दशक से यह माना जाता रहा है कि सबसे उन्नत तकनीक वाला हथियार सबसे प्रभावी होता है.

तब ये मान्यता थी कि हज़ार किलोमीटर दूर से सटीक निशाने पर गिरने वाली एक अकेली गाइडेड मिसाइल, बिना सटीक निशाने वाले सैकड़ों गोलों से बेहतर होती है.

ईरानियों ने इस सैन्य समीकरण में एक नया विचार जोड़ा. अगर उनका देश तकनीकी विकास में अपने विरोधियों से मुक़ाबला नहीं कर सकता, तो उसे संख्या और आर्थिक लागत में उनसे मुक़ाबला करना चाहिए. यही विचार ईरानी ड्रोन कार्यक्रम की बुनियाद बना.

एक ईरानी ड्रोन 20,000 डॉलर में बन जाता है. ये 20 लाख डॉलर की क्रूज़ मिसाइल का मुक़ाबला नहीं कर सकता लेकिन अगर 100 ड्रोन भेजे जाएं, तो दुश्मन को उन्हें रोकने के लिए 100 क्रूज़ मिसाइलें दागनी होंगी, या शायद उससे भी ज़्यादा.

ड्रोन का मक़सद सटीक और ताक़तवर हमला करना नहीं, बल्कि दुश्मन की रक्षा व्यवस्था को थकाना और उसके बजट पर दबाव डालना है. ईरानी हमले लंबे समय तक जारी रह सकते हैं क्योंकि वे दुश्मन की मिसाइल रक्षा प्रणाली से 10 से 20 गुना सस्ते होते हैं.

एक साधारण हिसाब बताता है कि 100 ड्रोन लॉन्च करने में हमलावर देश को 20 लाख डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. वहीं अपनी रक्षा करने वाले देश को इन्हें रोकने के लिए 20 करोड़ डॉलर खर्च करने पड़ सकते हैं, चाहे नुकसान कितना भी हो.

ड्रोन की एक और ख़ासियत है कि इन्हें रडार से पकड़ना मुश्किल होता है, क्योंकि ये धीमी गति से और कम ऊंचाई पर उड़ते हैं. इसके अलावा, बड़ी संख्या में इन्हें एक साथ भेजने से रक्षा प्रणाली पर दबाव पड़ता है और कभी-कभी वह सभी को रोक नहीं पाती.

2019 में सऊदी अरामको के तेल संयंत्र पर हमला इस क्षमता के कारगर होने को दिखाता है. अमेरिकी रक्षा प्रणाली ईरानी ड्रोन को रोकने में नाकाम रही. हालांकि हूतियों ने इसकी ज़िम्मेदारी ली, लेकिन आम तौर पर माना जाता है कि ड्रोन ईरान या इराक़ से लॉन्च किए गए थे.

अरामको प्लांट पर हमले से अरबों डॉलर का नुकसान हुआ, जबकि हमला करने वाले ड्रोन्स की लागत कुछ मिलियन डॉलर ही थी.

ड्रोन युद्ध में कौन जीतता है और कौन हारता है, इस बात को यही फ़र्क तय करता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)