सौर मंडल के बाहर पृथ्वी जैसे ग्रह पर पहली बार वायुमंडल मिलने के सबूत

लाल तारा

इमेज स्रोत, Melissa Weiss/Center for Astrophysics |Harvard & Smithsonian

इमेज कैप्शन, कल्पना आधारित चित्र: लाल तारे की परिक्रमा कर रहे चट्टानी ग्रह के चारों ओर वायुमंडल को लाल आभा के रूप में दिखाया गया है
    • Author, पल्लब घोष
    • पदनाम, विज्ञान संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 4 मिनट

शोधकर्ताओं ने पहली बार किसी सुदूर तारे में परिक्रमा कर रहे पृथ्वी जैसे चट्टानी ग्रह के चारों ओर वायुमंडल का पता लगाया है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज अब तक का सबसे मजबूत सबूत है कि हमारे सौर मंडल के बाहर भी पृथ्वी जैसी परिस्थितियों वाले ग्रह मौजूद हो सकते हैं.

इस ग्रह के वायुमंडल में हीलियम गैस मिली है. हीलियम अपने आप में जीवन के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि वहां दूसरी गैसें भी मौजूद हो सकती हैं.

इस शोध के प्रमुख लेखक, हार्वर्ड विश्वविद्यालय के डॉ. कॉलिन चेरुबिम ने इस खोज को "बहुत बड़ी उपलब्धि" बताया.

उन्होंने कहा, "यह पहली बार है जब किसी दूसरे तारे के रहने योग्य क्षेत्र में मौजूद किसी चट्टानी ग्रह पर वायुमंडल का पता चला है."

एलएचएस 1140 बी (एलएचएस 1140 b) नाम का यह ग्रह पृथ्वी से 48 प्रकाश वर्ष दूर है.

यह एक ऐसे लाल तारे की परिक्रमा करता है, जो हमारे सूर्य से काफी छोटा और ठंडा है.

अब तक वैज्ञानिक दूर स्थित तारों की परिक्रमा करने वाले 6,000 से अधिक ग्रहों की खोज कर चुके हैं.

लेकिन यह नई खोज इसलिए ख़ास है, क्योंकि इससे विज्ञान के सबसे बड़े लक्ष्यों में से एक,किसी दूसरे ग्रह पर जीवन की खोज, की दिशा में एक और अहम कदम बढ़ा है.

'साइंस' पत्रिका में प्रकाशित इस शोध के लेखक साफ़ कहते हैं कि उन्होंने अभी तक किसी दूसरे ग्रह पर जीवन की खोज नहीं की है.

''लेकिन किसी ग्रह पर जीवन की संभावना के लिए वहां पानी का होना ज़रूरी है. और पानी तभी मौजूद रह सकता है, जब ग्रह अपने तारे से सही दूरी पर हो.''

''अगर वह तारे के बहुत करीब होगा, तो वहां बहुत ज़्यादा गर्मी होगी. अगर बहुत दूर होगा, तो वहां अत्यधिक ठंड होगी. इसलिए ग्रह ऐसी दूरी पर होना चाहिए, जहां तापमान न बहुत गर्म हो और न बहुत ठंडा, बल्कि जीवन के लिए अनुकूल हो.''

'गोल्डिलॉक्स ज़ोन'

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ग्रह विज्ञान के विशेषज्ञ इसे "गोल्डिलॉक्स ज़ोन" कहते हैं. यह नाम एक लोककथा की लड़की गोल्डिलॉक्स के नाम पर रखा गया है, जिसे अपने दलिये का तापमान बिल्कुल सही चाहिए होता था, न बहुत गर्म और न बहुत ठंडा.

अब तक वैज्ञानिक अपने-अपने तारों के गोल्डिलॉक्स ज़ोन में सैकड़ों ग्रह खोज चुके हैं.

लेकिन इनमें से केवल कुछ दर्जन ही ऐसे हैं जो पृथ्वी की तरह छोटे और चट्टानी हैं. यह भी इस बात का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है कि ऐसे ग्रहों पर जीवन की संभावना हो सकती है.

लेकिन अब तक इनमें से किसी भी ग्रह पर वायुमंडल नहीं मिला था.

अब पहली बार ऐसा हुआ है.

हालांकि, अभी तक इस ग्रह के वायुमंडल में केवल हीलियम गैस का पता चला है.

संभव है कि यह ऊपरी वायुमंडल में मौजूद हो. अकेले हीलियम जीवन के लिए अनुकूल नहीं है.

लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि वायुमंडल की निचली परतों में जीवन के लिए अधिक अनुकूल दूसरी गैसें भी मौजूद हो सकती हैं.

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के ही डॉ. डेविड शार्बोनो ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे सौर मंडल के बाहर पहली बार किसी पृथ्वी जैसे ग्रह पर वायुमंडल मिला है.

उन्होंने कहा, "लोग हमेशा बड़े सवालों के जवाब जानना चाहते हैं. क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं?

''क्या पृथ्वी या हमारे सौर मंडल के बाहर भी जीवन है? इस दिशा में यह अध्ययन एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि इसमें पहली बार हमारे सौर मंडल के बाहर किसी तारे के रहने योग्य क्षेत्र में मौजूद चट्टानी ग्रह पर वायुमंडल का पता चला है."

हालांकि, जीवन की तलाश में वैज्ञानिकों की नज़र केवल एलएचएस 1140 बी पर ही नहीं है.

के2-18बी नाम के एक सब-नेपच्यून ग्रह में भी वैज्ञानिकों की खास दिलचस्पी है.

माना जाता है कि इसके भीतर पानी से भरपूर हिस्सा हो सकता है. यह ग्रह तब सुर्खियों में आया था, जब वैज्ञानिकों ने वहां डाइमेथाइल सल्फाइड नामक गैस के संकेत देखे थे.

पृथ्वी पर यह गैस समुद्री जीवों से जुड़ी मानी जाती है.

लेकिन 2025 में नासा के नेतृत्व में हुए दोबारा विश्लेषण से पता चला कि यह संकेत इतना मजबूत नहीं था कि उसकी पुष्टि की जा सके.

साथ ही यह भी सामने आया कि यह गैस जीवन के बिना भी प्राकृतिक प्रक्रियाओं से बन सकती है.

इसी तरह ट्रैपिस्ट-1 तारे की परिक्रमा करने वाले सात चट्टानी ग्रह भी वैज्ञानिकों के लिए अब तक रहस्य बने हुए हैं.

नासा की जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने ट्रैपिस्ट-1डी पर पृथ्वी जैसे वायुमंडल की संभावना को ख़ारिज कर दिया है.

वहीं ट्रैपिस्ट-1ई के बारे में मिले आंकड़े अभी भी इतने स्पष्ट नहीं हैं कि कोई ठोस निष्कर्ष निकाला जा सके.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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