ईरान के तेल का राष्ट्रीयकरण करने वाले मोसद्देग़ जिनका तख़्तापलट कर दिया गया

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- Author, वलीद बदरान
- पदनाम, बीबीसी
- पढ़ने का समय: 13 मिनट
डॉक्टर मोहम्मद मोसद्देग़ ने 28 अप्रैल, 1951 को जब ईरान सरकार के प्रधानमंत्री पद की बागडोर संभाली तब आंतरिक और बाहरी परिस्थितियां जटिल थीं.
एक ओर ईरानी सेनाओं और दूसरी ओर ब्रिटेन के नेतृत्व वाली औपनिवेशिक शक्तियों के बीच इच्छाशक्ति का संघर्ष चल रहा था.
यह उभार एक लंबे राजनीतिक और बौद्धिक सफ़र का नतीजा था, जिसमें मोसद्देग़ बीसवीं सदी की शुरुआत से ही शामिल रहे.
उन्होंने ईरान में हुए बड़े बदलावों को देखा और उनमें हिस्सा लिया- संवैधानिक क्रांति से लेकर तेल विवाद तक- जिसने ईरान के इतिहास को नई दिशा दी.
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के मुताबिक़, मोहम्मद मोसद्देग़ का जन्म 1880 में तेहरान, ईरान में हुआ था और 5 मार्च, 1967 को तेहरान के उत्तर-पश्चिम में कराज के पास अहमदबाद गांव में उनके घर पर उनका निधन हो गया.
वह एक ईरानी राजनेता थे जिन्होंने ईरान में विशाल ब्रिटिश तेल निवेशों का राष्ट्रीयकरण किया था.
1951 से 1953 तक प्रधानमंत्री के रूप में, वो शाह को सत्ता से हटाने में लगभग सफल हो गए थे.
उनका प्रधानमंत्रित्व काल अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा रची गई एक कुख्यात तख़्तापलट की साज़िश के साथ समाप्त हुआ.
प्रारंभिक जीवन और करियर
मोसद्देग़ का जन्म एक कुलीन परिवार में हुआ था जो सत्तारूढ़ काजर राजवंश के क़रीबी था, जिसके कारण उन्हें उत्कृष्ट शैक्षिक अवसर प्राप्त हुए.
उन्होंने यूरोप में अध्ययन किया, स्विट्ज़रलैंड के लॉज़ेन विश्वविद्यालय से कानून में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की और फिर 1914 में ईरान लौट आए, जहां उन्हें महत्वपूर्ण फ़ार्स प्रांत का गवर्नर-जनरल नियुक्त किया गया.

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1921 में सैन्य तख़्तापलट के बाद रज़ा ख़ान के सत्ता में आने पर उन्होंने सरकार में काम करना जारी रखा, वित्त मंत्री के रूप में और फिर थोड़े समय के लिए विदेश मंत्री के रूप में कार्य किया.
मोसद्देग़ 1923 में मजलिस (संसद) के लिए चुने गए, लेकिन जब 1925 में मजलिस ने काजर वंश को हटाकर रज़ा ख़ान को रज़ा शाह पहलवी के नाम से शाह बना दिया, तो मोसद्देग़ ने इस क़दम का विरोध किया, जिसके कारण उन्हें राजनीतिक जीवन से सेवानिवृत्त होना पड़ा.
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, विशेष रूप से अगस्त 1941 में, ब्रिटिश और सोवियत सेनाओं ने ईरान पर आक्रमण किया, जिसे "ईरान पर एंग्लो-सोवियत आक्रमण" के नाम से जाना गया.
इसका मुख्य कारण मित्र देशों की रज़ा शाह के नाज़ी जर्मनी के साथ संबंधों में सुधार और देश में जर्मन विशेषज्ञों की उपस्थिति को लेकर आशंकाएँ थीं.
साथ ही इसकी वजह जर्मन विशेषज्ञों को निष्कासित करने की मित्र देशों की मांगों को रज़ा शाह द्वारा नकारने और सोवियत संघ के लिए आपूर्ति गलियारे (फ़ारसी आपूर्ति मार्ग) के रूप में ईरान के रणनीतिक महत्व को बताया जाता है.
ब्रिटिश और सोवियत सेनाओं के प्रवेश के बाद, रज़ा शाह को सितंबर 1941 में अपने बेटे मोहम्मद रज़ा पहलवी के पक्ष में गद्दी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा और बाद में उन्हें विदेश निर्वासित कर दिया गया, जहां 1944 में दक्षिण अफ़्रीका में उनकी मृत्यु हो गई.
मोसद्देग़ 1944 में सार्वजनिक जीवन में लौटे और सलाहकार सभा के लिए पुनः निर्वाचित हुए.
1949 में, उन्होंने और कुछ राजनेताओं एवं बुद्धिजीवियों ने मिलकर राष्ट्रीय मोर्चा पार्टी की स्थापना की. यह एक राजनीतिक गठबंधन था जिसका मुख्य लक्ष्य राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्त करना, लोकतंत्र स्थापित करना और ईरानी अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से तेल क्षेत्र पर विदेशी, विशेषकर ब्रिटिश प्रभुत्व को समाप्त करना था.
उन्होंने उत्तरी ईरान में सोवियत संघ को तेल रियायत दिए जाने का विरोध करने में अग्रणी भूमिका निभाई, जो देश के दक्षिण में मौजूदा ब्रिटिश रियायत के समान थी.
नेता के रूप में उदय
तेल का मुद्दा ही वह मुख्य आधार था जिसके ज़रिए मोसद्देग़ सत्ता में आए. एंग्लो-ईरानी ऑयल कंपनी, जो बाद में ब्रिटिश पेट्रोलियम बन गई, बीसवीं शताब्दी की शुरुआत से ही ईरानी तेल पर नियंत्रण रखती थी.
ईरानियों का मानना था कि उनके अनुबंध अनुचित थे, क्योंकि राजस्व का सबसे बड़ा हिस्सा ब्रिटेन को मिलता था, जबकि ईरान को बहुत सीमित मात्रा में ही लाभ होता था.
इस स्थिति ने व्यापक जन असंतोष को जन्म दिया, विशेष रूप से ईरानी जनता द्वारा झेली जा रही ग़रीबी को देखते हुए.
मोहम्मद मोसद्देग़ ने काफ़ी राजनीतिक शक्ति का निर्माण किया, जो बहुत हद तक ईरान में एंग्लो-ईरानी ऑयल कंपनी को दिए गए क़ानूनी, आर्थिक अधिकारों और संयंत्रों के राष्ट्रीयकरण के उनके आह्वान पर आधारित थी.

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मार्च 1951 में, सलाहकार सभा ने उनके द्वारा प्रस्तावित तेल राष्ट्रीयकरण क़ानून पारित कर दिया. उनकी शक्ति इतनी बढ़ गई कि मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी को 28 अप्रैल को उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त करने पर विवश होना पड़ा.
टाइम पत्रिका ने 1951 में मोसद्देग़ को पर्सन ऑफ़ द ईयर चुना था.
उनका प्रधानमंत्री बनना महज़ एक राजनीतिक बदलाव नहीं था, बल्कि ईरानी आबादी के एक बड़े हिस्से के सार्वजनिक मनोभाव में आए गहरे परिवर्तन की अभिव्यक्ति थी, जो दशकों के विदेशी हस्तक्षेप के बाद वास्तविक स्वतंत्रता की कामना कर रहे थे.
मोसद्देग़ को समाज के कई वर्गों का व्यापक समर्थन प्राप्त था, जिनमें मध्यम वर्ग, श्रमिक, छात्र और कई धार्मिक व्यक्ति शामिल थे, जो उन्हें ईमानदारी और देशभक्ति का प्रतीक मानते थे.
राष्ट्रीयकरण के उनके फ़ैसले ने विंस्टन चर्चिल के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सरकार के साथ टकराव की स्थिति पैदा कर दी, जिसने प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने से कुछ समय पहले एंग्लो-ईरानी ऑयल कंपनी में बहुमत हिस्सेदारी ख़रीद ली थी और उसके पास ईरान में तेल निकालने के अधिकार थे.
चर्चिल का मानना था कि अगर मोसद्देग़ के इस क़दम को एक मिसाल बनने दिया गया, तो विश्व स्तर पर ब्रिटिश साम्राज्यवादी प्रभाव ख़तरे में पड़ जाएगा. शुरुआत में, अमेरिका तटस्थ रहा, यहां तक कि उसका झुकाव मोसद्देग़ का समर्थन करने की ओर भी नज़र आया था. लेकिन, ईरानी पक्ष के अनुसार, 'शातिर' अंग्रेज़ों ने उसे अपना रुख़ बदलने के लिए राज़ी कर लिया.
इस बीच, 1953 में निर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइज़नहावर को आशंका थी कि मोसद्देग़ का उदारवादी दृष्टिकोण साम्यवाद के उदय का कारण बनेगा.
राष्ट्रीयकरण के फैसले ने ईरान में राजनीतिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर संकट को और बढ़ा दिया, क्योंकि मोहम्मद मोसद्देग़ और उनकी 'नेशनल फ्रंट' पार्टी के प्रति देश और विदेश दोनों जगह विरोध तेज़ हो गया.

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घरेलू स्तर पर, मोसद्देग़ को कई ताकतों के विरोध का सामना करना पड़ा, जिनमें मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी के नेतृत्व वाला शाही दरबार भी शामिल था, जो प्रधानमंत्री के बढ़ते प्रभाव से भयभीत था. साथ ही कुछ राजनीतिक ताकतें भी थीं जो उनकी नीतियों को अपने हितों के लिए ख़तरा मानती थीं. मोसद्देग़ और सेना के बीच संबंध भी अस्थिर थे, जिससे राजनीतिक परिदृश्य और भी जटिल हो गया था.
विदेशी मोर्चे पर, ब्रिटेन ने राष्ट्रीयकरण के बाद ईरानी तेल के व्यापक आर्थिक बहिष्कार और प्रतिबंध का नेतृत्व किया, जिससे तेल निर्यात लगभग ठप हो गया. संकट तब और गहरा गया जब मोसद्देग़ की सरकार वैकल्पिक निर्यात बाज़ार खोजने के लिए संघर्ष करती रही, जिससे राजस्व में और कमी आई और व्यापक आर्थिक गिरावट आई.
ब्रिटेन ने राष्ट्रीयकरण के फ़ैसले को चुनौती देने के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में अपील करके मोसद्देग़ की सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिश की. हालांकि, न्यायालय ने कहा कि उसके पास इस मामले पर विचार करने का अधिकार क्षेत्र नहीं है. फिर भी, प्रतिबंध के परिणामस्वरूप उत्पन्न आर्थिक संकट ने ईरान की आंतरिक स्थिति को काफ़ी प्रभावित किया.
इन चुनौतियों के बावजूद, मोसद्देग़ ने एक व्यापक सुधार कार्यक्रम लागू करने का प्रयास किया, जिसमें शाह की शक्तियों को कम करना, संसद की भूमिका को मज़बूत करना और लोकतंत्र की नींव स्थापित करना शामिल था.
हालांकि, ये प्रयास जटिल आंतरिक और बाहरी संतुलन से टकरा गए. अमेरिका, जो शुरू में ईरान की मांगों के प्रति सहानुभूति रखता था, शीत युद्ध के बढ़ते प्रकोप के मद्देनज़र इस मामले में शामिल हो गया और सोवियत संघ के साथ संभावित संबंधों में सुधार के डर से मोसद्देग़ को संदेह की नज़र से देखने लगा.
1953 का तख़्तापलट

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ईरान में मोसद्देग़ और शाह के बीच सत्ता संघर्ष शुरू हो गया. अगस्त 1953 में, जब शाह ने ब्रिटेन की सलाह पर प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने की कोशिश की, तो मोसद्देग़ समर्थकों की भीड़ सड़कों पर उतर आई और शाह को देश छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया.
लेकिन महज़ कुछ ही दिनों के भीतर, मोसद्देग़ के विरोधियों ने उनकी सरकार को उखाड़ फेंका और अमेरिका और ब्रिटेन की रची एक साज़िश के तहत शाह को फिर से सत्ता में स्थापित कर दिया.
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार, 1953 के तख़्तापलट में अमेरिका और ब्रिटेन ने पैसा लगाया था, जिसके परिणामस्वरूप मोहम्मद मोसद्देग़ को सत्ता से हटा दिया गया और मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी ईरान के शासक के रूप में वापस आ गए. ईरान की राजधानी तेहरान की सड़कों पर हुए संघर्षों में लगभग 300 लोग मारे गए थे.
जब शाह द्वारा मोहम्मद मोसद्देग़ को बर्ख़ास्त करने का विचार विफल हो गया, तो ब्रिटेन ने ईरानी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए तख़्तापलट करने की कोशिश की. लेकिन वह अकेले ज़िम्मेदारी लेने में हिचकिचा रहा था, इसलिए उसने शीत युद्ध से संबंधित आशंकाओं का फायदा उठाते हुए अमेरिका को इसमें शामिल होने के लिए मनाने की कोशिश की.
उसने इस डर का लाभ उठाया कि साम्यवाद के अपने घोषित विरोध के बावजूद मोसद्देग़, ईरानी कम्युनिस्ट तुदेह पार्टी के साथ गठबंधन करने के लिए इच्छुक थे.
अमेरिका ने 'ऑपरेशन एजेक्स' नामक एक गुप्त अभियान का नेतृत्व किया. इसके तहत सीआईए द्वारा वित्त पोषित एजेंटों का इस्तेमाल ईरान में अशांति फैलाने, दुष्प्रचार अभियान चलाने, गुंडों और राजनेताओं को भुगतान करने और दस्तावेज़ों की जालसाज़ी करने के लिए किया गया था. इन प्रयासों को अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइज़नहावर ने आधिकारिक तौर पर मंज़ूरी दी थी.
19 अगस्त 2013 को, अमेरिकी केंद्रीय खुफ़िया एजेंसी (सीआईए) ने आधिकारिक तौर पर तख़्तापलट में अपनी भूमिका और दस्तावेज़ को सार्वजनिक किया. इनमें उस योजना का विवरण दिया गया था जिसका नेतृत्व उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट के पोते, ऑफ़िसर केर्मिट रूज़वेल्ट जूनियर ने किया था.
अगस्त 1953 में महज़ चार दिनों के भीतर, रूज़वेल्ट ने ईरानी सरकार को अस्थिर करने के लिए दो तख़्तापलट के प्रयास किए, जिससे ईरान और अमेरिका के बीच संबंध हमेशा के लिए बदल गए.
'ऑल द शाह्स मेन' के लेखक स्टीफ़न किंजर के अनुसार, रूज़वेल्ट ने मीडिया संस्थानों को रिश्वत देकर और मोसद्देग़ विरोधी प्रचार फैलाकर ईरानी प्रेस पर शीघ्र ही नियंत्रण हासिल कर लिया. उन्होंने धर्मगुरुओं से भी सहयोग लिया और शाह को यह विश्वास दिलाया कि मोसद्देग़ उनके लिए ख़तरा हैं.
अंतिम चरण में रात के समय मोसद्देग़ को उनके घर से गिरफ़्तार करने का प्रयास किया गया, लेकिन पहला तख़्तापलट विफल हो गया, क्योंकि मोसद्देग़ को इसकी जानकारी मिल गई थी और उन्होंने इसका सामना किया. अगली सुबह उन्होंने रेडियो के माध्यम से जीत की घोषणा की.
मोसद्देग़ को लगा कि वह सुरक्षित हैं, लेकिन रूज़वेल्ट ने अपनी योजना नहीं छोड़ी. उन्होंने अगले ही दिन दूसरा तख़्तापलट करवाया और इस बार वह सफल रहा.
19 अगस्त, 1953 को तेहरान में मोसद्देग़ के तख़्तापलट का निर्णायक मोड़ आया. शाह के प्रति वफ़ादार अधिकारियों के समर्थन से ईरानी सेना की टुकड़ियों ने सड़कों, सरकारी इमारतों और रेडियो स्टेशन पर कब्ज़ा कर लिया.
राजधानी में अराजकता बढ़ने लगी और नागरिक समूह भी आंदोलन में शामिल हो गए, जिससे सरकार धीरे-धीरे नियंत्रण खो बैठी और मोसद्देग़ विरोधी ताकतों को अपनी शक्ति मज़बूत करने और उन्हें गिरफ़्तार करने का मौका मिल गया. उनकी जगह जनरल फ़ज़लुल्लाह ज़ाहेदी को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया.

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मोसद्देग़ को सत्ता से बेदख़ल किए जाने के महीनों बाद, तख़्तापलट की योजना बनाने वालों में से एक, डोनाल्ड विल्बर द्वारा लिखे गए अमेरिकी ख़ुफ़िया दस्तावेज़ों में से एक में कहा गया है, "सेना तुरंत शाह समर्थक आंदोलन में शामिल हो गई, और दोपहर तक यह स्पष्ट हो गया कि कुछ अन्य क्षेत्रों के साथ, तेहरान, शाह समर्थक स्ट्रीट समूहों और सेना इकाइयों के नियंत्रण में था. 19 अगस्त के अंत तक, मोसद्देग़ सरकार के सदस्य या तो छिप गए थे या गिरफ़्तार कर लिए गए थे."
विल्बर ने लिखा, "हमने देखा कि ईरान के 'आयरन कर्टेन' के पीछे हो जाने का वास्तविक ख़तरा था. अगर ऐसा हो जाता तो यह शीत युद्ध में सोवियत संघ के लिए एक जीत होती, और मध्य पूर्व में पश्चिम के लिए एक बड़ा झटका होता."
मोसद्देग़ को तीन साल के लिए जेल में डाल दिया गया, फिर उन्होंने अपना शेष जीवन नज़रबंदी में बिताया.
आज इतिहासकार आम तौर पर इस बात से सहमत हैं कि 1953 के तख़्तापलट ने 1979 की इस्लामी क्रांति की नींव रखी, जिसमें शाह को सत्ता से हटा दिया गया और निर्वासित कर दिया गया.
मृत्यु और विरासत
5 मार्च 1967 को, डॉक्टर मोहम्मद मोसद्देग़ का निधन तेहरान के उत्तर-पश्चिम में कराज के पास स्थित अहमदबाद गांव में उनके घर में नज़रबंदी के दौरान हुआ. उनकी विरासत ईरानी स्मृति में राष्ट्रीय संघर्ष का प्रतीक बनी हुई है, जहां उन्हें महाशक्तियों के सामने ईरान के लिए सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रयास करने वाले सबसे प्रमुख नेताओं में से एक माना जाता है.
वह ईरानी राजनीतिक विमर्श में एक सशक्त व्यक्तित्व बने हुए हैं, जहां उन्हें बाद के कालखंडों में व्याप्त भ्रष्टाचार और गुलामी के विपरीत, ईमानदारी और देशभक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. इसके अलावा, तेल का मुद्दा, जो उनके संघर्ष का केंद्र था, आज भी ईरानी अर्थव्यवस्था और राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, मोसद्देग़ उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष का एक वैश्विक प्रतीक बन गए, क्योंकि दुनिया भर के मुक्ति आंदोलनों ने उनके अनुभव से प्रेरणा ली, विशेष रूप से प्राकृतिक संसाधनों के राष्ट्रीयकरण के संबंध में.
उनके तख़्तापलट के बाद, ईरान ने अपने तेल संयंत्रों पर नाममात्र की संप्रभुता बरकरार रखी, लेकिन 1954 में हुए एक समझौते के तहत, उसने राजस्व को एक अंतरराष्ट्रीय संघ के साथ साझा किया जो उत्पादन और विपणन को नियंत्रित करता था.

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मोहम्मद मोसद्देग़ ने 1901 में ताज अल-मुलुक से विवाह किया. वह ईरान के पूर्व काजर राजवंश की वंशज थीं. उनके परिवार के बारे में ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, उनके दो बेटे अहमद और गुलाम हुसैन और तीन बेटियां मंसूरेह, ज़िया अशरफ़ और ख़दीजा थीं.
शीत युद्ध के दौरान अंतरराष्ट्रीय संबंधों को समझने के लिए मोसद्देग़ के अनुभवों का अध्ययन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. यह वह दौर था जब आर्थिक हित रणनीतिक विचारों से इस कदर जुड़े हुए थे कि विदेशी हस्तक्षेपों ने राष्ट्रों के भविष्य पर गहरा प्रभाव डाला. 1953 का तख़्तापलट ऐसे हस्तक्षेपों का एक उत्कृष्ट उदाहरण बन गया, जिसमें राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए मीडिया हेरफेर से लेकर गुप्त अभियानों तक विभिन्न प्रकार के साधनों का प्रयोग किया गया.
अंत में, यह कहा जा सकता है कि 28 अप्रैल, 1951 को मोहम्मद मोसद्देग़ का प्रधानमंत्री पद ग्रहण करना महज़ एक क्षणिक घटना नहीं थी, बल्कि एक ऐतिहासिक क्षण था जिसने संपूर्ण जनता की स्वतंत्रता और आज़ादी की आकांक्षाओं को मूर्त रूप दिया. हालांकि इस अनुभव का अंत दुखद रहा, फिर भी इसका प्रभाव दशकों तक न केवल ईरान में, बल्कि पूरे विश्व में कायम रहा, जहां यह राष्ट्रीय संप्रभुता और गरिमा के संघर्ष का प्रतीक बन गया.
प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान मोसद्देग़ के व्यक्तिगत आचरण ने भी अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया, जिसमें कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में पायजामा पहनना, परामर्श सभा को अपने बिस्तर से भाषण देना (जिसे उनके कमरे में लाया जाता था), और सार्वजनिक रूप से बार-बार रोना शामिल था.
उनके समर्थकों ने इस व्यवहार को उनकी बीमारी का परिणाम बताया, जबकि उनके आलोचकों ने इसे उनके उल्लेखनीय जनसंपर्क कौशल का प्रदर्शन माना.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


































