रावलाकोट-मीरपुर में हिंसक झड़पों में कई लोगों की मौत की इस संगठन ने की आलोचना, भारत भी बोला

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पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के रावलाकोट और मीरपुर में हुई हिंसक झड़पों में रेंजर्स के एक जवान समेत दो लोगों की मौत की पुष्टि हुई है. यहां प्रतिबंधित जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी की ओर से मुज़फ़्फ़राबाद की तरफ़ लॉन्ग मार्च निकाला जा रहा है.
वहीं जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी की ओर से दावा किया गया है कि सोमवार और मंगलवार को उसके एक दर्जन से अधिक कार्यकर्ता क़ानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों के जवानों की फ़ायरिंग में मारे गए हैं.
जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी पाकिस्तान में एक प्रतिबंधित संगठन है.
मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों की कड़ी आलोचना की है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल की दक्षिण एशिया के लिए कार्यवाहक क्षेत्रीय निदेशक इसाबेल लासे ने कहा, "रावलाकोट से सामने आ रही चिंताजनक ख़बरें प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के अधिकारियों द्वारा ग़ैर-क़ानूनी हिंसा के लंबे इतिहास के अनुरूप हैं."
"प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ सुरक्षा बलों द्वारा बल प्रयोग की तुरंत, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच के आदेश दिए जाने चाहिए. जब तक इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद रहेंगी, तब तक ज़मीनी हालात की पूरी और स्वतंत्र पुष्टि करना गंभीर रूप से प्रभावित होगा. हम पाकिस्तान के अधिकारियों से अपील करते हैं कि वे सभी संचार सेवाएं तत्काल बहाल करें और मीडिया तथा स्वतंत्र पर्यवेक्षकों को प्रभावित क्षेत्र में जाने की अनुमति दें."
भारत ने बयान में क्या कहा?

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वहीं भारत ने मंगलवार को पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में कराए गए चुनावों की वैधता को ख़ारिज कर दिया.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, "हमने पाकिस्तान के कब्ज़े वाले जम्मू-कश्मीर में कराए जा रहे तथाकथित विधानसभा चुनावों से जुड़ी ख़बरें देखी हैं. जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के पूरे केंद्र शासित प्रदेश, जिनमें वे क्षेत्र भी शामिल हैं जो इस समय पाकिस्तान के ग़ैर-क़ानूनी और बलपूर्वक कब्ज़े में हैं, भारत के अभिन्न अंग हैं."
"मौजूदा दिखावटी चुनावी कवायद पाकिस्तान के ग़ैर-क़ानूनी कब्ज़े पर पर्दा डालने और क्षेत्र में उसके गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों को छिपाने की एक कोशिश भर है. पाकिस्तान के कब्ज़े वाले जम्मू-कश्मीर में जारी व्यापक विरोध-प्रदर्शन वहां के लोगों के आर्थिक शोषण, उनके मौलिक अधिकारों से वंचित किए जाने और उनके साथ किए जा रहे व्यवहार का सीधा नतीजा हैं."
वहीं पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट को शेयर किया है जिसमें इस हिंसा के पीछे भारत को ज़िम्मेदार ठहराया गया है.
सोमवार को रावलाकोट में हुई हिंसक झड़पों में कथित मौतों के ख़िलाफ़ मंगलवार सुबह मीरपुर में जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई.
मीरपुर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी उर्दू को पुष्टि की कि मंगलवार सुबह अवामी एक्शन कमेटी के कुछ कार्यकर्ता रावलाकोट में सोमवार शाम हुई हिंसक घटनाओं के विरोध में एकजुटता जताने के लिए मीरपुर के व्यापारिक केंद्र में जमा हुए थे. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों ने ज़बरदस्ती दुकानें बंद कराने की कोशिश की.
पुलिस अधिकारी ने आरोप लगाया कि जब इन लोगों को रोकने की कोशिश की गई, तो उन्होंने फ़ायरिंग कर दी. इसी दौरान प्रदर्शनकारियों में शामिल एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि दो लोग घायल हो गए. उन्होंने कहा कि घायलों की हालत ख़तरे से बाहर है.
पुलिस अधिकारी के दावे के उलट, प्रतिबंधित संगठन जॉइंट एक्शन कमेटी की कोर कमेटी के सदस्य आबिद शाहीन का कहना है कि उनके संगठन के कार्यकर्ता रावलाकोट घटना में मारे गए लोगों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने के लिए मीरपुर के शहीद चौक पर जमा हुए थे, जहां क़ानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों ने प्रदर्शनकारियों पर फ़ायरिंग कर दी.
आबिद शाहीन ने दावा किया कि फ़ायरिंग में उनके संगठन के छह कार्यकर्ताओं की मौत हुई है. हालांकि, इस संबंध में जब मीरपुर के संबंधित अस्पताल से संपर्क किया गया, तो वहां ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने केवल एक शव और दो घायलों के अस्पताल लाए जाने की पुष्टि की.
रावलाकोट में तनावपूर्ण हालात और मौतों के दावे

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दूसरी ओर, सोमवार शाम अवामी एक्शन कमेटी और सुरक्षा बलों के बीच रावलाकोट में हुई जानलेवा झड़प के बाद हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं.
अवामी एक्शन कमेटी के नेताओं की ओर से इन झड़पों में हुई मौतों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं, जबकि पुलिस प्रमुख ने मौतों की पुष्टि करने से इनकार किया है.
अवामी एक्शन कमेटी पर पाकिस्तान में प्रतिबंध लगा हुआ है. इसके सदस्य इम्तियाज़ असलम ने सोमवार रात एक वीडियो संदेश में दावा किया कि रावलाकोट में फ़ायरिंग में उनके 14 साथी मारे गए हैं, जिनमें कमेटी के संस्थापक सदस्य उमर नज़ीर के छोटे भाई उस्मान नज़ीर भी शामिल हैं.
हालांकि, मंगलवार सुबह प्रतिबंधित संगठन की कोर कमेटी के सदस्य आबिद शाहीन ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि मारे गए कार्यकर्ताओं की संख्या नौ है, जबकि दो दर्जन से अधिक कार्यकर्ता घायल हुए हैं.
आबिद शाहीन ने दावा किया कि क़ानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों ने उनके संगठन के कार्यकर्ताओं पर उस समय फ़ायरिंग की, जब वे दरीक के इलाक़े से रावलाकोट शहर की ओर बढ़ रहे थे. आबिद शाहीन का कहना था कि मारे गए लोगों के शव रावलाकोट के दरीक इलाक़े के पास बनाए गए मेडिकल कैंप में रखे गए हैं.
उन्होंने यह भी दावा किया कि लॉन्ग मार्च में शामिल लोगों के पास लाठियों के अलावा कोई और हथियार नहीं है. हालांकि, उनके इस दावे के उलट पुलिस प्रमुख कैप्टन (रिटायर्ड) लियाक़त अली मलिक का कहना है कि प्रदर्शनकारियों के पास आधुनिक हथियार मौजूद हैं, जिनसे वे पुलिस और सुरक्षा बलों के जवानों को निशाना बना रहे हैं.
लियाक़त अली मलिक ने जॉइंट एक्शन कमेटी की ओर से एक दर्जन से अधिक मौतों के दावे पर कहा कि इन दावों की पुष्टि करना संभव नहीं है, क्योंकि न तो कोई शव किसी सरकारी या निजी अस्पताल लाया गया है और न ही पुलिस के पास कोई शव मौजूद है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि जब तक मारे गए लोगों के शव किसी आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो जाते या उन्हें पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल नहीं लाया जाता, तब तक वह इसकी पुष्टि नहीं कर सकते.
उन्होंने कहा कि पिछले महीने भी एक्शन कमेटी के ख़िलाफ़ अभियान चलाया गया था, तब संगठन ने 400 कार्यकर्ताओं के मारे जाने का दावा किया था, जबकि आधिकारिक रिकॉर्ड में पांच मौतें सामने आई थीं.
क्यों निकाला जा रहा है मार्च

उधर, ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ़ पाकिस्तान (एचआरसीपी) का कहना है कि उसे इन ख़बरों पर गहरी चिंता है कि विधानसभा चुनाव के पहले चरण के दिन रावलाकोट में क़ानून-व्यवस्था लागू करने वाले अधिकारियों और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में कई लोगों की मौत हुई और कई अन्य घायल हुए हैं.
एक्स पर जारी बयान में एचआरसीपी ने कहा कि रावलाकोट में सामने आई मौतें उन मानवीय नुक़सान की कड़वी याद दिलाती हैं, जिसकी क़ीमत हाल के हफ़्तों में बने तनावपूर्ण हालात के कारण चुकानी पड़ रही है.
ग़ौरतलब है कि जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने विधानसभा में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को समाप्त करने की अपनी मांग के समर्थन में 9 जून से विरोध-प्रदर्शन और लॉन्ग मार्च शुरू कर रखा है. इस सिलसिले में संगठन के हज़ारों कार्यकर्ता रावलाकोट के दरीक, ईदगाह और आज़ाद पत्तन के पास मौजूद हैं.
इस विरोध-प्रदर्शन के दौरान 27 जुलाई से पहले 40 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 34 प्रदर्शनकारी और छह पुलिस व अर्धसैनिक बलों के जवान शामिल थे.
चुनाव से पहले प्रदर्शन समाप्त कराने के लिए सरकार ने जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के साथ बातचीत शुरू की थी, जो बेनतीजा रही. इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने मुज़फ़्फ़राबाद पहुंचने का आह्वान किया था.
विधानसभा चुनाव के पहले चरण में सोमवार को मीरपुर में मतदान हुआ है, जबकि दूसरे चरण में 2 अगस्त को मुज़फ़्फ़राबाद और 10 अगस्त को पुंछ डिविज़न में मतदान होगा.
12 सीटों का विवाद क्या है?

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पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की 53 सदस्यीय विधानसभा में इन 12 सीटों की स्थिति लंबे समय से एक विवादित मुद्दा रही है.
विधानसभा में 33 सदस्य सीधे चुनाव के ज़रिए चुने जाते हैं, जबकि महिलाओं और अन्य वर्गों के लिए आठ आरक्षित सीटें भी हैं.
विस्थापितों के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था 1970 के दशक में शुरू की गई थी. इसका उद्देश्य भारत प्रशासित कश्मीर से आए लोगों को प्रतिनिधित्व देना था. लेकिन जिन लोगों के लिए ये सीटें आरक्षित हैं, उनमें से कई लोग वास्तव में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में नहीं रहते.
जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने इन आरक्षित सीटों को समाप्त करने की मांग की है. लेकिन अधिकारियों का कहना है कि यह आरक्षण ज़रूरी है.

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24 जुलाई की रात सरकार के साथ बातचीत नाकाम होने के बाद जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने 27 जुलाई को मुज़फ़्फ़राबाद की ओर लॉन्ग मार्च निकालने का ऐलान किया था.
कमेटी से जुड़े आबिद शाहीन ने बीबीसी को बताया था कि उनके संगठन और उसके समर्थकों की चुनाव में कोई दिलचस्पी नहीं है. उन्होंने कहा था कि इस साल मई में जब पाकिस्तान सरकार के साथ बातचीत हुई थी, तो उस दौरान उनका संगठन चुनाव में हिस्सा लेने के लिए सहमत हो गया था. लेकिन बाद में ऐसे हालात पैदा किए गए कि उनका संगठन चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन सका.
आबिद शाहीन ने बातचीत नाकाम होने की ज़िम्मेदारी सरकार पर डालते हुए आरोप लगाया था कि सरकार उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं ले रही है और इस मामले में टालमटोल कर रही है.
सरकारी टीम के एक सदस्य ने बीबीसी को बताया था कि वार्ता के दौरान एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि उनके संगठन पर लगा प्रतिबंध हटा लिया जाए.
सरकार का कहना है कि छह महीने तक कमेटी के कामकाज और गतिविधियों की समीक्षा होगी, इसके बाद ही प्रतिबंध पर कोई फ़ैसला लिया जा सकेगा.
उनके मुताबिक़, संगठन की दूसरी बड़ी मांग यह थी कि उसके कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ हत्या, हत्या के प्रयास और आतंकवाद-रोधी क़ानून के तहत दर्ज मुक़दमे तुरंत वापस लिए जाएं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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