नेपाल के इस नियम से क्यों परेशान हैं सीमावर्ती इलाक़ों के भारतीय दुकानदार

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
भारत और नेपाल के बीच करीब 1,751 किलोमीटर लंबी सरहद है, जो उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम से लगती है. इस सीमा पर कई ऐसे शहर हैं, जहां से दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार होता रहा है.
भारत और नेपाल के बीच बिना वीज़ा के आसानी से यात्रा की जा सकती है और दोनों देशों के नागरिक सहजता से बॉर्डर पार करते रहे हैं. बॉर्डर पर मौजूद ये शहर अपने कारोबार के लिए दोनों तरफ के ग्राहकों पर निर्भर हैं.
लेकिन अब रैपर से राजनेता बने बालेन शाह ने चुनावों में मिली भारी जीत और प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद कई नए नियम लागू किए हैं. साथ ही, अब नेपाल कई पुराने नियमों को सख्ती से लागू कर रहा है.
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस मुद्दे पर गुरुवार को प्रतिक्रिया दी है.
उन्होंने कहा, "हमारा मानना है कि नेपाल की सरकार ने यह कदम अनौपचारिक ट्रेड को रोकने के लिए उठाया है. हमने वरिष्ठ नेपाली अधिकारियों के बयान भी देखे हैं, जिनमें उन्होंने कहा कि घरेलू और निजी इस्तेमाल के सामान को बाधित नहीं किया जाएगा. इस मामले पर हम नज़र रख रहे हैं."
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इनमें से ही एक नियम भारत से सौ रुपए से अधिक की वस्तु पर कस्टम ड्यूटी यानी भंसार का है.
यह नियम पुराना है, लेकिन बालेन शाह सरकार ने इसे सख्ती से लागू किया है. सभी बॉर्डर चौकियों पर सशस्त्र नेपाल पुलिस बल सख्ती से जांच कर रहा है.
अप्रैल में इस नियम के सख्ती से लागू होने के बाद भारतीय बॉर्डर शहरों के कारोबार पर सीधा असर हुआ है.
बिहार के बाज़ार में सन्नाटा

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बिहार के गलगलिया बॉर्डर (किशनगंज) पर भारत में दाखिल होते ही छोटी-बड़ी दुकानों की लंबी कतार नज़र आती है. यहां अधिकतर ग्राहक नेपाल के होते हैं, जो आसपास के गांवों और कस्बों से भारत में खरीदारी करने आते हैं.
आमतौर पर यहां चहल-पहल और भीड़भाड़ रहती है, लेकिन नए नियम लागू होने के बाद यहां सन्नाटा पसरा है. कई भारतीय दुकानदारों ने अपनी दुकानें यहां से हटा ली हैं.
स्थानीय रिपोर्टर प्रदीप शर्मा के मुताबिक, "नेपाल में सख्ती से कस्टम नियम लागू होने के बाद खरीदारों की तादाद 90 प्रतिशत तक गिर गई है. इसका सीधा असर उन दुकानदारों पर हुआ है, जो यहां सामान बेचते हैं. पिछले कई दिनों से बाज़ार में सन्नाटा है."
नेपाल से खरीदारी करने आए एक मधेशी नेपाली नागरिक ने प्रदीप शर्मा को बताया, "अब सामान ले जाने पर भंसार देना पड़ रहा है. पहले हम थोड़ा बहुत सामान ले जाते थे, तो कोई भंसार नहीं देना पड़ता था."

वह कहते हैं, "बालेन शाह ने कई ऐसे क़दम उठाए हैं, जिनसे जनता को फ़ायदा महसूस हो रहा है. लेकिन भंसार के नियम को सख्ती से लागू करने की वजह से लोगों में नाराज़गी है. ख़ासकर सीमावर्ती इलाकों के लोग इससे परेशान हैं."
गलगलिया से खरीदारी करने आए एक और नेपाली व्यक्ति ने कहा, "भंसार देना पड़ रहा है, फिर भी मैं सामान लेने आया हूं क्योंकि यहां से सामान खरीदना नेपाल के मुकाबले कुछ सस्ता है. हम सरकार से मांग करते हैं कि कम से कम रोज़मर्रा की ज़रूरतों वाली चीजों की खरीदारी में सरकार छूट दे."
भारतीय दुकानदारों की चिंता

आनंद किशनगंज के दीघलबैंक कस्बे में जनरल स्टोर चलाते हैं. आम दिनों में उनकी दुकान पर आने वाले 90 फीसदी से अधिक ग्राहक बॉर्डर पार करके नेपाल से आते हैं.
आजकल उनकी दुकान पर भी बहुत कम ग्राहक आ रहे हैं.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से फोन पर हुई बातचीत में वह कहते हैं, "नेपाल सरकार के इस क़दम से दीघलबैंक का बाज़ार तबाह हो जाएगा. यहां अधिकतर ग्राहक नेपाल से ही आते हैं. अब जब ग्राहक ही नहीं आ रहे, तो सामान कौन खरीदेगा."
यहीं एक इलेक्ट्रॉनिक स्टोर चलाने वाले विमल कुमार सिंह बीबीसी से फोन पर बात करते हुए कहते हैं, "दुकानें तो खुली रहेंगी क्योंकि दुकानदारों के पास और कोई विकल्प नहीं है. मेरी दुकान पर रोज़ाना दस से ज्यादा ग्राहक नेपाल से आते थे. अब इक्का-दुक्का ही आ रहे हैं."
यही हाल अररिया ज़िले के जोगबनी बाज़ार का है. जोगबनी नेपाल के विराटनगर शहर की सीमा पर है. यहां भी सशस्त्र नेपाल पुलिस बल ने सख्ती की है.
जोगबनी और विराटनगर के बीच की सीमा को सिर्फ़ पुलिस बलों की तैनाती और चौकी से पहचाना जा सकता है.
जोगबनी में बड़ा कपड़ा बाज़ार भी है, जहां अधिकतर ग्राहक नेपाल से बॉर्डर पार कर भारत में ख़रीदारी करने आते हैं.
यहां के एक दुकानदार ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से फ़ोन पर कहा, "कपड़ा दुकानदार अधिकतर नेपाली ग्राहकों पर निर्भर हैं. जब से यह नियम लागू हुआ है, 80 प्रतिशत से अधिक ग्राहक कम हो गए हैं."
जोगबनी के इस बाज़ारर में आमतौर पर रहने वाली भीड़ अब नदारद नज़र आती है. नेपाल सरकार के इस कदम का स्थानीय स्तर पर विरोध भी हो रहा है.
बीरगंज में लोगों का प्रदर्शन

बिहार के रक्सौल कस्बे के उस पार बसे बीरगंज शहर में स्थानीय लोगों और राजनेताओं ने इसे लेकर विरोध प्रदर्शन किया है.
बीरगंज के स्थानीय पत्रकार नीतेश गुप्ता ने फोन पर बताया, "सरकार के सौ रुपए से अधिक कीमत की वस्तुओं पर भंसार के नियम को लागू करने से लोगों में नाराज़गी है. भारत-नेपाल बॉर्डर पर सख्त जांच हो रही है."
नीतेश गुप्ता कहते हैं, "आमतौर पर मध्यम वर्ग के नेपाली नागरिक कपड़े और दूसरी चीज़ें खरीदने के लिए भारतीय बाज़ार में जाते हैं. ख़ासतौर पर शादी की खरीदारी में उन्हें कुछ बचत हो जाती है. लेकिन अब नए नियम से लोग बहुत परेशान हैं."
बीरगंज के ही रहने वाले मुकेश महतो ने बीबीसी नेपाली से बात करते हुए कहा, "सामान्य दिनों से लेकर ख़ास तौर पर त्योहारों के समय, हमें सामान निर्धारित मूल्य से दो से तीन गुना अधिक दर पर खरीदना पड़ता है. अपने देश के कारोबार को बचाने का उद्देश्य अच्छा है, लेकिन महंगाई की मूल समस्या का समाधान किए बिना आम जनता को महंगे दामों पर सामान खरीदने के लिए मजबूर करना ठीक नहीं है. हमारे लिए तो रोज़मर्रा की जिंदगी ही मुश्किल हो गई है."
नेपाली नागरिकों का कहना है कि वे मजबूरी में भारत से सामान खरीदने आते हैं क्योंकि ऐसा करने से उनकी कुछ बचत हो जाती है.
बीबीसी नेपाली से बात करते हुए सोनाली कर्ण कहती हैं, "धूप और बारिश सहकर सीमा पार जाकर कौन सामान ख़रीदना चाहता है? लेकिन यहां और वहां की क़ीमतों में ज़मीन-आसमान का अंतर है. हम दो रुपये बचाने के लिए वहां जाते हैं."
भारत और नेपाल के बीच की खुली सीमा से सिर्फ कारोबार ही नहीं होता, बल्कि दोनों तरफ आपसी शादियां भी होती हैं.
सोनाली को लगता है कि इस सख़्ती का असर इस रिश्ते पर भी पड़ सकता है. वह कहती हैं, "देश की अर्थव्यवस्था अच्छी हो, लेकिन नियम ऐसे लागू होने चाहिए, जिससे लोगों को परेशानी न हो. वरना अब 'रोटी-बेटी' के रिश्तों पर भी असर पड़ने लगा है."
नेपाल के रामगढ़वा की रहने वाली ममता देवी कहती हैं, "मेरा मायका भारत में है. जब मैं वहां जाती हूं, तो वे साड़ी जैसे उपहार देकर भेजते हैं. अगर अब उन पर भी सीमा शुल्क देना पड़ा, तो यह और भी कठिन हो जाएगा."
भारतीय सीमा से करीब बीस किलोमीटर दूर स्थित नेपाल के पर्सा जिले के पोखरिया की रहने वाली सुनीता देवी की रोजमर्रा की जिंदगी भंसार पर सख्ती से प्रभावित हो गई है.
बीबीसी नेपाली से बात करते हुए सुनीता कहती हैं, "100 रुपये से अधिक के सामान पर भंसार लगने की बात से हम गृहिणियों को घर का खर्च चलाने में समस्या हो रही है. आमदनी वही है, लेकिन खर्च तीन गुना हो गया है. कम से कम घरेलू सामानों में कुछ छूट मिलनी चाहिए. अभी शादियों और त्योहारों का समय है, जिससे हम और भी अधिक प्रभावित हो रहे हैं."
हालांकि, नेपाल में कई कारोबारियों को लग रहा है कि भले ही फिलहाल लोगों को परेशानी हो रही हो, लेकिन आगे चलकर ये नियम फायदेमंद हो सकता है.

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बिहार के रक्सौल से करीब दस किलोमीटर दूर नेपाल के बारा पर्सोनी के रहने वाले कारोबारी सुमन पौडेल कहते हैं, "सरकार ने यह निर्णय सकारात्मक उद्देश्य से लिया है. कुछ समय के लिए असुविधा हो सकती है, लेकिन लंबे समय में नेपाल की अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाने के लिए यह एक अच्छा कदम है."
वहीं, बीरगंज में कपड़े की दुकान चलाने वाले कारोबारी अभिषेक शर्मा का कहना है कि भंसार में सख्ती के बाद स्थानीय दुकानदारों का कारोबार बढ़ गया है.
अभिषेक शर्मा कहते हैं, "पिछले कुछ दिनों की खबरों से बीरगंज बाजार का व्यापार 85 प्रतिशत तक बढ़ गया है. यह एक सकारात्मक पहलू है. अपने देश का पैसा अपने ही देश में खर्च कर आर्थिक विकास में योगदान देना चाहिए. भारत में सामान सस्ता मिलता है, यह सिर्फ एक भ्रम है. जब आप 'बट्टा' (मुद्रा विनिमय शुल्क) जोड़ते हैं, तो कीमत लगभग बराबर ही पड़ती है."
हालांकि, सौ रुपए से अधिक कीमत के सामान पर कस्टम ड्यूटी वसूली का नियम नया नहीं है. लेकिन नेपाल सरकार इसे सख्ती से अब लागू कर रही है.
बीरगंज में तैनात नेपाल के कस्टम अधिकारी उदय सिंह ने बीबीसी नेपाली से कहा, "यह नियम पहले से ही मौजूद है. वर्तमान सरकार ने केवल इसे सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है. अगर कोई खाद्यान लाता है, तो उसके लिए 'क्वारंटीन' (अलग-थलग रखना) अनिवार्य है. एक व्यक्ति जो एक-दो पैकेट लाता है, वह क्वारंटीन नहीं करवा सकता और इसके बिना भंसार लिए पास नहीं किया जा सकता."
वहीं, भंसार विभाग के सूचना अधिकारी किशोर बर्तोला ने बीबीसी से कहा, "लोगों को दो या चार किलो चीनी खरीदने के लिए सीमा पार जाने की आदत है. हमें आंतरिक खरीद यानी अपने देश के बाजार में खरीददारी को ही बढ़ावा देना चाहिए."
भारत ने नेपाल सरकार के इस नए कदम पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































