बीबीसी पड़ताल: भारत की वे काग़ज़ी पार्टियां जिनको मिलता है सैकड़ों करोड़ का चंदा, लेकिन चुनाव बहुत कम लड़ती हैं

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- Author, शुभांगी मिश्रा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
गुजरात के आनंद शहर में सत्यवादी रक्षक पार्टी के ऑफ़िस के बाहर घुप अंधेरा था. फ़्लैट के दरवाज़े पर ताला लगा था और वहां कोई बोर्ड या पोस्टर भी नहीं था जिससे पता चल सके कि यह सच में पार्टी का रजिस्टर्ड ऑफ़िस है.
ऐसी जगह देखकर यह यकीन करना मुश्किल है कि इस पार्टी को साल 2023-24 में 330 करोड़ रुपये का चंदा मिला था.
पार्टी के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, इतनी बड़ी रकम मिलने के बावजूद पार्टी ने साल 2024 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ एक उम्मीदवार उतारा था. पार्टी की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, उसने चुनाव प्रचार पर 8.48 करोड़ रुपये खर्च किए जबकि "जनकल्याण" के नाम पर 316 करोड़ रुपये खर्च किए.
बीबीसी को पता चला कि पार्टी की अध्यक्ष स्वाति बेन उसी कॉम्प्लेक्स के एक फ़्लैट में रहती हैं जहां पार्टी का रजिस्टर्ड ऑफ़िस है. जब उनसे पार्टी को मिले चंदे और उसके खर्च के बारे में पूछा गया, तो स्वाति बेन ने कहा, "हमने पैसे चैरिटी में खर्च किए हैं, लेकिन उसका कोई रिकॉर्ड नहीं रखा है."
साल 2023-24 (लोकसभा चुनाव से पहले का वित्तीय वर्ष) में सबसे ज़्यादा चंदा पाने वाली इन छह रजिस्टर्ड गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों (आरयूपीपी) की पड़ताल के दौरान जो एक बात निकलकर आई वो थी फंड को लेकर पारदर्शिता की कमी.

भारत में 2,800 से ज़्यादा राजनीतिक पार्टियां हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ़ 73 को ही भारत के चुनाव आयोग ने राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय पार्टी के तौर पर मान्यता दी है. बाकी सभी आरयूपीपी हैं.
बीबीसी की यह पड़ताल जून में उस समय शुरू हुई जब तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हो गए थे. एनसीपीआई भी एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी (आरयूपीपी) है.
बीबीसी ने उन छह पार्टियों की पड़ताल की है जिन्हें 2024 के आम चुनाव से पहले सबसे अधिक चंदा मिला है, इस सूची में एनसीपीआई शामिल नहीं है.
बीबीसी की यह पड़ताल दिखाती है कि सैकड़ों करोड़ का चंदा पाने वाली इन पार्टियों के आर्थिक लेन-देन और राजनीतिक गतिविधियों में कोई समानता नहीं है. उनकी गतिविधियों और परदे के पीछे से काम करने वाले लोगों के मामले में पारदर्शिता की कमी भी साफ़ नज़र आती है.
इस तफ़्तीश के सिलसिले में जिन लोगों से बातचीत की गई है उन पर किसी आर्थिक अपराध में शामिल होने का आरोप नहीं लगाया जा रहा है.
लेकिन नतीजों और विशेषज्ञों की ओर से किए गए उनके विश्लेषण से इन पार्टियों के कामकाज पर सवाल उठते हैं.
उदाहरण के लिए साल 2023-24 में इन पार्टियों की कुल आय, सत्ताधारी बीजेपी को छोड़कर बाकी पांच राष्ट्रीय पार्टियों की आय से ज़्यादा है. फिर भी, चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि सबसे अमीर छह गैर-मान्यता प्राप्त पंजीकृत राजनीतिक दलों ने साल 2024 के लोकसभा चुनावों में सिर्फ़ 15 उम्मीदवार उतारे थे जबकि BJP के अलावा बाकी पांच पार्टियों ने 893 उम्मीदवार खड़े किए.

आम जनमत पार्टी, जिसे छह आरयूपीपी में सबसे ज़्यादा चंदा मिला था, ने चुनाव में सिर्फ़ एक उम्मीदवार उतारा था.
चुनाव आयोग में दी गई जानकारी के अनुसार, साल 2020 में पटना में पार्टी के बनने के बाद दो साल तक उसे 20,000 रुपये से ज़्यादा का कोई चंदा नहीं मिला. राजनीतिक पार्टियों के लिए यह ज़रूरी है कि वे 20,000 रुपये से ज़्यादा के सभी चंदों की सालाना रिपोर्ट चुनाव आयोग को सौंपें.
लेकिन साल 2022-23 में आम जनमत पार्टी को 216 करोड़ रुपये मिले और फिर साल 2023-24 में चंदा बढ़कर 620 करोड़ रुपये हो गया.
पटना में, बीबीसी ने पार्टी की फांउडिंग अध्यक्ष अनामिका पासवान से बात की. वर्तमान में अनामिका बीजेपी की प्रदेश उपाध्यक्ष हैं. उन्होंने दावा किया कि उन्होंने साल 2022 में आम जनमत पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था. उनके पति ने उनका इस्तीफ़ा पत्र और एक दस्तावेज़ दिखाया, जिसमें कहा गया था कि पार्टी अपना बेस पटना से अहमदाबाद ले गई है और फिलहाल गौरव मिश्रा इसके अध्यक्ष हैं.
हालांकि, अहमदाबाद में पार्टी का रजिस्टर्ड ऑफिस बंद था.
फ़ोन पर बातचीत में पार्टी के कोषाध्यक्ष धर्मेंद्र वैष्णव ने दावा किया कि उन्होंने कामकाज बंद कर दिया था, जबकि बीबीसी की टीम उनके बैंक खाते में अभी भी चंदा भेज सकती थी.

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पार्टी के फ़ाइनेंस के बारे में और पूछताछ करने पर, वैष्णव ने कहा कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है और सभी सवाल गौरव मिश्रा से पूछने को कहा.
लेकिन गौरव मिश्रा ने बार-बार किए गए फ़ोन और मैसेज का कोई जवाब नहीं दिया.
कुछ ऐसा ही मामला 'गरीब कल्याण पार्टी' का भी रहा, जिसे चंदे के तौर पर 138 करोड़ रुपये मिले थे और जिसने तीन उम्मीदवार मैदान में उतारे. इस पार्टी का दफ़्तर अहमदाबाद के नरोदा इलाके में 'आम जनमत पार्टी' के दफ़्तर के पास ही है.
दिलचस्प बात यह है कि छह आरयूपीपी में से चार के रजिस्टर्ड ऑफिस एक ही इलाके में हैं. बाकी दो भी गुजरात में ही हैं.
गरीब कल्याण पार्टी का ऑफ़िस भी बंद था. पार्टी के अध्यक्ष नीरज कुमार क्षत्रिय के घर पर उनकी मां आशा बेन ने बीबीसी को बताया कि वे घर पर नहीं हैं और उन्हें पार्टी के कामकाज के बारे में कोई जानकारी नहीं है.
हालांकि, उन्होंने माना कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने उनके घर पर छापा मारा था. आशा बेन ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि ये छापे क्यों मारे गए.
लेकिन बीबीसी ने विशेषज्ञों और टैक्स अधिकारियों से बात की, जिनके पास इसका जवाब था और जिससे यह भी पता चला कि इन पार्टियों को इतने बड़े डोनेशन क्यों मिल रहे थे.
इसका जवाब भारत के टैक्स कानूनों में छिपा है, जो राजनीतिक पार्टियों की आय को टैक्स से छूट देते हैं. इसके अलावा, व्यक्तिगत टैक्सपेयर राजनीतिक पार्टियों को दिए गए दान का सबूत दिखाकर अपनी आय पर टैक्स में छूट का दावा कर सकते हैं.
अहमदाबाद के सीनियर चार्टर्ड अकाउंटेंट महेश छाजेड़ ने कहा, "लोग राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने पर मिलने वाले टैक्स फ़ायदों से जुड़े कानून के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं."
छाजेड़ ने बताया कि आम टैक्सपेयर्स इन राजनीतिक दलों को दिए गए चंदे की रसीदें दिखाकर टैक्स में छूट का दावा करते हैं. बदले में, ये दल अपना कमीशन काटकर बाकी पैसे टैक्सपेयर्स को नकद में लौटा देते हैं.

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दिसंबर 2025 में जारी एक प्रेस रिलीज़ में, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने आरयूपीपी को दिए जाने वाले फ़र्ज़ी डोनेशन और दूसरी वित्तीय अनियमितताओं का मुद्दा भी उठाया.
प्रेस रिलीज़ में कहा गया है, "एनफोर्समेंट की कार्रवाई से मिले सबूतों से पता चला है कि रजिस्टर्ड अनरिकॉग्नाइज़्ड पॉलिटिकल पार्टीज़ (आरयूपीपी) का इस्तेमाल फंड ट्रांसफर करने, हवाला ट्रांज़ैक्शन, सीमा-पार रेमिटेंस और डोनेशन के लिए फ़र्ज़ी रसीदें जारी करने के ज़रिया के तौर पर किया जा रहा था. इनमें से कई पार्टियां रिटर्न फ़ाइल नहीं करती थीं, अपने रजिस्टर्ड पते पर काम नहीं कर रही थीं और किसी भी राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं थीं."
चुनाव पर नजर रखने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिसर्चर शैली महाजन आरयूपीपी की आय का अध्ययन करती हैं.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि इनमें से कई पार्टियां अक्सर "मनी लॉन्ड्रिंग और टैक्स चोरी के एक जरिए" के तौर पर काम करती हैं.
उन्होंने सवाल किया, "ये पार्टियां चुनावी तौर पर सक्रिय नहीं हैं, फिर भी इन्हें इतना बड़ा फंड मिल रहा है और ये पैसे खर्च भी कर रही हैं. तो, सवाल यह उठता है कि क्या ये सच में राजनीतिक पार्टियां हैं, या ये शेल कंपनियों के लिए एक मोहरे के तौर पर काम कर रही हैं ताकि वे अपने पैसे को लॉन्डर कर सकें?"
जांच के दौरान, बीबीसी ने अहमदाबाद, दिल्ली और पटना में तीन टैक्स अधिकारियों से भी बात की.
उन्होंने नाम न बताने की शर्त पर माना कि कई आरयूपीपी ऐसी हैं जो न तो स्वतंत्र रूप से काम करती हैं और न ही किसी सामान्य राजनीतिक पार्टी की तरह.
अधिकारियों ने बताया कि इसके बजाय, उनके कामकाज आपस में जुड़े हुए हैं और उन्हें चार्टर्ड अकाउंटेंट नियंत्रित करते हैं, जो उनके और टैक्सपेयर्स के बीच मध्यस्थ के तौर पर काम करते हैं.

स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी के अध्यक्ष सुरेंद्र तिवारी ने इस बात की पुष्टि की. बीबीसी ने इस पार्टी की भी जांच की थी. सुरेंद्र तिवारी की पार्टी को साल 2023-24 में 219 करोड़ रुपये मिले थे लेकिन उनका कहना है कि उन्हें उस पैसे का इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं था.
तिवारी ने वीडियो कॉल पर कहा, "(पार्टी के) चार्टर्ड अकाउंटेंट ने मुझे चुनाव प्रचार के लिए कुछ पैसे दिए. फिर वह उन क्लाइंट्स (टैक्स देने वालों) को प्रचार के वीडियो दिखाते थे जो दान के ज़रिए टैक्स में छूट पाना चाहते थे."
सुरेंद्र तिवारी ने बताया कि जुलाई 2026 में पार्टी को इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से एक नोटिस मिला. उन्होंने पार्टी के चार्टर्ड अकाउंटेंट मयूर सिंह पर "उन्हें अंधेरे में रखने" का आरोप लगाया और कहा कि पार्टी की बागडोर उन्हीं (मयूर सिंह) के हाथ में थी.
हालांकि, मयूर सिंह ने किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया और कहा कि वह केवल वही ऑडिट रिपोर्ट जमा करते हैं जिन्हें पार्टियों के लिए चुनाव आयोग को सौंपना अनिवार्य होता है.
मयूर सिंह ने फ़ोन पर कहा, "मैं न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी (इस पड़ताल में इस पार्टी की भी जांच की गई है) जैसी कई पार्टियों के लिए यह काम करता हूं; पहले मैं भारतीय जन परिषद के लिए यह काम करता था. समझने की कोशिश कीजिए, इन पार्टियों के पीछे वही लोग हैं."
लेकिन क्या इन पार्टियों के खिलाफ कोई कार्रवाई की जा रही है?
नाम न बताने की शर्त पर, टैक्स विभाग के एक अधिकारी ने बीबीसी को एक इंटरनल डोज़ियर दिखाया, जिसमें कहा गया है कि इनकम टैक्स विभाग कम से कम साल 2022 से ही संदिग्ध आरयूपीपी की जांच कर रहा है.
डोज़ियर में बताया गया है कि विभाग ने टैक्स में छूट पाने के लिए टैक्सपेयर्स की ओर से आरयूपीपी को दिए गए 5,591 करोड़ रुपये के फ़र्ज़ी डोनेशन की पहचान की है. इनमें से विभाग 2,749 करोड़ रुपये वसूलने में कामयाब रहा है. डोज़ियर के मुताबिक, पार्टियों द्वारा किए गए 665 करोड़ रुपये के विदेशी लेन-देन की भी पहचान की गई है.
इसमें इनकम टैक्स एक्ट, फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट और भारत के चुनाव आयोग के नियमों के उल्लंघन का ज़िक्र किया गया है और यह भी बताया गया है कि विभाग ने दोषी होने के संदेह वाली पार्टियों के ख़िलाफ़ तलाशी और ज़ब्ती की कार्रवाई की है.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने बिहार, गुजरात और नई दिल्ली के इनकम टैक्स ऑफ़िस और सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्ट टैक्सेज़ को सवाल भेजे हैं, ताकि डोज़ियर में दी गई जानकारी की पुष्टि की जा सके.
हमने यह भी पूछा है कि क्या बीबीसी की पड़ताल के दायरे में आने वाली छह पार्टियां उन पार्टियों में शामिल थीं, जिनके ख़िलाफ़ तलाशी और ज़ब्ती की कार्रवाई की गई थी?
बीबीसी को अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है.
टैक्स लॉयर विभु जैन ने बीबीसी को बताया कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के मैनुअल में कहा गया है कि ऐसे मामलों में डिपार्टमेंट को दूसरी सरकारी एजेंसियों के साथ जानकारी साझा करने के लिए "एक साथ मिलकर काम करने का तरीका" अपनाना चाहिए.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने चुनाव आयोग से सवाल पूछा है कि क्या उसे इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से आम तौर पर आरयूपीपी और ख़ास तौर पर बीबीसी की पड़ताल में शामिल की गई छह पार्टियों द्वारा की गई वित्तीय अनियमितताओं के बारे में कोई जानकारी मिली है.
इसका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है.
पिछले साल, चुनाव आयोग ने 800 से ज़्यादा आरयूपीपी को सूची से हटा दिया था. आयोग की प्रेस रिलीज़ में इसकी वजह यह बताई गई थी कि इन पार्टियों ने पिछले छह सालों में किसी भी चुनाव में एक भी उम्मीदवार नहीं उतारा था.
यह साफ नहीं है कि इस कार्रवाई की वजह वित्तीय अनियमितताएं भी थीं या नहीं. बीबीसी ने चुनाव आयोग से इस बारे में भी सवाल पूछा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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