सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल से राहुल गांधी की दूरी पर सवाल, कांग्रेस की क्या है दलील?

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सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले 18 दिनों से अनशन पर हैं. उनकी सेहत को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं.
पिछले महीने 28 जून से सोनम वांगचुक ने अनशन की शुरुआत की थी और तब से उनका वजन क़रीब साढ़े आठ किलो तक कम हो गया है. विपक्ष के कई नेताओं ने उनसे अनशन ख़त्म करने की अपील की है लेकिन वांगचुक ने अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है.
प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता को लेकर जंतर मंतर पर विरोध-प्रदर्शन की शुरुआत कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने की थी और बाद में सोनम वांगचुक इसमें शामिल हुए थे.
वांगचुक के इस अनशन की तुलना 2011 में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के अनशन से भी हो रही है. तब अन्ना के साथ बॉलीवुड की कई हस्तियों समेत विपक्ष के नेता भी अनशन स्थल पर आते थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा है. तब विपक्ष में भारतीय जनता पार्टी थी और केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी.
अब केंद्र में बीजेपी की सरकार है और कई लोग लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से सवाल पूछ रहे हैं कि वह इस अनशन से दूर क्यों हैं?

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राहुल गांधी दूर क्यों?

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हाल के हफ़्तों में राहुल गांधी ने नीट परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर बीजेपी सरकार की तीखी आलोचना की है और देश के प्रमुख कोचिंग केंद्र कोटा में छात्रों से भी मुलाक़ात की थी. लेकिन दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन से उनकी तत्काल अनुपस्थिति ने सवाल खड़े किए हैं.
भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने कहा कि अगर विपक्षी दल युवा-नेतृत्व वाले इस आंदोलन में शामिल नहीं होते हैं, तो यह उनकी "संकीर्ण सोच" मानी जाएगी.
वांगचुक ने द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि अगर विपक्ष, जिसमें कांग्रेस भी शामिल है, नीट परीक्षा में अनियमितताओं के ख़िलाफ़ कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से शुरू किए गए इस आंदोलन का समर्थन नहीं करता, तो जनता उन्हें ख़ारिज कर देगी.
राहुल गांधी 17 जुलाई को देहरादून में छात्रों के साथ एक जनसभा करने वाले हैं. कांग्रेस अपनी ओर से 'छात्रों की गूंज' अभियान चला रही है, जिसके तहत वह पेपर लीक के मुद्दे पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग कर रही है. यही मांग सीजेपी के आंदोलन का भी प्रमुख मुद्दा है.
2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार में अन्ना आंदोलन की भी अहम भूमिका मानी जाती है. तब बीजेपी अन्ना आंदोलन का समर्थन कर रही थी. इसका फ़ायदा अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में हुआ था क्योंकि 2013 में 15 सालों से सत्ता में रही कांग्रेस को हरा दिया था और बीजेपी पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ केंद्र में सत्ता में आई थी.
ऐसे में कहा जा रहा है कि कांग्रेस में इस बात का डर है कि कहीं बीजेपी विरोधी माहौल सीजेपी के पक्ष में न चला जाए.
कांग्रेस से सवाल उनके नेताओं के जवाब
वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले ने एक्स पर सवाल पूछा है कि कांग्रेस पार्टी सीजेपी के आंदोलन से ख़ुद को दूर क्यों रख रही है?
निखिल वागले ने लिखा है, ''ऐसा क्यों है कि जंतर-मंतर आंदोलन को लेकर वाम मोर्चा, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, शिवसेना और एनसीपी जैसी पार्टियां तो समझदारी दिखा रही हैं, लेकिन राहुल गांधी और कांग्रेस ऐसा नहीं कर रहे हैं?''
निखिल वागले की इस पोस्ट का जवाब गुजरात के वडगाम से कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवाणी ने दिया है. जिग्नेश ने लिखा है, ''मैं आपकी पोस्ट में जताई गई चिंता का सम्मान करता हूँ. जब सोनम वांगचुक जी जैसे व्यक्ति, जिन्हें शिक्षा के क्षेत्र में वास्तविक इनोवेशन के लिए जाना जाता है, लाखों बच्चों और उनके अभिभावकों का भविष्य बर्बाद करने वाली अनियमितताओं के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल पर बैठते हैं, तो यह निश्चित रूप से पूरे देश का ध्यान मांगता है. उनकी बिगड़ती सेहत हम सभी के लिए चिंता का विषय है. कांग्रेस उनके साथ खड़ी है और हर उस नागरिक के साथ है जो इन मुद्दों पर संघर्ष कर रहा है.''

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जिग्नेश ने लिखा है, ''लेकिन हमें पूरे परिप्रेक्ष्य को भी देखना चाहिए. यह कहना सही नहीं होगा कि कांग्रेस ने इस मुद्दे की अनदेखी की है. कांग्रेस या उसके किसी भी नेता ने कभी भी इन युवाओं या सोनम वांगचुक जी पर सवाल नहीं उठाए और न ही यह पूछा कि वे एनएसयूआई और इंडियन यूथ कांग्रेस के आंदोलनों का समर्थन क्यों नहीं कर रहे हैं. इसके बजाय, हम इन्हीं मुद्दों पर उनके साथ समानांतर लड़ाई लड़ रहे हैं.''
जिग्नेश को जवाब देते हुए निखिल वागले ने लिखा है, ''मैं जानता हूँ कि राहुल गांधी और एनएसयूआई इस मुद्दे पर पहले से अभियान चला रहे हैं. लेकिन सोनम वांगचुक का समर्थन करने में क्या ग़लत है? इससे निश्चित रूप से राहुल गांधी की साख और जनस्वीकार्यता बढ़ेगी.''
''राहुल गांधी को यह समझना होगा कि वह सिर्फ़ एक राजनीतिक दल के नेता नहीं हैं, बल्कि लोकसभा में विपक्ष के नेता भी हैं. इसलिए उन्हें हर उस नागरिक आंदोलन के साथ खड़ा होना चाहिए, जो संविधान में विश्वास रखता है.''
''भारत जोड़ो यात्रा के बाद अपने अभियानों के ज़रिए राहुल गांधी ने लोगों की अपेक्षाएं काफ़ी बढ़ा दी हैं. मैंने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान उनके जुनून और प्रतिबद्धता को क़रीब से देखा है. लेकिन अगर उन्हें पूरे देश का नेतृत्व करना है, तो उन्हें जनता के मुद्दों और आंदोलनों के प्रति और अधिक संवेदनशील होना होगा.''

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शशि थरूर का खुला पत्र
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर ने जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे लोगों को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखा है. थरूर ने लिखा है, ''मैं आज आपसे एक राजनेता या सांसद के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में बात कर रहा हूँ जो भारत की युवा पीढ़ी के साथ जो कुछ हो रहा है, उससे गहराई से व्यथित है.''
''यह मुद्दा मेरे लिए व्यक्तिगत भी है. मेरा जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ. मेरे पिता अख़बार में नौकरी करते थे और मेरी मां गृहिणी थीं. परिवार में तीन बच्चों की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी पिता की एकमात्र आय पर थी. हमारे जैसे परिवार के लिए योग्यता कोई नारा नहीं थी. छात्रवृत्ति, निष्पक्ष परीक्षाएं और ईमानदार परिणाम ही वे रास्ते थे, जिनके सहारे एक वेतन तीन बच्चों के सपनों को आगे बढ़ा सकता था.''

''मैंने मुंबई और कोलकाता में स्कूली शिक्षा प्राप्त की, फिर दिल्ली में कॉलेज की पढ़ाई की. विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान हासिल किया और आईआईएम में प्रवेश भी मिला. लेकिन मैंने अपनी रुचि के विषय अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन करने के लिए छात्रवृत्ति के सहारे अमेरिका जाने का फ़ैसला किया. मुझे विरासत में कुछ नहीं मिला. जो कुछ भी हासिल किया, वह कड़ी मेहनत और हां, परीक्षाओं के दम पर किया.''
''इसीलिए मैं जानता हूं कि निचले और मध्यम आय वर्ग के युवाओं के लिए योग्यता आधारित और निष्पक्ष व्यवस्था ही आगे बढ़ने की सबसे बड़ी सीढ़ी है. जब यही सीढ़ी टूट जाती है, जब प्रश्नपत्र लीक हो जाते हैं, परीक्षाएं रद्द हो जाती हैं और व्यवस्था पर भरोसा ख़त्म हो जाता है, तब अमीर और प्रभावशाली लोगों के बच्चों पर इसका वैसा असर नहीं पड़ता. उनके पास आगे बढ़ने के दूसरे रास्ते होते हैं. लेकिन टूटते हैं आपके सपने, आपके परिवारों के त्याग और कई बार तो दुखद रूप से युवाओं की जिंदगियां भी.''
''जंतर-मंतर पर एकत्रित युवाओं और देशभर में शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज़ उठा रहे सभी नौजवानों से मैं कहना चाहता हूँ कि यह देश आपकी बात सुन रहा है. आपका ग़ुस्सा अनुशासनहीनता नहीं है. यह उस पीढ़ी की पीड़ा है, जिसने सब कुछ सही किया, फिर भी उसके साथ विश्वासघात हुआ. आप अकेले नहीं हैं.''

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कई विपक्षी पार्टियों का समर्थन
इस बीच सोमवार को शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने राहुल गांधी से अपील की कि वे दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचकर जारी प्रदर्शन का समर्थन करें. ठाकरे ने कॉकरोच जनता पार्टी और सोनम वांगचुक के प्रति अपना समर्थन जताते हुए आंदोलन के पक्ष में अधिक लोगों के आगे आने की अपील की.
उन्होंने कहा, "मैं भी जाऊंगा. राहुल गांधी जी को भी जाना चाहिए. जिन लोगों को देश के युवाओं पर भरोसा है, उन्हें वहाँ जाना चाहिए. पूरे देश के लोगों को सड़कों पर उतरकर उनका समर्थन करना चाहिए."
उद्धव ठाकरे 20 जुलाई को दिल्ली पहुंचकर जंतर-मंतर जाने और प्रदर्शन में शामिल होने वाले हैं.
कॉकरोच जनता पार्टी को कई विपक्षी दलों के नेताओं का समर्थन मिल चुका है, लेकिन कांग्रेस ने अब तक सार्वजनिक रूप से अपने समर्थन की घोषणा नहीं की है, जबकि वह पिछले कई महीनों से इसी मुद्दे को उठाती रही है.
आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) समेत कई विपक्षी दलों के नेताओं ने या तो आंदोलन के प्रति एकजुटता जताई है या फिर जंतर-मंतर पहुंचकर प्रदर्शनकारियों से मुलाक़ात की है.

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी, तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा और कीर्ति आज़ाद, सीपीआईएस के महासचिव एम. ए. बेबी, वृंदा करात और केरल की वरिष्ठ नेता के. के. शैलजा उन प्रमुख नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने इस ऑनलाइन संगठन का समर्थन किया है.
इससे पहले पिछले साल सितंबर महीने में सोनम वांगचुक लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए भूख हड़ताल पर बैठ थे. अचानक से यह विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया था और चार लोगों की जान चली गई थी. इसके लिए भारत के गृह मंत्रालय ने सोनम वांगचुक को ज़िम्मेदार ठहराया गया था. इस मामले में उन्हें गिरफ़्तार भी किया गया था.
इसी दौरान सोनम वांगचुक से सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल पूछना शुरू कर दिया था कि वह पाकिस्तान दौरे पर क्यों गए थे. यह सवाल मैंने सितंबर 2025 में सोनम वांगचुक से पूछा था तो उन्होंने जवाब में कहा था, ''मैं जनवरी 2025 में पाकिस्तान दौरे पर गया था. संयुक्त राष्ट्र का पर्यावरण से जुड़ा एक कार्यक्रम था. इसमें तो मैंने मोदी साहब के पर्यावरण से जुड़े अच्छे कार्यक्रमों की तारीफ़ भी की थी. यह बहुत मर्यादित कार्यक्रम था और उसमें केवल मैं ही नहीं भारत के छह और एक्सपर्ट्स थे. यह कोई मेरा गोपनीय दौरा नहीं था.''

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सोनम वांगचुक कौन हैं?
59 साल के सोनम वांगचुक से प्रेरित होकर फिल्म थ्री इडियट्स बनी थी. वांगचुक मानते हैं कि शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की ज़रूरत है. उनका कहना है कि बच्चों को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए, जिससे वे वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान खोजने में सक्षम बनें.
उनके मुताबिक, इसकी शुरुआत स्कूल स्तर से ही की जानी चाहिए, क्योंकि बच्चे अपने जीवन के लगभग 16 वर्ष स्कूल में बिताते हैं.
उन्होंने कहा था, "इसके बजाय हम उनसे बड़े होने के बाद कम समय में समस्याओं का समाधान खोजने की उम्मीद करते हैं, जबकि इसकी तैयारी स्कूल के स्तर से ही होनी चाहिए."
सोनम वांगचुक के पिता चाहते थे कि वह सिविल इंजीनियर बनें, लेकिन उनकी रुचि मैकेनिकल इंजीनियरिंग में थी. अपने सपने को पूरा करने के लिए उन्हें घर छोड़ना पड़ा. इसी सफर के दौरान उन्होंने स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख की स्थापना की, ताकि उन बच्चों को अवसर मिल सके, जिनकी योग्यता और सोच बचपन में उनकी अपनी सोच से मिलती-जुलती है.
सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत अक्तूबर 2025 में हिरासत में लिया गया था. लेकिन उनके ख़िलाफ़ इस तरह का यह पहला मामला नहीं था.
10 अक्तूबर 2024 को उन्हें दिल्ली पुलिस की हिरासत में पांच दिन बिताने के बाद रिहा किया गया था. उन्हें लद्दाख से दिल्ली पदयात्रा के दौरान हिरासत में लिया गया था, जिसकी शुरुआत उन्होंने एक सितंबर 2024 को लेह से की थी. दिल्ली पहुंचने पर यात्रा रोक दी गई थी.
हिरासत के दौरान उन्होंने भूख हड़ताल भी शुरू कर दी थी. बाद में केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत फिर शुरू करने का आश्वासन दिए जाने के बाद उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया था.
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