सीजेपी का प्रदर्शन ऐतिहासिक: अन्ना आंदोलन के साथ तुलना से लेकर आपातकाल तक पर क्या बोले योगेंद्र यादव

योगेंद्र यादव
इमेज कैप्शन, योगेंद्र यादव कहते हैं कि भविष्य संसद नहीं सड़क पर तय होगा.
    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, संपादक, बीबीसी न्यूज़ हिन्दी
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का विरोध प्रदर्शन जारी है.

सोमवार को संसद चलो मार्च के दौरान सीजेपी समर्थकों को पुलिस के लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोलों का सामना करना पड़ा.

इस दौरान कई प्रदर्शनकारी घायल हुए और एक छात्रा गंभीर रूप से घायल हुई जो राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती है.

इस सबके बावजूद सीजेपी के समर्थक दोबारा जंतर-मंतर पर जम गए और उनका विरोध प्रदर्शन जारी है.

दूसरी ओर बीजेपी का कहना है कि वो संसद में नीट पेपर लीक मामले पर चर्चा करने के लिए तैयार है.

इस प्रदर्शन के भविष्य की दशा और दिशा क्या होगी ये अभी तक साफ़ नहीं है, लेकिन इस प्रदर्शन के दौरान मंच पर दिखे वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव इस पूरे आंदोलन को ऐतिहासिक मानते हैं.

50 साल पुराने आंदोलन से तुलना

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इमेज कैप्शन, 21 जुलाई को हुए प्रदर्शन के दौरान सीजेपी समर्थकों पर लाठीचार्ज हुआ

योगेंद्र यादव कहते हैं कि आज से 50 साल पहले साल 1974 में इस देश में युवाओं का एक आंदोलन हुआ था जिसको कई लोग जेपी आंदोलन कहते हैं, जहां युवा लोग शिक्षा, रोज़गार के सवाल पर सड़कों पर उतर आए थे. सरकार इनके सवालों को सुनने को तैयार नहीं थी, तो फिर उन्होंने कहा सरकार बदलनी है.

"50 साल बाद देश में फिर युवा इस देश की पॉलिटिक्स, इस देश की डेवलपमेंट्स पर नेशनल एजेंडा के सेंटर में है. शिक्षा और रोज़गार का सवाल जो कि केंद्र में होना चाहिए था वो किसी तरह से अब केंद्र में आया है. उसके साथ कहीं न कहीं जो तानाशाही धीरे-धीरे देश में आ रही है, उसको पंक्चर करने की गुंजाइश बननी शुरू हुई है. इस लिहाज़ से 20 (जुलाई) तारीख़ को जो दिल्ली में हुआ वो ऐतिहासिक चीज़ थी."

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"अब इस देश में लोकतंत्र का भविष्य संसद से तय नहीं होगा बल्कि सड़क से तय होगा. चुनावों से तय नहीं होगा, प्रतिरोध से तय होगा. और 20 तारीख़ को उसकी एक झलक, हमने देखी."

सीजेपी के प्रदर्शनकारियों की क़ानूनी मांगें हैं और वो शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा मांग रहे हैं. उनकी मांग है कि नीट पेपर लीक और शिक्षा जैसे मुद्दों पर संसद में लंबी बहस होनी चाहिए.

लेकिन योगेंद्र यादव कहते हैं कि भविष्य संसद नहीं सड़क पर तय होगा. हालांकि प्रदर्शनकारियों का भरोसा अभी भी संस्थानों पर दिख रहा है.

संस्थान क्या युवाओं को नाकाम कर रहे हैं?

इस सवाल पर योगेंद्र यादव कहते हैं, "सब कुछ शुरू ही संस्थानों की नाकामयाबियों की वजह से हुआ. जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस इस देश के बेरोज़गार लोगों को कॉकरोच बोलते हैं, बाद में उन्होंने इस पर सफ़ाई दी. जब इस देश के तमाम संस्थान जैसे एनटीए और एग्ज़ाम करवाने वाली दूसरी संस्थाएं फ़ेल हो जाती हैं. जब सीबीएसई रूटीन चीज़ें करवाने में फेल होता है. तो ये सारी चीज़ें शुरू ही संस्थानों की नाकामयाबियों से हुई हैं."

"और ये नहीं हो सकता कि जिन संस्थानों की नाकामयाबियों की वजह से ये सब शुरू हुआ वही संस्थान अब इसका इलाज कर देंगे. शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग एक प्रतीकात्मक चीज़ है. वो इस मायने में है ताकि सिस्टम में जवाबदेही हो. मुझे नहीं लग रहा कि वो जवाबदेही कहीं से आ रही है."

बीजेपी का कहना है कि उसने नीट पेपर लीक मामले में तुरंत कार्रवाई करते हुए परीक्षा को रद्द किया और तुरंत परीक्षा कराई.

देश में पहले भी कई मंत्रियों ने दिए इस्तीफ़े

योगेंद्र यादव
इमेज कैप्शन, योगेंद्र यादव मानते हैं कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग एक प्रतीकात्मक चीज़ है

भारत में जवाबदेही के तौर पर कई बार इस्तीफ़े हुए हैं. कई रेल मंत्रियों के अलावा बहुत से लोगों ने इस्तीफ़ा दिया है.

जवाबदेही के सवाल पर योगेंद्र यादव ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र में नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा देना नई बात नहीं है.

उन्होंने कहा, "जवाहरलाल नेहरू के सबसे पसंदीदा मंत्री पूर्व रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन ने भारत-चीन युद्ध के बाद इस्तीफ़ा दिया था. 50 के दशक में जब कांग्रेस का एकछत्र राज पूरे देश में हुआ करता था तब पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने इस्तीफ़ा दिया था. तब भी मंत्रियों के इस्तीफ़े होते थे. लाल बहादुर शास्त्री ने तो बिना किसी के कहे, एक रेल हादसे के बाद नैतिक आधार पर रेल मंत्री के पद से ख़ुद इस्तीफ़ा दे दिया था."

पीवी नरसिम्हा राव सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री माधवराव सिंधिया ने जैन हवाला डायरी में नाम आने के बाद पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. इसके अलाव साल 1993 में विमान दुर्घटना के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दिया था.

नीतीश कुमार ने साल 1999 में एक रेल हादसे के बाद रेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

उनके मुताबिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों की नैतिक जवाबदेही एक सामान्य परंपरा रही है.

नीट पेपर लीक मामले में प्रधानमंत्री और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े को लेकर मंगलवार को कांग्रेस ने पीएम आवास के बाहर धरना दिया था.

भारतीय जनता पार्टी के नेता और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने बुधवार शाम प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों पर हमला किया.

उन्होंने कहा कि अतीत में भी कई बार कई राज्यों में पेपर लीक होते रहे हैं.

नड्डा ने कहा, "आप राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है. ये गंभीर मसला है. एक लंबी लिस्ट है जहां यूपीए की सरकारें थीं और पेपर लीक हुए."

'यह क्लासिक तानाशाह की चालाकी और अहंकार है'

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इमेज कैप्शन, जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन जारी है

योगेंद्र यादव ने कहा कि उनकी नज़र में मौजूदा केंद्र सरकार एक सामान्य लोकतांत्रिक सरकार की तरह काम नहीं कर रही है.

उन्होंने दावा किया कि दुनिया के कई लोकतंत्र अध्ययन संस्थान भारत को अब "कॉम्पिटिटिव ऑथोरिटेरियनिज़्म" या "इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी" जैसी श्रेणियों में रखते हैं.

"दुनियाभर के तानाशाह इतने कामयाब हो जाते हैं कि वे ऐसे लोगों से घिर जाते हैं जो उनको सच बताना बंद कर देते हैं. वे सूचनाओं से कटे हुए और अहंकारी हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि कोई ख़ामी हो गई तो मैनेज कर लेंगे या फिर दमन करेंगे. एक स्टेज के बाद दमन फ़ेल कर जाता है और तब तानाशाही का अंत होना शुरू होता है."

"इस आंदोलन में बिलकुल यही हुआ है. बच्चों ने शिकायत की सरकार ने सुनी नहीं. उन्होंने सोचा कि जंतर-मंतर पर बैठा दो, 10 मिनट में हवा निकल जाएगी, मीडिया को इशारा कर देंगे कोई रिपोर्ट नहीं करेगा. यह बिल्कुल क्लासिक तानाशाह की चालाकी और अहंकार है."

"मीडिया को तो कंट्रोल कर लिया लेकिन ये भूल गए कि आंदोलन अपने आप मीडिया बन जाता है. इन्होंने सोचा सोनम वांगचुक को उठा लो तो आंदोलन बिखर जाएगा, लेकिन हुआ बिलकुल उल्टा. दिल्ली पुलिस से ठुकवा दिया, तो जो असंतोष थोड़ा था वो और बड़ा बन गया."

जेपी नड्डा ने कहा, "हम चर्चा के लिए तैयार हैं. गहन चर्चा हो. संसद ही उपयुक्त स्थान है जहां गहराई से चर्चा की जा सकती है. हम ठोस नीति लेकर आएं क्योंकि बच्चे देश का भविष्य हैं. ये सरकार के साथ-साथ विपक्ष की भी ज़िम्मेदारी है."

जेपी नड्डा ने बताया कि वो प्रदर्शनकारियों से चर्चा के लिए तैयार हैं, प्रदर्शनकारी जब कहेंगे सरकार बातचीत करेगी, हालांकि आज कोई चर्चा नहीं हुई.

वीडियो कैप्शन, जंतर-मंतर पहुंचे इस कपल ने क्या बताया?

इंदिरा कार्यकाल और वर्तमान सरकार से तुलना

70 के दशक में भी संस्थानों को कंट्रोल किया गया, मीडिया को टूल बना लिया गया और इमरजेंसी तक बात आई. तो इस बार नया क्या है? तब की इंदिरा गांधी सरकार और अब की मोदी सरकार में फर्क क्या है?

इस सवाल पर योगेंद्र यादव कहते हैं, "मैं 'इमरजेंसी की पैदाइश' हूं. मुझे याद है वो माहौल, कैसे सब लोग झुक-झुक के सजदा किया करते थे और इमरजेंसी को समर्थन करने के बहाने ढूंढते थे कि 'ट्रेनें तो टाइम पे चल रही हैं.' जैसे ही इमरजेंसी ख़त्म हुई, सब कहने लगे कि हमें पता था ये गड़बड़ है."

"इंदिरा गांधी सुपर कॉन्फिडेंट थीं, दरबारियों ने समझा रखा था कि आप बहुत पॉपुलर हैं. इलेक्शन के एक दिन पहले तक किसी अख़बार ने नहीं लिखा था कि कोई लहर इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ है, लेकिन कांग्रेस राजस्थान से बिहार तक एक भी सीट नहीं जीती थी."

हालांकि उन्होंने कहा कि आज का सबसे बड़ा अंतर तकनीक का है. उनके मुताबिक अब निगरानी के साधन पहले से कहीं अधिक विकसित हैं, लेकिन सोशल मीडिया ने प्रतिरोध को भी पहले की तुलना में अधिक तेज़ और व्यापक बना दिया है.

वीडियो कैप्शन, दिल्ली के जंतर मंतर पर 23 दिन तक भूख हड़ताल पर रहीं आइसा लीडर नेहा ने बीबीसी से बात की है. देखिए ये पूरी बातचीत.

अन्ना आंदोलन से कितना अलग?

योगेंद्र यादव ने मौजूदा आंदोलन की तुलना 2011 के अन्ना आंदोलन से करते हुए कहा कि दोनों में महत्वपूर्ण अंतर है.

वो कहते हैं, "अन्ना आंदोलन में रिस्क नहीं था, लोग बच्चों को लेकर वहां पर पिकनिक की तरह जाते थे. आज जो लोग आ रहे हैं, वे अपनी प्रोफ़ाइलिंग और नौकरी खोने का बड़ा रिस्क लेकर आ रहे हैं. अन्ना आंदोलन के समय मीडिया सरकार के ख़िलाफ़ दहाड़ता था, लेकिन यह आंदोलन मीडिया की चुप्पी और दुष्प्रचार के बावजूद बढ़ रहा है."

योगेंद्र यादव ने कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था आज ऐसे दौर में पहुंच गई है, जहां वह न पर्याप्त गुणवत्ता वाली शिक्षा दे पा रही है और न ही रोज़गार की गारंटी बन पा रही है.

उन्होंने कहा कि निजीकरण, संस्थागत गिरावट और एआई जैसी नई तकनीकों के कारण आने वाले वर्षों में रोज़गार की चुनौती और बढ़ सकती है. उनके मुताबिक़ 20 जुलाई का प्रदर्शन इसी व्यापक संकट की अभिव्यक्ति है.

इस विरोध प्रदर्शन के दौरान विपक्षी राजनीतिक दलों की भूमिका पर पूछे गए सवाल के जवाब में योगेंद्र यादव ने कहा कि राजनीतिक दलों का अपने हितों को देखना स्वाभाविक है, लेकिन आंदोलन की दिशा आख़िरकार युवाओं के हाथ में है.

उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की ख़ुशी है कि विभिन्न विपक्षी नेताओं ने आंदोलन का समर्थन किया. हालांकि उन्होंने आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं की ओर से दिए गए कुछ बयानों की आलोचना भी की.

योगेंद्र यादव ने कहा कि इस समय सबसे बड़ी ताक़त उन युवाओं के पास है, जो देश के अलग-अलग हिस्सों से आंदोलन में शामिल होने आ रहे हैं, और आगे आंदोलन की दिशा वही तय करेंगे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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