घट गईं लोमड़ियाँ लेकिन छह गुना बढ़ गए मोर, तमिलनाडु में ये बदलाव कैसे और क्यों आया?

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- Author, सिराज
- पदनाम, बीबीसी तमिल
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
लोमड़ी का नाम आते ही ज़हन में अक्सर चालाकी और धोखे की तस्वीर उभरती है.
फ़िल्मों में 'लोमड़ी की चाल' या 'वो लोमड़ी की तरह प्लानिंग कर रहा है' जैसे डायलॉग आपने भी सुने होंगे. फ़िल्में ही नहीं, रोज़मर्रा की बातचीत में भी लोमड़ी का ज़िक्र अक्सर इसी तरह होता है.
लेकिन सोचिए, जिस लोमड़ी को हम अपनी बातचीत में बार-बार याद करते हैं, अगर वही धीरे-धीरे हमारे आस-पास से ग़ायब होने लगे तो क्या होगा?
वैसे तो लोमड़ियों की संख्या कम होने से भला क्या फ़र्क़ पड़ेगा. मगर प्रकृति में किसी एक जानवर का कम होना दूसरे जीवों की संख्या और पर्यावरण की पूरी व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है.
पशु कल्याण के लिए काम करने वाले लोगों और कुछ अध्ययनों के मुताबिक़, पिछले कुछ सालों से भारतीय लोमड़ियों की संख्या लगातार घट रही है और मोरों की संख्या बढ़ी है. 'द स्टेट ऑफ़ इंडियाज़ बर्ड्स 2023' के आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु में मोरों की संख्या छह गुना बढ़ी है.
तो क्या भारतीय लोमड़ियों की संख्या में कमी और मोरों की बढ़ती संख्या आपस में जुड़े हैं?
कैसी होती है भारतीय लोमड़ी?
भारतीय लोमड़ी पर हुए कुछ अध्ययनों के मुताबिक़, यह कुत्तों के परिवार का एक छोटा जानवर है, जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है. भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी यह बड़ी संख्या में पाया जाता है.
भारतीय लोमड़ियां आम तौर पर सूखे इलाक़ों, झाड़ियों वाले जंगलों, सूखे घास के मैदानों और कांटेदार पौधों वाले क्षेत्रों में रहती हैं.
भारतीय लोमड़ी को ऐसा सर्वाहारी जानवर माना जाता है, जो अपने आसपास के माहौल और उपलब्ध भोजन के हिसाब से शिकार तलाशता है.
कीड़े-मकौड़े, चूहे जैसे छोटे जीव, छोटे स्तनधारी जानवर, रेंगने वाले जीव, छोटी चिड़ियां, अंडे और फल उसके भोजन का हिस्सा हैं.
इसी वजह से भारतीय लोमड़ी सूखे इलाक़ों के पर्यावरण में शिकार करने वाले एक महत्वपूर्ण जानवर की भूमिका निभाती है. चूहे, कीड़े-मकौड़े और दूसरे छोटे जीवों को खाकर वह खाद्य शृंखला का एक अहम हिस्सा बनी रहती है.
कोयंबटूर के 'ज़ू आउटरीच संगठन' की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, "भारतीय लोमड़ियां अक्सर खेतों और इंसानी बस्तियों के आसपास दिखाई देती हैं. इससे पता चलता है कि उनमें इंसानों की मौजूदगी के मुताबिक़ ख़ुद को ढालने की अच्छी क्षमता है."
इनके प्रजनन का समय दिसंबर से जनवरी तक रहता है. करीब 50 से 53 दिनों की गर्भावस्था के बाद एक मादा दो से चार बच्चों को जन्म देती है.
तेजी से कम हो रहीं लोमड़ियां

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'द जर्नल ऑफ़ थ्रेटन्ड टैक्सा' के मुताबिक़, "भारतीय लोमड़ियां ज़मीन में मांद बनाकर रहती हैं. बंजर ज़मीन और घास के मैदानों को खेती की ज़मीन में बदले जाने के कारण उनके रहने की जगहें छिन रही हैं."
इसके मुताबिक़, "इस वजह से भारतीय लोमड़ियों की संख्या और उनके पाए जाने वाले इलाक़ों में बड़ी कमी आई है."
"भारतीय लोमड़ियों के लिए सबसे बड़े ख़तरे इंसानों के कारण पैदा होते हैं. इनमें इंसानों का उनका शिकार करना, उनके रहने की जगहों को ख़त्म करना और जंगली कुत्तों से फैलने वाली बीमारियां शामिल हैं."
वन्यजीव शोधकर्ता मोइनुद्दीन कहते हैं, "भारतीय लोमड़ी की प्रजाति पर बहुत कम अध्ययन हुए हैं. इसलिए तमिलनाडु में भी यह ठीक से नहीं पता है कि ये किन-किन इलाक़ों में पाई जाती हैं. इनकी संख्या को लेकर भी व्यवस्थित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं."
वह कहते हैं, "तमिलनाडु में भारतीय लोमड़ियों पर व्यवस्थित रूप से ज़मीनी अध्ययन किए जाने चाहिए. उनके रहने की जगहों और संख्या से जुड़ी जानकारियों को दर्ज किया जाना चाहिए."
विनोद कुमार कहते हैं, "तमिलनाडु के दक्षिणी ज़िलों में पिछले दस वर्षों के दौरान भारतीय लोमड़ियों को देखे जाने की केवल तीन पक्की घटनाएं दर्ज की गई हैं. ये लोमड़ियां तूतीकोरिन और तिरुनेलवेली ज़िलों में देखी गई थीं."
अंधविश्वास और पारंपरिक प्रथाएं

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तमिलनाडु के वन विभाग के मुताबिक़, सलेम ज़िले के कुछ इलाक़ों में पोंगल के दौरान 'बंगाल लोमड़ी जल्लीकट्टू' नाम की एक परंपरा निभाई जाती थी.
वन विभाग के सख़्त नियमों और जागरूकता फैलाने की कोशिशों के कारण अब इसे रोक दिया गया है.
अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, "इस आयोजन के दौरान जंगल से एक बंगाल लोमड़ी को पकड़कर जुलूस के रूप में स्थानीय मंदिर तक लाया जाता था."
"मंदिर में उसके पैर में रस्सी बांधकर उसे गांव की गलियों में दौड़ाया जाता था. इसके बाद लोमड़ी को गांव के हर घर में ले जाया जाता और विशेष पूजा की जाती थी. आख़िर में उसे वापस जंगल में छोड़ दिया जाता था."
इस बारे में विनोद कहते हैं, "इस तरह की परंपराओं का कोई सांस्कृतिक इतिहास हो सकता है. इसके बावजूद जंगली जानवरों को पकड़ने और मारने से पहले से कम संख्या में पाए जाने वाले इन जानवरों पर गंभीर असर पड़ सकता है."
"भारत के वन्यजीव संरक्षण क़ानून के तहत इस तरह की गतिविधियों पर रोक है."
विनोद बताते हैं, "भारतीय लोमड़ियों को पहले वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची दो में रखा गया था. साल 2022 में क़ानून में हुए बदलाव के बाद इसे अनुसूची एक में शामिल कर दिया गया."
"इस बदलाव के बाद भारतीय लोमड़ियों को भी बाघों के बराबर सबसे ऊंची क़ानूनी सुरक्षा मिली है."
लोमड़ी से जुड़ी अनोखी परंपरा

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कुछ दस्तावेज़ों में ऐसी धार्मिक परंपरा का ज़िक्र भी मिलता है, जिसमें भारतीय लोमड़ी के काटने के डर से लोग उसे देवता के रूप में पूजते थे.
एक शोध लेख के मुताबिक़, 20वीं सदी की शुरुआत में आज के बांग्लादेश में आने वाले रंगपुर इलाक़े में 'बगला पूजा' नाम की एक परंपरा निभाई जाती थी.
शोध लेख में कहा गया है, "हिंदू और इस्लाम, दोनों धर्मों को मानने वाले बड़ी संख्या में स्थानीय लोग 'बगला बाबा' नाम के देवता और उनकी सवारी मानी जाने वाली भारतीय लोमड़ी की पूजा करते थे."
"लोगों के बीच यह मान्यता थी कि अगर वे ख़ुद को इन दिव्य शक्तियों के हवाले कर देंगे, तो भारतीय लोमड़ी के काटने से उनकी रक्षा होगी."
"19वीं सदी के आख़िरी वर्षों और 20वीं सदी की शुरुआत में बंगाल के शहरों से बाहर वाले और ग्रामीण इलाक़ों में बड़ी संख्या में कुत्ते और भारतीय लोमड़ियां पाई जाती थीं."
"उस समय इन इलाक़ों में ऐसे अस्पताल नहीं थे, जहां कुत्ते या भारतीय लोमड़ी के काटने पर इलाज हो सके. इस वजह से लोगों के बीच बहुत डर था और इसलिए यह पूजा की जाती थी."
शोध लेख के मुताबिक़, लोगों का यह भी मानना था कि भारतीय लोमड़ी की पूजा करने से उन्हें केवल उस जानवर से सुरक्षा ही नहीं मिलेगी, बल्कि उसकी कुछ शक्तियां भी उन्हें मिल सकती हैं.
मोरों की संख्या और भारतीय लोमड़ियों के बीच क्या संबंध है?

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'द स्टेट ऑफ़ इंडियाज़ बर्ड्स 2023' रिपोर्ट के लिए देशभर में पक्षियों की 942 प्रजातियों का सर्वेक्षण किया गया था.
इस सर्वेक्षण में शामिल वैज्ञानिक सुहैल क़ादर ने बीबीसी को बताया था कि इसके ज़रिए पता चला कि अकेले तमिलनाडु में मोरों की संख्या छह गुना बढ़ गई है.
कोयंबटूर के आनाईकट्टी में मौजूद सलीम अली पक्षी विज्ञान और प्राकृतिक इतिहास केंद्र ने भी तमिलनाडु में मोरों की गिनती की थी.
इसमें अनुमान लगाया गया कि राज्य में मोरों की औसत संख्या करीब 60,85,073 हो सकती है. वहीं इनकी न्यूनतम अनुमानित संख्या करीब 37,76,698 बताई गई.
इस संस्था की ओर से किए गए मोरों के सर्वेक्षण में शामिल 78.70 प्रतिशत किसानों ने कहा कि मोरों की वजह से उनकी फ़सलों को नुक़सान होता है.
रिपोर्ट में कहा गया कि मोरों का शिकार करने वाली जंगली बिल्लियों, भारतीय लोमड़ियों, सियारों, कस्तूरी बिलावों और नेवलों जैसे जानवरों की संख्या में कमी आना, मोरों की संख्या बढ़ने का एक प्रमुख कारण है.
लोमड़ी इकोसिस्टम के लिए अहम क्यों?

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विनोद कहते हैं, "भारतीय लोमड़ियां पक्षियों, उनके अंडों और बच्चों का शिकार कर सकती हैं. भारतीय लोमड़ियों और सियारों जैसे शिकारी जानवरों की संख्या कम होना, एक तरह से मोरों और दूसरे जानवरों की संख्या बढ़ने की वजह बनता है."
"भारतीय लोमड़ी जैसे जानवर छोटे जीवों की संख्या को क़ाबू में रखने वाली प्राकृतिक व्यवस्था का हिस्सा हैं."
"शिकारी जानवरों को हटा देने से यह प्राकृतिक संतुलन बदल जाता है. आख़िर में इसके ऐसे नतीजे सामने आ सकते हैं, जिनका असर खेती और लोगों पर पड़ेगा."
एक अध्ययन में कहा गया है कि चूहे जैसे जीव भारतीय लोमड़ियों के भोजन का बड़ा हिस्सा हैं. इसलिए इन जीवों की संख्या को क़ाबू में रखने में भारतीय लोमड़ी अहम भूमिका निभाती है.
अलग-अलग इलाक़ों में कनखजूरे, ज़मीन पर रहने वाले केकड़े और पक्षियों के अंडे भी भारतीय लोमड़ियों के भोजन के रूप में दर्ज किए गए हैं.
'भारतीय लोमड़ी को देखे छह साल हो गए'
विनोद कहते हैं, "अगर शिकार मौजूद न हो, तो शिकार करने वाला कोई जानवर भी ज़िंदा नहीं रह सकता."
"मिसाल के तौर पर, तमिलनाडु के दक्षिणी हिस्सों में हेजहॉग भारतीय लोमड़ियों के भोजन का हिस्सा रहे हैं. लेकिन हाल के वर्षों में हेजहॉग की संख्या भी कम हो गई है."
उनका कहना है कि यह सोच सही नहीं है कि सभी जानवर केवल संरक्षित जंगलों में रहते हैं. ख़ास तौर पर भारतीय लोमड़ियों के मामले में यह सोच ग़लत है.
विनोद कहते हैं, "दक्षिणी तमिलनाडु में बचे हुए घास के मैदानों और झाड़ियों वाले इलाक़ों को केवल बेकार पड़ी ज़मीन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. उन्हें पर्यावरण की महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं के रूप में पहचान मिलनी चाहिए."
"इनके रहने की जगहों के बीच संपर्क बनाए रखना, बिना ज़रूरत उनकी रहने की जगहों में होने वाले बदलावों को कम करना और इनका शिकार रोकना, इस प्रजाति को बचाने में मदद कर सकता है."
विनोद कहते हैं, "जंगल में किसी भारतीय लोमड़ी को देखे हुए मुझे छह साल हो गए हैं. मुझे उम्मीद है कि एक और भारतीय लोमड़ी देखने के लिए मुझे अगले छह साल इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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