'सतलुज' की कहानी कितनी जसवंत सिंह खालड़ा की और कितनी पंजाब की?

फ़िल्म सतलुज में जसवंत सिंह खालड़ा (बाएं) का किरदार दिलजीत दोसांझ(बाएं) ने निभाया है

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इमेज कैप्शन, फ़िल्म सतलुज में जसवंत सिंह खालड़ा (बाएं) का किरदार दिलजीत दोसांझ(बाएं) ने निभाया है
    • Author, अतुल संगर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 15 मिनट

जसवंत सिंह खालड़ा पंजाब के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, जिन्होंने 1984 से 1994 के बीच अज्ञात व्यक्तियों के शवों के अंतिम संस्कार से जुड़े रिकॉर्ड और दस्तावेज़ जुटाए थे.

उनका आरोप था कि ये लोग पंजाब पुलिस की हिरासत में मारे गए थे. हालांकि, 1995 में खुद खालड़ा का कथित रूप से पुलिस ने अपहरण कर लिया और बाद में उनकी हत्या कर दी गई.

'सतलुज' फ़िल्म जिसका नाम पहले 'पंजाब 1995' और उसके पूर्व 'घल्लूघारा' (नरसंहार) रखा गया था, को रिलीज़ करने के बाद ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म से हटा दिया गया. यह फ़िल्म खालड़ा के जीवन के अंतिम अध्याय और उनके संघर्ष की कहानी पर आधारित है.

आइए जानते हैं कि खालड़ा के जीवन से जुड़ी घटनाओं को यह फ़िल्म किस हद तक तथ्यों के हिसाब से प्रस्तुत करती है. उग्रवाद के दौर में पंजाब के हालात को कैसे चित्रित करती है, और इसका पंजाबी समाज और राजनीति पर क्या संभावित प्रभाव पड़ सकता है.

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वीडियो कैप्शन, सतलुज फ़िल्म 90 के दशक के पंजाब से जुड़े तथ्यों को क्या ठीक तरह से रखती है?

जसवंत सिंह खालड़ा कौन थे और उन्होंने क्या किया था?

जसवंत सिंह खालड़ा (बाएं) और पत्नी परमजीत कौर खालड़ा (दाएं)

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इमेज कैप्शन, जसवंत सिंह खालड़ा (बाएं) के लापता हो जाने के बाद उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा (दाएं) ने इसकी जांच कराने में अपना पूरा जीवन लगा दिया

जसवंत सिंह खालड़ा पंजाब के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे. उन्होंने अपने एक सहयोगी के साथ मिलकर अमृतसर, पट्टी और तरनतारन के तीन श्मशान घाटों से रिकॉर्ड और दस्तावेज़ जुटाए. इन दस्तावेज़ों के आधार पर उन्होंने दावा किया कि 1984 से 1994 के बीच लगभग 3,000 लोगों के शवों का अवैध रूप से अंतिम संस्कार किया गया था.

खालड़ा का आरोप था कि इनमें से कई लोग पंजाब पुलिस की हिरासत में मारे गए थे. उनकी जुटाई जानकारियों के शुरुआती निष्कर्षों को जनवरी 1995 में भारतीय मीडिया में प्रकाशित किया गया. बाद में इस मुद्दे को कनाडाई संसद के निचले सदन में भी उठाया गया.

सितंबर 1995 में पंजाब पुलिस ने खालड़ा का उनके अमृतसर स्थित घर से अपहरण कर लिया. उन्हें कई सप्ताह तक ग़ैरक़ानूनी हिरासत में रखा गया, यातनाएं दी गईं और पुलिस हिरासत में ही उनकी हत्या कर दी गई.

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बताया जाता है कि अक्तूबर 1995 में उनकी हत्या के बाद उनका शव हरिके में, सतलुज और ब्यास नदियों के संगम के पास फेंक दिया गया था.

खालड़ा के अपहरण के कुछ ही दिनों बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह ने अकाली नेता जीएस तोहरा की ओर से भेजे गए एक टेलीग्राम को हेबियस कॉर्पस पिटीशन (सशरीर उपस्थित करने से जुड़ी कानूनी याचिका) के रूप में स्वीकार कर लिया. इसी दौरान खालड़ा की पत्नी ने भी सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के गृह सचिव, पुलिस प्रमुख (डीजीपी) और अमृतसर के एसएसपी से एक सप्ताह के भीतर जवाब मांगा. फिर खालड़ा के अपहरण के लगभग दो महीने बाद नवंबर 1995 में न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की पीठ ने इस मामले की सीबीआई जांच का आदेश दे दिया.

1996 में सामने आई सीबीआई की शुरुआती जांच में यह निष्कर्ष निकला कि खालड़ा का अपहरण किया गया था. 1999 में सीबीआई की विस्तृत जांच रिपोर्ट आई जिससे यह स्थापित हुआ कि उनकी हत्या की गई थी.

2005 में पटियाला की सीबीआई विशेष अदालत ने इस मामले में छह पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया.

इस दौरान इस मामले के मुख्य अभियुक्त और तरन तारन के तत्कालीन एसएसपी अजीत सिंह संधू आत्महत्या कर चुके थे. वहीं एक अन्य पुलिस अधिकारी डीएसपी अशोक कुमार की प्राकृतिक कारणों से मृत्यु हो गई थी.

इसके बाद 2007 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने मामले में फैसला सुनाते हुए पांच पुलिस अधिकारियों को उम्रकैद की सज़ा दी. वहीं एक अभियुक्त को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया.

बाद में 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा.

1995 में खालड़ा के कथित अपहरण की सीबीआई जांच का आदेश देते समय, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की पीठ ने एक और महत्वपूर्ण निर्देश दिया. अदालत ने उन अज्ञात शवों के अवैध अंतिम संस्कार के आरोपों की भी सीबीआई जांच कराने को कहा, जिनका उल्लेख खालड़ा ने अमृतसर, पट्टी और तरन तारन के तीन श्मशान घाटों के रिकॉर्ड के आधार पर किया था.

सीबीआई की जांच में खालड़ा की तैयार की गई सूचियों में से 2,097 अवैध अंतिम संस्कारों की पहचान की गई. इनमें से लगभग 600 शवों की पहचान भी की जा सकी.

बाद में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने इस मामले की आगे जांच की. आयोग लगभग 1,500 मामलों में मृतकों की पहचान करने और उनके परिजनों को मुआवज़ा देने में सफल रहा. आयोग का निष्कर्ष था कि इन मामलों में अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार के लिए निर्धारित क़ानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था.

इस मामले में 1996 में दिए गए अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि "मानवाधिकारों का बड़े पैमाने पर गंभीर उल्लंघन हुआ है." अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जहां-जहां क़ानून का उल्लंघन हुआ है, वहां संबंधित पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ सीबीआई प्राथमिकी (एफ़आईआर) दर्ज़ करे.

इसके बाद कई वर्षों तक पंजाब पुलिस के अनेक अधिकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज़नों एफ़आईआर दर्ज़ की गईं. कई मामलों की जांच हुई और मुक़दमे चले. इनमें से कई पुलिस अधिकारियों को अदालतों ने दोषी ठहराया और सज़ा सुनाई, जबकि कुछ मामले आज भी विभिन्न अदालतों में लंबित हैं.

फ़िल्म 'सतलुज': खालड़ा के जीवन का चित्रण कितना सटीक?

जसवंत सिंह खालड़ा

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इमेज कैप्शन, जसवंत सिंह खालड़ा को 6 सितंबर 1995 को अमृतसर के कबीर पार्क स्थित घर से अगवा किया गया था

फ़िल्म सतलुज मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन के अंतिम दौर से प्रेरित है. फ़िल्म में अज्ञात शवों के अवैध अंतिम संस्कार के मुद्दे को उजागर करने के उनके प्रयासों, फिर बाद में उनके अपहरण और हत्या की घटनाओं को केंद्र में रखा गया है.

हालांकि फ़िल्म में कुछ पात्रों और स्थानों के नाम बदल दिए गए हैं, लेकिन कुल मिलाकर यह खालड़ा के जीवन के अंतिम दिनों से जुड़ी घटनाओं को न्यायिक रिकॉर्ड और उपलब्ध तथ्यों के काफ़ी क़रीब दिखाती है.

यह फ़िल्म उस दौर में भी मानवाधिकारों के प्रति जसवंत सिंह खालड़ा की अडिग प्रतिबद्धता को दर्शाती है, जब पंजाब में आतंकवाद-विरोधी अभियान के दौरान पुलिस को लगभग असीमित अधिकार प्राप्त थे.

हालांकि, फ़िल्म में कुछ घटनाओं को अधिक नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया गया है. कई पात्रों के नाम बदले गए हैं और कुछ दृश्यों को इस तरह दिखाया गया है कि वे वास्तविक घटनाओं की तुलना में अधिक भावनात्मक असर पैदा करें.

इसलिए यह कहना मुश्किल है कि फ़िल्म में दिखाई गई हर घटना वास्तविक जीवन में ठीक उसी तरह घटी थी.

पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या को फ़िल्म में काफ़ी सरल और सीमित ढंग से दिखाया गया है. फ़िल्म इस घटना के पीछे मौजूद उस व्यापक साज़िश को पर्याप्त रूप से सामने नहीं लाती, जिसे बब्बर ख़ालसा इंटरनेशनल (बीकेआई) ने अंजाम दिया था. उस समय बीकेआई सबसे ख़तरनाक और प्रभावशाली ख़ालिस्तानी उग्रवादी संगठनों में गिना जाता था.

मुख्यमंत्री की हत्या करने वाला आत्मघाती हमलावर दिलावर सिंह पंजाब पुलिस में एक कांस्टेबल था, लेकिन जांच में यह भी सामने आया था कि वह बीकेआई से जुड़ा हुआ था. फ़िल्म इस पहलू को पूरी गहराई और संदर्भ के साथ नहीं दिखाती.

हालांकि फ़िल्म में कुछ शुरुआती गवाहों और उनसे जुड़ी जानकारियों का चित्रण पूरी तरह तथ्यात्मक नहीं माना जा सकता, लेकिन जसवंत सिंह खालड़ा से जुड़ी घटनाओं का चित्रण कुल मिलाकर तथ्यात्मक है.

फ़िल्म की एक बड़ी आलोचना यह है कि वह 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत के पंजाब के व्यापक सामाजिक और राजनीतिक माहौल की स्पष्ट तस्वीर पेश नहीं करती.

फ़िल्म में उस दौर में सक्रिय सशस्त्र उग्रवादी संगठनों की मौजूदगी को पर्याप्त रूप से नहीं दिखाया गया है. उस समय कई उग्रवादी समूह अत्याधुनिक हथियारों, यहाँ तक कि रॉकेट लॉन्चरों से भी लैस थे.

यह वह दौर था जब आम लोग लगातार भय और असुरक्षा के माहौल में जी रहे थे. वे कभी उग्रवादियों के निशाने पर आते थे, तो कभी सुरक्षा बलों की कार्रवाई से प्रभावित होते थे. उस समय के पंजाब की पहचान इसी डर और अनिश्चितता से होती थी.

उग्रवादी संगठनों ने समाज पर कई तरह के फ़रमान भी थोपे जाते थे. शादियों के तौर-तरीकों, महिलाओं के पहनावे, दुकानों के साइनबोर्ड के रंगों और उन पर इस्तेमाल की जाने वाली भाषा तक को लेकर निर्देश जारी किए जाते थे. शिक्षकों, सरकारी अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के लिए भी आदेश जारी किए जाते थे.

इसके अलावा, कई कुख्यात उग्रवादी नेताओं ने सरकारी अधिकारियों और पुलिस कर्मियों के नामों वाली हिट लिस्टें तैयार कर उनका प्रसार भी किया था. ऐसे फ़रमान, धमकियाँ और हिट लिस्टें उस दौर के पंजाब में व्यापक रूप से प्रचलित थीं, लेकिन फ़िल्म इन पहलुओं को अपेक्षित विस्तार और संदर्भ के साथ सामने नहीं ला पाती.

उस दौर में कई ऐसी घटनाएँ सामने आईं, जिनमें निर्दोष यात्रियों को बसों से उतारकर गोली मार दी गई. ढिलवां, मुक्तसर, होशियारपुर, लालरू और फ़तेहाबाद जैसी जगहों पर इस तरह के हमलों की ख़बरें व्यापक रूप से दर्ज़ की गईं.

उग्रवादियों ने ट्रेनों को भी निशाना बनाया. लुधियाना, फ़िरोज़पुर और अन्य स्थानों पर यात्री ट्रेनों पर हुए हमलों में कई नागरिकों की हत्या कर दी गई. इनमें बड़ी संख्या ऐसे मज़दूर भी थे जो पंजाब में खेती-किसानी के काम के लिए दूसरे राज्यों से आते थे.

उस समय जब भी किसी हमले के बाद उग्रवादी संगठन घटनास्थल पर पर्चा फेंककर उसकी ज़िम्मेदारी लेते थे, पूरे इलाक़े में डर और दहशत की लहर फैल जाती थी.

लोगों को आशंका रहती थी कि कहीं अगला हमला उनके क्षेत्र में न हो जाए. ऐसे हमलों और धमकियों ने पंजाब के सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला था और आम नागरिक लगातार भय के साए में जीने को मजबूर थे.

उस दौर में केवल आम नागरिक ही नहीं, बल्कि स्थानीय अख़बार, संपादक, पत्रकार, आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) के कर्मचारी और यहाँ तक कि अख़बार बेचने वाले हॉकर भी उग्रवादियों के निशाने पर थे. उन्हें धमकियाँ दी जाती थीं और कई मामलों में उन पर हमले भी किए गए.

पंजाब केसरी–हिंद समाचार समूह ने अपने दो संपादकों को हिंसा में खो दिया. इसी तरह कई अन्य समाचार संस्थानों के पत्रकार और कर्मचारी भी हमलों का शिकार बने.

सौ वर्ष से अधिक पुराना अख़बार द ट्रिब्यून भी ऐसे दबाव में आ गया था कि उसे कई बार उग्रवादी संगठनों के बयान ज्यों का त्यों प्रकाशित करने पड़े.

इन घटनाओं का उल्लेख उस समय के स्थानीय समाचार पत्रों और पंजाब पर लिखी गई अनेक पुस्तकों में मिलता है.

उस समय पंजाब के अनेक गाँवों के लोग लगातार भय और असुरक्षा के माहौल में जी रहे थे. कई इलाक़ों में उग्रवादी लोगों को अपने पालतू कुत्तों को मार देने तक के निर्देश देते थे, क्योंकि उनके भौंकने से सुरक्षा बलों को गतिविधियों की जानकारी मिल सकती थी.

कई वर्षों तक पंजाब के अधिकांश हिस्सों में अंधेरा होने के बाद लगभग कर्फ़्यू जैसे हालात बने रहते थे. लोग आपात स्थिति में भी रात के समय यात्रा करने से कतराते थे.

जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहतर थी, वे अपने बच्चों को शहरों या पंजाब से बाहर स्थित छात्रावासों में भेज देते थे ताकि वे अपेक्षाकृत सुरक्षित माहौल में रह सकें.

कई व्यापारी और उद्योगपति पंजाब छोड़कर दूसरे राज्यों में चले गए. जो लोग वहीं रहे, उनमें से अनेक को नियमित रूप से उग्रवादियों को वसूली (एक्सटॉर्शन) की रकम देनी पड़ती थी. जो लोग ऐसा नहीं कर पाते थे, वे अक्सर आसान निशाना बन जाते थे.

इन परिस्थितियों का असर केवल किसी एक समुदाय पर नहीं पड़ा. सिख और गैर-सिख, दोनों ही समुदायों के लोगों ने इस दौर की हिंसा, भय और असुरक्षा का सामना किया.

फ़िल्म सतलुज की एक आलोचना यह भी है कि वह इन व्यापक परिस्थितियों को पर्याप्त रूप से नहीं दिखाती. फ़िल्म में उस माहौल का सीमित चित्रण है, जब सुरक्षा बलों का मनोबल कई क्षेत्रों में काफ़ी गिर चुका था और पंजाब के कुछ इलाक़ों में उग्रवादी संगठनों का प्रभाव और नियंत्रण काफ़ी मज़बूत हो गया था.

कई लोगों का तर्क है कि फ़िल्म पंजाब में उग्रवाद के दशक के दौरान मौजूद परिस्थितियों की पूरी तस्वीर पेश नहीं करती.

आलोचकों के अनुसार, फ़िल्म यह पर्याप्त रूप से नहीं दिखाती कि उस समय पंजाब पुलिस और आम नागरिक किन असाधारण हालात में काम कर रहे थे और जीवन बिता रहे थे.

इस अर्थ में देखा जाए तो फ़िल्म एक सीमित और एकतरफ़ा नैरेटिव प्रस्तुत करती है, जिसमें व्यापक ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ का अभाव दिखाई देता है.

हालांकि, फ़िल्म के समर्थकों का कहना है कि इसका उद्देश्य पूरे उग्रवाद विरोधी दौर का इतिहास प्रस्तुत करना नहीं है. उनका तर्क है कि यह फ़िल्म एक विशेष व्यक्ति जसवंत सिंह खालड़ा और उनके जीवन के एक विशेष कालखंड पर केंद्रित है, और इस दृष्टि से यह अपने उद्देश्य को ईमानदारी से पूरा करती है.

फ़िल्म उस दौर में पुलिस के मनमाने रवैये और सत्ता के दुरुपयोग को प्रभावी ढंग से सामने लाती है. यह भी दिखाती है कि उस समय कुछ पुलिस अधिकारी हिरासत में हत्याओं जैसे गंभीर कृत्यों में शामिल थे.

ऐसे कई मामलों की पुष्टि बाद में विभिन्न अदालतों के फ़ैसलों और जांचों में भी हुई. लेकिन फ़िल्म मुख्यतः इसी बिंदु तक सीमित रहती है और व्यापक परिप्रेक्ष्य में जाने का प्रयास नहीं करती.

फ़िल्म सतलुज में बार-बार यह दावा सामने आता है कि लगभग 25,000 सिख युवक मारे गए या लापता हो गए थे.

जबकि जसवंत सिंह खालड़ा और उनके सहयोगी ने केवल तीन श्मशान घाटों की जांच की थी. सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हुई सीबीआई जांच में 2,097 अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार का पता चला था.

25,000 का आंकड़ा किसी आधिकारिक जांच की पुष्टि पर आधारित नहीं, बल्कि अनुमानों पर आधारित है. यह संभव है कि अगर पंजाब के सभी श्मशान घाटों और संबंधित रिकॉर्ड की व्यापक जांच की जाती, तो संख्या इससे अधिक निकलती. लेकिन इस विषय पर पूरे राज्य में कभी कोई व्यापक जांच नहीं हुई.

गौरतलब है कि शिरोमणि अकाली दल (बादल) ने 1997 के विधानसभा चुनावों के अपने घोषणा-पत्र में इस मामले की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग गठित करने का वादा किया था. लेकिन सत्ता में आने के बाद वह इस वादे को पूरा नहीं कर सका.

पंजाब में फ़िल्म सतलुज को कैसी प्रतिक्रिया मिल रही है?

2007 में अमृतसर में ह्यूमन राइट्स फ़्रंट के सदस्यों ने पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में मारे गए युवाओं के लिए न्याय की मांग उठाते हुए प्रदर्शन किया (फ़ाइल फ़ोटो)

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इमेज कैप्शन, 2007 में अमृतसर में ह्यूमन राइट्स फ़्रंट के सदस्यों ने पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में मारे गए युवाओं के लिए न्याय की मांग उठाते हुए प्रदर्शन किया, ऐसे प्रदर्शन यहां समय-समय पर देखे जाते हैं (फ़ाइल फ़ोटो)

फ़िल्म सतलुज ने पंजाब के सामाजिक और राजनीतिक माहौल में मानो नई हलचल पैदा कर दी है. फ़िल्म से दिलजीत दोसांझ और हनी त्रेहान जैसे चर्चित नाम जुड़े होने के साथ-साथ इसका विषय भी पंजाब के उग्रवाद के दौर से संबंधित है.

यही वजह है कि बहुत से लोग वर्षों से इस फ़िल्म के रिलीज़ होने का इंतज़ार कर रहे थे. सेंसर बोर्ड की आपत्तियों और कई दृश्यों को हटाने के निर्देश के कारण इसकी रिलीज़ लंबे समय तक अटकी रही थी.

ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म से हटाए जाने तक इसे हज़ारों लोग डाउनलोड कर चुके थे. इसके बाद भी यह इंटरनेट के कई लिंक्स के ज़रिए आसानी से उपलब्ध रही. पंजाब के कई वर्गों में फ़िल्म को लेकर खुला और ज़ोरदार समर्थन देखने को मिला है.

पंजाब ही नहीं, देश के अन्य हिस्सों के कई कलाकारों ने भी फ़िल्म का स्वागत किया है. कुछ मीडिया संस्थानों ने इसकी बेहद सकारात्मक समीक्षा भी की है.

अतीत में कई बार पंजाब की सत्ता संभाल चुकी शिरोमणि अकाली दल (बादल) ने फ़िल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की घोषणा की. पंजाब और पंजाब से बाहर कई गुरुद्वारा परिसरों में भी फ़िल्म दिखाई जा रही है.

दिलचस्प बात यह है कि पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं ने भी इन सार्वजनिक प्रदर्शनों पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि पंजाब के लोगों को यह देखना चाहिए कि कांग्रेस शासन के दौरान कथित रूप से क्या हुआ था.

भावनाओं से भरे इस माहौल में कई सिखों का मानना है कि लंबे समय तक सार्वजनिक चर्चा से बाहर रही घटनाएँ अब लोगों के सामने आ रही हैं. उनके अनुसार, फ़िल्म ने जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष से जुड़े तथ्यों को व्यापक समाज तक पहुँचाने का काम किया है.

हालांकि, सभी लोग इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं. अनेक सिख और ग़ैर-सिख दर्शक मानते हैं कि फ़िल्म उस दौर की पूरी तस्वीर पेश नहीं करती. सोशल मीडिया से लेकर आम बाज़ारों की चर्चाओं में, इस विषय पर खुलकर मतभेद सामने आ रहे हैं.

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते और भाजपा नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने फ़िल्म पर कड़ी आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि यह एकतरफ़ा कहानी पेश करती है और इसमें आम नागरिकों और पुलिस बल की झेली गई पीड़ा को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है.

वहीं कांग्रेस का रुख़ पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. पार्टी के कुछ नेता फ़िल्म के प्रदर्शन का समर्थन करते दिखाई देते हैं, जबकि कुछ अन्य इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं.

पंजाबी समाज का एक वर्ग ऐसा भी है, जो उग्रवादियों की हिंसा का सीधे तौर पर शिकार रहा था. इस वर्ग के कुछ लोग निजी तौर पर उस दौर में पुलिस की ज्यादतियों को नज़रअंदाज़ करते रहे हैं या उन्हें परिस्थितियों की मजबूरी मानते रहे हैं.

ऐसे लोगों के साथ-साथ पंजाब पुलिस के कई सेवानिवृत्त अधिकारियों के बीच भी फ़िल्म को लेकर चिंता देखी जा रही है.

ग़ौरतलब है कि 2001 में, जब उग्रवाद के दौर से जुड़े कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों में कई पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ मुक़दमे चल रहे थे, तब पंजाबी समाज के एक हिस्से ने मांग की थी कि ऐसे अधिकारियों को सामान्य माफ़ी (जनरल एमनेस्टी) दी जाए.

उसी वर्ष जालंधर में हिंद समाचार समूह के एक कार्यक्रम में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि केंद्र सरकार ऐसे पुलिस अधिकारियों को क़ानूनी और आर्थिक सहायता देने पर विचार करेगी.

अब फ़िल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन के ख़िलाफ़ अदालत में एक याचिका भी दायर की जा चुकी है. इसके साथ ही इस मुद्दे को लेकर पंजाब का माहौल धीरे-धीरे और अधिक भावनात्मक होता जा रहा है.

स्पष्ट है कि सतलुज अब केवल एक फ़िल्म नहीं रह गई है. यह पंजाब के इतिहास, उग्रवाद, मानवाधिकारों और न्याय को लेकर चल रही व्यापक बहस का एक प्रमुख केंद्र बन चुकी है.

पंजाब में फ़िल्म सतलुज का संभावित सामाजिक और राजनीतिक असर क्या हो सकता है?

सामाजिक और राजनीतिक हलकों में सामने आ रही तीखी और बंटी हुई प्रतिक्रियाओं से साफ़ है कि यह भावनात्मक मुद्दा पंजाब में लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रह सकता है.

उग्रवाद के लगभग 12-13 वर्षों के दौर में पंजाब के हज़ारों परिवार प्रभावित हुए थे. कुछ लोग उग्रवादियों की हिंसा के शिकार बने, कुछ सुरक्षा बलों की कार्रवाई से प्रभावित हुए, और लगभग सभी ने वर्षों तक भय और असुरक्षा के माहौल में जीवन बिताया.

इसी वजह से पंजाब में उस दौर को लेकर अलग-अलग और अक्सर एक-दूसरे के विपरीत नैरेटिव दशकों से मौजूद हैं. सतलुज के आने के बाद ये मतभेद एक बार फिर खुलकर सामने आ गए हैं.

ऐसे माहौल में दोनों पक्षों की पहले से मौजूद धारणाएँ और पूर्वाग्रह और मज़बूत हो सकते हैं. समाज में विचारों का ध्रुवीकरण बढ़ने की संभावना है, और राजनीतिक दल भी इस बहस में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं.

पंजाब में अगला विधानसभा चुनाव अगले वर्ष फ़रवरी से पहले होना है. अभी यह कहना मुश्किल है कि सतलुज को लेकर चल रही बहस चुनावी मुद्दा बनेगी या नहीं. लेकिन इतना तय है कि कोई भी राजनीतिक दल इस अवसर को अपने-अपने राजनीतिक नैरेटिव को मज़बूत करने के लिए छोड़ना नहीं चाहेगा.

फ़िल्म मुख्य रूप से एक प्रमुख सिख व्यक्तित्व की पीड़ा और संघर्ष पर केंद्रित है. सिख समुदाय के एक बड़े वर्ग ने इस चित्रण का समर्थन भी किया है. ऐसे में समुदाय के भीतर पीड़ित होने की भावना (विक्टिमहुड) एक बार फिर सतह पर आ सकती है.

दूसरी ओर, समाज का एक वर्ग फ़िल्म में दिखाए गए पंजाब के चित्रण से सहमत नहीं है. उसका मानना है कि फ़िल्म उस दौर की पूरी और संतुलित तस्वीर प्रस्तुत नहीं करती. नतीजतन, सिख समुदाय के भीतर पीड़ित होने की धारणा और अधिक मज़बूत हो सकती है, जबकि विरोधी मत रखने वाले वर्गों की आपत्तियाँ भी बनी रह सकती हैं.

शिरोमणि अकाली दल (बादल) के लिए यह मुद्दा राजनीतिक रूप से पूरी तरह सहज नहीं है. पार्टी ने अतीत में उग्रवाद के दौर की घटनाओं की न्यायिक जांच कराने का वादा किया था, लेकिन उसे पूरा नहीं किया. इसलिए उसके लिए इस मुद्दे को पूरी तरह अपने पक्ष में इस्तेमाल करना आसान नहीं होगा.

हालांकि, 'वारिस पंजाब दे' जैसे कट्टरपंथी सिख समूहों को इससे राजनीतिक लाभ मिल सकता है. ये समूह लंबे समय से पंजाब में राज्य की कथित ज्यादतियों के नैरेटिव को प्रमुखता से उठाते रहे हैं.

2024 के लोकसभा चुनाव में दो सीटें जीतने के बाद उनकी राजनीतिक उपस्थिति भी बढ़ी है. ऐसे में यदि सिख जनमत इस दिशा में और मज़बूत होता है, तो उन्हें इसका फ़ायदा मिल सकता है.

पंजाब में जब भी उग्रवाद के दौर से जुड़ा कोई ऐसा प्रसंग सामने आता है, जिसमें किसी एक समुदाय या वर्ग की पीड़ा पर ज़ोर दिया जाता है, तो समाज में मतभेद उभर आते हैं.

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि उस दौर के घाव अब तक पूरी तरह भरे नहीं हैं. साथ ही, उन सभी वर्गों के बीच संवाद और मेल-मिलाप का कोई व्यापक प्रयास भी नहीं हुआ, जिन्होंने उस दौर में किसी न किसी रूप में कष्ट झेला था.

कई समाजशास्त्रियों और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में "सत्य और मेल-मिलाप" जैसी प्रक्रिया की आवश्यकता है. इसके तहत उन लोगों को, जिन्होंने किसी भी समुदाय के ख़िलाफ़ अत्याचार किए, पीड़ितों के सामने आकर उनकी बात सुननी चाहिए और सार्वजनिक रूप से अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए.

जब तक इस तरह का कोई व्यापक सामाजिक प्रयास नहीं होता, तब तक उग्रवाद के दौर से जुड़ी घटनाएँ समय-समय पर समाज में नई बहस, विभाजन और राजनीतिक तनाव पैदा करती रहेंगी.

सतलुज से उपजी बहस भी इसी व्यापक और अभी तक अनसुलझे ऐतिहासिक प्रश्न का एक नया अध्याय बनती दिखाई देती है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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