जंतर-मंतर: 'जयसिंह की वैज्ञानिक उड़ान' जहाँ ग्रह अपनी कक्षाएं और आंदोलन सत्ता की धड़कनें नापते हैं

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- Author, त्रिभुवन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
साल 1724 में बनी खगोलीय वेधशाला जंतर मंतर 2026 के जेन-ज़ी आंदोलन से अचानक विश्व भर में फिर से चर्चित हो गई.
यह वही जगह है, जहाँ सूर्य की रश्मियाँ सेकंड तक गिनती हैं और किसान, स्त्रियाँ, सैनिक, पहलवान और विद्यार्थी सत्ता से न्याय के वर्षों का हिसाब माँगते आए हैं.
नई दिल्ली में सूर्य जब कनॉट प्लेस की सफेद इमारतों से ऊपर उठता है, जंतर मंतर के गेरुए पत्थरों पर उसकी छाया बहुत धैर्य से खिसकती है.
वह न कोई नारा लगाती है, न सड़क रोकती है, न पुलिस से अनुमति माँगती है. पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और पत्थर उसकी गति को समय में अनूदित कर देते हैं.
लेकिन इसी वेधशाला से कुछ कदम दूर संसद मार्ग की सड़क पर समय की एक दूसरी गणना चलती रही है.
भूख हड़ताल के दिनों, पुलिस हिरासत की रातों, सरकारी आश्वासनों की आयु, लंबित नियुक्तियों के वर्षों और न्याय की प्रतीक्षा में बीतती मनुष्य की पूरी जवानी की गणना.
अशोक रोड और टॉल्स्टॉय मार्ग के बीच सड़क का यह साधारण सा घुमावदार हिस्सा दिल्ली के लिए ग्रेटर लंदन के 'हाइड पार्क' जैसा चुका है. सबके सामने, प्रतीकात्मक और सत्ता के इतना नज़दीक कि उसे नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है.
बीते सप्ताह जेन-ज़ी ने इस पुराने ग्रहपथ में नई गति भर दी. 2026 के मई में एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन प्रतिक्रिया से निकले कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन इसी ऐतिहासिक भूगोल पर उभरा.
लेकिन जंतर मंतर के इतिहास में हर विजय अगले प्रश्न को जन्म देती है.

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जंतर-मंतर के दोनों इतिहास यानी खगोलीय विज्ञान और जन-प्रतिरोध एक-दूसरे से अलग दिखाई देते हैं, लेकिन वे भीतर से एक ही मानवीय आकांक्षा के दो रूप हैं: अव्यवस्था को समझना और उसका हिसाब लेना.
जंतर मंतर केवल धरना देने की जगह नहीं. यह स्वतंत्र भारत की राजनीतिक स्मृति का खुला अभिलेखागार है.
यहाँ नर्मदा के विस्थापित आए, सूखे और कर्ज़ से टूटे किसान आए, स्त्री-सुरक्षा की माँग करते युवा आए. पदक पहने सैनिक और पहलवान आए, कर्मचारी, शिक्षक, चिकित्सक और विद्यार्थी आए.
यहां औपचारिक संगठन आए और ऐसे अकेले इंसान भी आए जिनके पास अपने दु:ख के अतिरिक्त कोई संगठन नहीं था.
वहाँ भीड़ बढ़े तो समझना चाहिए कि संस्थाओं और नागरिकों के बीच संवाद का आकाश बादलों से भर गया है.
वहाँ युवा प्रश्न लेकर बैठें तो यह केवल किसी मंत्री अथवा परीक्षा एजेंसी का संकट नहीं, पूरे गणतंत्र की समय-सारिणी में आई गड़बड़ी है.
और जब कोई विद्यार्थी वहाँ खड़ा होकर पूछता है- "हमारा भविष्य कहाँ है?" तो वह केवल सरकार से उत्तर नहीं माँगता. वह उस गणतंत्र से अपना समय वापस माँगता है.
जंतर-मंतर कैसे बना मुख्य प्रदर्शन स्थल

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जंतर-मंतर से पहले दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन का एक ज़्यादा भव्य मंच हुआ करता था. यह था राजपथ (अब कर्तव्य पथ) के पास बोट क्लब का लॉन.
संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, नॉर्थ और साउथ ब्लॉक के नज़दीक होने की वजह से यह सत्ता को सीधे चुनौती देने के लिए सबसे सही जगह थी.
1988 में हालात तेज़ी से बदले जब किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की अगुवाई में हज़ारों किसानों ने एक हफ़्ते तक इस इलाके को घेरे रखा था.
उन्होंने वहाँ डेरा डाला, खाना पकाया, मवेशी लाए, आसपास ही फ़ारिग हुए और अपनी माँगें माने जाने तक वहीं डटे रहे. विरोध के इस बड़े पैमाने ने सरकार को हिलाकर रख दिया.
1960 के दशक के उत्तरार्ध से 1980 के दशक तक बोट क्लब भारत का विशाल लोकतांत्रिक ध्वनि-पट था.
1993 तक बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद के दौर में बढ़ते राजनीतिक तनाव के बीच अधिकारियों ने चुपचाप विरोध-प्रदर्शनों को राजपथ से हटाकर दूसरी जगह भेजना शुरू कर दिया.
और उसी समय जंतर-मंतर एक बीच का रास्ता बनकर उभरा. यह संसद भवन के पास था, लेकिन बहुत ज़्यादा पास भी नहीं; सबके सामने, लेकिन नियंत्रण में रहने लायक.
लेकिन जंतर-मंतर सिर्फ़ आंदोलन स्थल या प्राचीन इमारत भर नहीं है.
जाने-माने लेखक सलमान रुश्दी ने कुछ समय पहले लिखा था, "मेरे दोस्त और फोटोग्राफ़र साइमन चैपुट ने जंतर-मंतर की तस्वीरों की एक शानदार सिरीज़ बनाई है. जब उसे एक सीमित संस्करण वाली आर्ट बुक में इकट्ठा किया गया तो मैंने उनके साथ एक कहानी लिखी. उस बेहद सीमित संस्करण के अलावा यह कहानी पहले कभी प्रकाशित नहीं हुई है."
कितना ख़ास है जंतर मंतर

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लेकिन जंतर मंतर के निर्माण की प्रचलित गाथाओं के बीच एक अनूठी कहानी भी है.
प्रख्यात लेखक पॉल लुंदे 'जयसिंह एंड द जंतर मंतर' में लिखते हैं, "जिस समय यूरोप में जेसुइट मिशनरी कॉपरनिकस, टायको ब्राहे और गैलीलियो जैसे महान खगोल वैज्ञानिकों को धर्म-विरोधी मानते थे, सवाई जयसिंह एक वैज्ञानिक उड़ान भर रहे थे."
जिस जंतर मंतर पर कभी सम्राट यंत्र आकाशीय गति का कोण नापता था, अब प्रदर्शनकारी राज्य और नागरिक के बीच बढ़ती दूरी को दर्शाते हैं.
जयप्रकाश यंत्र आकाश का उलटा नक्शा धरती पर उतारता है तो जंतर मंतर की सड़क देश के उस उलटे लोकतांत्रिक नक्शे को सामने रखती हैं, जिसमें संविधान जनता को सर्वोच्च कहता है, लेकिन जनता को अपनी बात कहने के लिए बैरिकेड, अनुमति-पत्र और निर्धारित समय की सीमाएँ पार करनी पड़ती हैं.
कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ़ आर्किटेक्चर, आर्ट एंड प्लानिंग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर एमिरेटस बैरी पेरलस की पुस्तक "सेलेसियल मिरर: द एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरीज़ ऑफ़ जय सिंह II" जंतर मंतर की सबसे खूबसूरत और गहन विज़ुअल डॉक्यूमेंटेशन मानी जाती है.
बैरी पेरलस लिखते हैं, "जंतर मंतर सिर्फ़ पत्थर के यंत्र नहीं हैं. वे विशाल ज्यामितीय रूपों का ऐसा संयोजन हैं, जो आकाश को धरती पर उतार लाते हैं. जय सिंह ने वास्तुकला को विज्ञान का उपकरण बना दिया."

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वास्तुविद और इतिहासकार अनीशा शेखर मुखर्जी का "जंतर मंतर : महाराजा सवाई जयसिंह्ज़ ऑब्जर्वेटरी इन डेल्ही" में कहना है, "दिल्ली का जंतर मंतर एक पहेली है. इसकी विशाल और आकर्षक संरचनाएँ आज भी विस्मय पैदा करती हैं. जो पहली नज़र में अमूर्त मूर्तिकला जैसा लगता है, वह वास्तव में पूरी तरह विज्ञान की सेवा में समर्पित वास्तुकला है - हर संरचना नंगी आँखों से समय और आकाशीय पिंडों की स्थिति मापने के लिए सावधानीपूर्वक बनाई गई है."
इसीलिए जंतर मंतर केवल दिल्ली का स्मारक अथवा धरना-स्थल नहीं, भारत का राजनीतिक हृदयलेख है. ऐसी जगह जहाँ देश के सबसे शक्तिहीन नागरिक अपनी अनुपस्थिति को उपस्थिति में बदलते हैं.
जंतर मंतर का धरना-स्थल बनना उसकी अठारहवीं शताब्दी की योजना का हिस्सा नहीं था. उसका यह दूसरा जीवन स्वतंत्र भारत और नई दिल्ली की सत्ता-संरचना ने मिलकर गढ़ा.
1911 से 1930 के बीच नई दिल्ली को ब्रिटिश साम्राज्य ने ऐसी केंद्रीय प्रशासनिक राजधानी के रूप में रचा था जो कलकत्ता के राजनीतिक उबाल, क्षेत्रीय प्रभावों और राष्ट्रवादी भीड़ से भौतिक दूरी बना सके.
इतिहास की शोधार्थी हरलीन कौर के अध्ययन में संसद मार्ग, बोट क्लब, रामलीला मैदान और जंतर मंतर ऐसे स्थल हैं, जिन्हें जनता ने अपनी उपस्थिति से सार्वजनिक बनाया और सरकार ने अनुमति, निषेध, पुलिस नियंत्रण तथा निर्धारित सीमाओं के माध्यम से पुनः व्यवस्थित किया.
2017 में, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पर्यावरण और नागरिक मुद्दों का हवाला देते हुए जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन पर रोक लगाने का आदेश दिया. और लगभग चार किलोमीटर दूर रामलीला मैदान को धरने के लिए नई आधिकारिक जगह घोषित कर दिया.

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जंतर मंतर और आंदोलनों का रिश्ता

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दरअसल, जंतर मंतर और आंदोलनों का यह रिश्ता बहुत पुराना है.
जंतर मंतर का आधुनिक धरना-स्थल वाला इतिहास मुख्यतः 1990 के दशक के आरंभ और विशेष रूप से 1993 के बाद विकसित हुआ.
31 जनवरी 2003 के दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर संख्या 309 का उल्लेख करते हुए केंद्र सरकार ने 2015 में लोकसभा को बताया था कि जंतर मंतर पर पाँच हजार से अधिक लोगों का जमावड़ा नहीं होना चाहिए और वहाँ प्रदर्शनकारियों के वाहन लाने की अनुमति नहीं है.
अधिक संख्या अथवा वाहनों की स्थिति में प्रदर्शन को रामलीला मैदान भेजा जाना था; पचास हजार से अधिक लोगों के लिए बुराड़ी मैदान सुझाया गया और ज्ञापन देने के लिए केवल तीन-चार प्रतिनिधियों को सत्ता-प्रतिष्ठानों तक जाने की व्यवस्था थी.
जंतर मंतर के लोकतांत्रिक पहलुओं पर लंबे समय से विचार करने वाले पत्रकार अनिल सिन्हा कहते हैं, "जिन किसानों, आदिवासियों, संविदाकर्मियों, पेंशनभोगियों, विकलांग नागरिकों, विस्थापित समुदायों, विधवाओं और क्षेत्रीय संगठनों का दिल्ली में कोई कार्यालय, लॉबी अथवा स्थायी राजनीतिक संपर्क नहीं था, जंतर मंतर उन्हें राजधानी में कुछ वर्गमीटर जगह देता था."
वे वहाँ अपनी अर्ज़ियां खोलते, मृत परिजनों की तस्वीरें टाँगते, तिरपाल लगाते, भूख हड़ताल करते और किसी सांसद, पत्रकार, न्यायविद् अथवा मंत्रालय के प्रतिनिधि के रुकने की प्रतीक्षा करते.
उन लोगों के लिए जंतर मंतर भारतीय लोकतंत्र की गरीबों वाली प्रतीक्षाशाला बन गया.
दिल्ली विश्वविद्यालय की रिसर्चर पुष्पांजलि झा के शोध से जंतर मंतर के राजनीतिक जीवन का एक ऐसा सांख्यिकीय चित्र सामने आता है, जो इस छोटी-सी सड़क की असाधारण राष्ट्रीय भूमिका समझाता है.
संसद मार्ग पुलिस थाने के अभिलेखों के आधार पर उनके अध्ययन में दर्ज़ है कि जनवरी 2006 से अगस्त 2010 के बीच जंतर मंतर पर कम से कम 13,118 धरने और 5,491 प्रदर्शन, रैलियाँ और जुलूस हुए.
अकेले 2010 के पहले आठ महीनों में करीब डेढ़ लाख लोगों ने विभिन्न प्रदर्शनों में भाग लिया और कानून के उल्लंघन के आरोप में 12 हजार से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया था.
इसका अर्थ यह नहीं कि हर दिन कोई विराट आंदोलन हो रहा था. इसका अर्थ अधिक गंभीर है: लगभग हर दिन भारत के किसी हिस्से का कोई छोटा समुदाय अपनी पीड़ा उठाकर राजधानी पहुँच रहा था.
अनिल सिन्हा इसे ऐसी 'लोकतांत्रिक जगह' के रूप में देखते हैं जो राज्य से पृथक होते हुए भी राज्य से संवाद करती है-जनता की चुनी, अधिकार में ली हुई, रूपांतरित और बार-बार पुनर्निर्मित जगह.
किन प्रदर्शनों के लिए याद रखा जाएगा जंतर मंतर

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फ्रेंच समाजशास्त्री हेनरी लेफेब्रे ने कभी "राइट टू द सिटी" के विचार में कहा था, "शहर केवल रहने या संपत्ति रखने की वस्तु नहीं, उसमें उपस्थित होने, उसे इस्तेमाल करते हुए जीवन के खोए हुए अधिकारों को हासिल करने और उसके अर्थ को बदलने का अधिकार भी है."
सत्ता अपनी उपस्थिति संसद, मंत्रालय, सुरक्षा, पुलिस बल और सरकारी वास्तुकला से बनाती है. शक्तिहीन नागरिक अपनी उपस्थिति शरीर, पोस्टर, नारे और सड़क पर बिताए समय से बनाते हैं.
डिजिटल दुनिया आंदोलन को गति दे सकती है, लेकिन वह सड़क पर उपस्थित शरीर का पूर्ण विकल्प नहीं.
1990 के दशक में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने जंतर मंतर को बड़े बाँधों की चमकीली विकास-कथा के पीछे डूबते गाँवों, उजड़ते आदिवासियों और अपर्याप्त पुनर्वास का मंच बनाया. मेधा पाटकर और उनके साथियों ने दूरस्थ नदी घाटियों का भूगोल संसद के निकट रख दिया.
नर्मदा के किनारे जिन लोगों को विकास के मानचित्र से विस्थापित किया जा रहा था, उन्होंने राजधानी के मानचित्र पर अपना स्थान बनाया.
2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन ने जंतर मंतर को टेलीविजन युग की राजनीतिक राजधानी बना दिया. पाँच अप्रैल को शुरू हुआ अनशन, सफेद गांधी टोपी, तिरंगा, मोमबत्तियाँ और "मैं अन्ना हूँ" की दृश्य-भाषा पूरे देश में फैल गई.
दिसंबर 2012 में दिल्ली में एक युवती से सामूहिक बलात्कार और उसकी मृत्यु के बाद युवा इंडिया गेट, रायसीना हिल और जंतर मंतर की ओर उमड़े. यह किसी एक नेता की बनाई सभा नहीं थी; यह भय, शोक, अपमान और क्रोध से निकला नागरिक विस्फोट था.
2015 में वन रैंक, वन पेंशन की माँग कर रहे पूर्व सैनिक अपने पदक और सैन्य अनुशासन के साथ यहाँ महीनों बैठे. 2017 में तमिलनाडु के सूखा-पीड़ित किसान जंतर मंतर पहुँचे. वे अपने साथ उन किसानों की खोपड़ियाँ लाने का दावा कर रहे थे. उन्होंने अर्धनग्न प्रदर्शन किया, घास खाई, चूहे दाँतों में पकड़े और अपने शरीर को कृषि संकट का सार्वजनिक दस्तावेज़ बना दिया.
लंबे धरनों ने आसपास के निवासियों के जीवन को भी प्रभावित किया. लगातार लाउडस्पीकर, यातायात अवरोध, अस्थायी ढाँचे, भोजन पकाने और रातभर रहने की व्यवस्था के कारण जंतर मंतर रोड के निवासियों ने शोर, प्रदूषण और दैनिक जीवन में बाधा की शिकायत की.
अक्तूबर 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने जंतर मंतर पर विरोध-प्रदर्शन रोकने और उन्हें रामलीला मैदान स्थानांतरित करने का आदेश दिया. मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा. 23 जुलाई 2018 को मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में न्यायालय ने शांतिपूर्ण सभा के संवैधानिक अधिकार और निवासियों के अधिकारों के बीच संतुलन पर बल दिया.
लोकतांत्रिक राजधानी को निषेधाज्ञा के स्थायी किले में नहीं बदला जा सकता; लेकिन विरोध की स्वतंत्रता भी दूसरे नागरिकों के जीवन को अनिश्चितकाल के लिए नष्ट करने का लाइसेंस नहीं है.
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