नेपाल में तबाही के लिए एक्सपर्ट क्यों उठा रहे हैं चीन पर उंगली

इमेज स्रोत, Getty Images
हर प्राकृतिक आपदा के पीछे वजह होती है. कई बार इंसान उन वजहों को ख़ुद ही पैदा करता है. कभी अनजाने में तो कभी जानते हुए भी.
चीन से लगी नेपाल की सीमा के पास बस्तियों को अपनी चपेट में लेने वाली भीषण बाढ़ ने हिमालय में लोगों के सामने बढ़ते जोखिमों की एक भयावह याद दिला दी है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पर्वत श्रृंखला जलवायु परिवर्तन के कारण बहुत ही नाज़ुक स्थिति में है.
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ की वजह इतनी जल्दी तय नहीं की जा सकती है लेकिन वैज्ञानिकों ने कहा कि आपदा से पहले और बाद की सैटेलाइट तस्वीरों से संकेत मिलता है कि तिब्बत के क़रीब लांगटांग लिरुंग पर्वत के उत्तर में चट्टान का एक बड़ा हिस्सा ढह गया, जिससे उसके ऊपर जमा ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटकर नीचे आ गया.
गिरती हुई चट्टानों और बर्फ़ के करोड़ों क्यूबिक मीटर के मलबे की ताक़त को शुरुआत में भूकंप समझ लिया गया था. कुछ अनुमानों के मुताबिक़, इसने इतनी ऊर्जा पैदा की कि ग्लेशियर की बर्फ़ पिघल गई और चट्टानों, कीचड़, पानी की एक विशाल दीवार भोटेकोशी घाटी से होते हुए दर्जनों मील तक नेपाल में नीचे की ओर बह गई.
इस आपदा ने ग्लेशियरों और पहाड़ी ढलानों से पैदा होने वाले ख़तरों को उजागर किया है, जो जलवायु परिवर्तन से तेज़ी से प्रभावित हो रहे हैं. कुछ विशेषज्ञों को यह भी चिंता है कि चीन की विशाल पनबिजली परियोजनाएं आपदा के जोखिम को और बढ़ा सकती हैं.
चीन को लेकर सवाल

इमेज स्रोत, Getty Images
ब्रह्मा चेलानी नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में स्ट्रैटिजिक स्टडी के प्रोफ़ेसर और बर्लिन स्थित रॉबर्ट बॉश अकादमी में फेलो हैं.
चेलानी नौ किताबों के लेखक हैं, जिनमें 'वॉटर: एशियाज़ न्यू बैटलग्राउंड" भी शामिल है.
चेलानी कहते हैं कि नेपाल की त्रिशूली और भोटेकोशी घाटियों में तबाही मचाने वाली भीषण फ्लैश फ्लड को सिर्फ़ हिमालय में हुई एक और त्रासदी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.
चेलानी ने निक्केई एशिया में लिखा है, ''यह घटना प्राकृतिक आपदा के रूप में शुरू हुई थी. तिब्बत की सीमा के पास 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर के एक हिस्से को काटते हुए बर्फ़ और चट्टानों का एक विशाल हिमस्खलन हुआ. लेकिन ऊपर की ओर तेज़ी से बदले जा रहे पहाड़ी लैंडस्केप से टकराने के बाद यह एक के बाद एक होने वाली विनाशकारी घटनाओं में बदल गई.''
चेलानी के मुताबिक मुख्य सवाल यह है कि नीचे की ओर आते-आते बाढ़ इतनी विनाशकारी क्यों हो गई.''
चेलानी लिखते हैं, ''इसका जवाब चीन की ऊपरी हिस्से में मौजूद इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, नदी के बदले गए मार्गों और सीमा-पार सहयोग की कमी के सामूहिक प्रभाव में छिपा है. इनमें से किसी ने भी ग्लेशियर के टूटने का कारण नहीं बनाया, लेकिन मुमकिन है कि इन सभी ने मिलकर इसके प्रभाव को बढ़ाया होगा.''
चेलानी मानते हैं, ''पिछले एक दशक में चीन के तटबंधों, सीमा सुविधाओं, राजमार्गों और दूसरे निर्माण के विस्तार से ऊपरी घाटी के कुछ हिस्से संकरे हो गए हैं. कंस्ट्रक्शन गतिविधियां नदी के किनारों पर केंद्रित होती गई हैं. सामान्य परिस्थितियों में ऐसी परियोजनाएं व्यापार और परिवहन को सुविधाजनक बनाती हैं. लेकिन ज़्यादा बाढ़ की स्थिति में यही परियोजनाएं जोखिम का कारण बन सकती हैं.''
आख़िर हुआ क्या था?

ग्रेनोबल यूनिवर्सिटी की जियोमॉर्फोलॉजिस्ट क्रिस्टन कुक ने कहा कि ताज़ा सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से संकेत मिला कि लांगटांग लिरुंग में ग्लेशियर के नीचे चट्टान का एक बड़ा हिस्सा ढह गया था.
कुक ने ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स से कहा कि ऊंचे हिमालय में चट्टानों का खिसकना असामान्य नहीं है, लेकिन "इस घटना की असामान्य बात और इसके इतनी बड़ी आपदा बनने की वजह यह है कि यह बेहद विशाल थी."
ब्रिटेन की डंडी यूनिवर्सिटी के पर्यावरण वैज्ञानिक साइमन कुक ने एफ़टी से कहा, "ग्लेशियर के लटकते हुए अंतिम हिस्से का निचला हिस्सा टूटकर क़रीब 1,300 मीटर नीचे घाटी में गिरता हुआ दिखाई देता है."
ज्यूरिख यूनिवर्सिटी में आपदा जोखिम पर शोध करने वाले साइमन एलन ने एफ़टी से कहा कि सैटेलाइट तस्वीरों से स्पष्ट है कि "चट्टान और बर्फ़ का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरा" और यह "बर्फ़-चट्टान के हिमस्खलन" के रूप में नीचे आया, जिससे विनाशकारी बाढ़ आई.
एलन ने कहा कि ग्लेशियर एंड पर्माफ्रॉस्ट हैज़र्ड्स इन माउंटेन्स वर्किंग ग्रुप के शोधकर्ताओं ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि यह गिरावट कितनी बड़ी थी. लेकिन भूकंपीय संकेतों के आधार पर उन्होंने अनुमान लगाया कि 5 से 10 करोड़ क्यूबिक मीटर मलबा ज़मीन से टकराया होगा.
उन्होंने कहा, "यह बहुत विशाल है. कम से कम इस क्षेत्र में हमने इस तरह की इससे बड़ी घटना नहीं देखी है."
अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे ने शुरुआत में नेपाल और चीन की सीमा के पास के इलाक़े में 4.4 तीव्रता के भूकंप की सूचना दी थी. लेकिन बाद में इसे 5.2 तीव्रता के भूस्खलन के रूप में संशोधित किया गया. एजेंसी ने कहा कि भूकंपीय ऊर्जा "ग्लेशियर के ढहने और मलबे के बहाव से पैदा हुई थी."
तिब्बत में चीन क्या कर रहा है?

इमेज स्रोत, Getty Images
चीन में यारलुंग त्सांगपो नदी पर दुनिया की सबसे बड़ी पनबिजली परियोजना बनाने की योजना एक्सपर्ट सवाल उठाते रहे हैं.
यह नदी भारत में प्रवेश करने के बाद ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है.
चीन इस मेगा-डैम के पर्यावरणीय प्रभाव या नीचे की ओर रहने वाले लोगों के लिए पानी की आपूर्ति पर संभावित असर को लेकर जताई गई चिंताओं को खारिज करते रहे हैं.
विशेषज्ञों और अधिकारियों ने चिंता जताई है कि नया बांध चीन को यारलुंग त्सांगपो नदी को नियंत्रित करने या उसका रुख मोड़ने की ताक़त दे सकता है.
ऑस्ट्रेलिया स्थित थिंक टैंक लोवी इंस्टीट्यूट ने 2020 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा था कि "तिब्बती पठार में इन नदियों पर नियंत्रण प्रभावी रूप से चीन को भारत की अर्थव्यवस्था पर एक तरह से नियंत्रण देता है."
पिछले साल समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने चिंता व्यक्त की थी कि बांध पूरा होने के बाद सियांग और ब्रह्मपुत्र नदियां "काफी हद तक सूख सकती हैं."
इस परियोजना से भारी मात्रा में मलबा निकलने की आशंका है और इसके लिए जटिल भूगर्भीय संरचनाओं के बीच ड्रिलिंग करनी होगी.
स्टॉकहोम सेंटर फॉर साउथ एशियन एंड इंडो-पैसिफिक अफेयर्स के प्रमुख जगन्नाथ पांडा ने एफटी से कहा, "मानव निर्मित बुनियादी ढांचे का विकास भूकंपीय जोखिमों में भी योगदान दे सकता है."
पांडा ने कहा कि मेगा-डैम परियोजना भूकंपीय जोखिमों को बढ़ाने की क्षमता रखता है और इससे भूस्खलन की संभावना भी बढ़ सकती है.
पांडा ने कहा, "यह निश्चित रूप से ऐसी परियोजना है, जिसकी चीन को बहुत सावधानी से समीक्षा करनी चाहिए और हिमालयी देशों, ख़ास तौर पर भारत, नेपाल और अन्य देशों के साथ कहीं अधिक पारदर्शिता, जानकारी साझा करने और संवाद की ज़रूरत है. उम्मीद है कि यह आपदा चीन में भारत और अन्य निचले हिस्से के नदी तटीय देशों के साथ इन मुद्दों पर अधिक खुले तौर पर चर्चा करने के महत्व को लेकर ज़रूरी जागरूकता पैदा करेगी."
चीन की लक्ष्य क्या है?

चेलानी मानते हैं कि मानवीय गतिविधियों से हिमालय और ख़तरनाक हो रहा है.
उन्होंने निक्केई एशिया में लिखा है, ''पानी का रुख़ मोड़ने वाले बांध, तटबंध और नदी या जलधारा में ऊपर की ओर किए गए अन्य बदलावों ने संकरी हिमालयी घाटियों में स्थानीय स्तर पर रुकावट पैदा की.''
''जब हिमस्खलन से आई तेज़ लहर इन रुकावटों से टकराई, तो अस्थायी रूप से पानी जमा होने और उसके ऊपर से बहने के कारण संभवतः बाढ़ की दूसरी लहरें पैदा हुईं, जिससे नीचे की ओर नदी का जलस्तर तेज़ी से बढ़ा."
हिमालयी क्षेत्र में भूकंप का ख़तरा सबसे ज़्यादा है. भारतीय और यूरेशियाई महाद्वीपीय प्लेटों के टकराने के कारण यह क्षेत्र अब भी भारी टेक्टोनिक दबाव में है, जिससे इसका भू-भाग बेहद अस्थिर बना हुआ है.
चीन की सरकार तिब्बत और उसकी हिमालयी सीमा से लगे इलाक़ों को अपनी राष्ट्रीय और ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम मानती है.
अमेरिकी प्रसारक सीएनएन ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''चीन का लक्ष्य इस क्षेत्र को ऊंचाई वाले हरित ऊर्जा के एक बड़े केंद्र में बदलना है. इसमें 168 अरब डॉलर की लागत वाला एक विशाल बांध भी शामिल है, जिसका निर्माण फ़िलहाल चल रहा है और जो मानव इंजीनियरिंग की अब तक की उपलब्धियों की सीमाओं को चुनौती दे सकता है.''
वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक स्टिम्सन सेंटर के एनर्जी, वॉटर एंड सस्टेनेबिलिटी प्रोग्राम के वरिष्ठ फेलो ऑस्टिन लॉर्ड ने सीएनएन से कहा, "हम हर पांच से 10 साल में '100 साल वाली बाढ़' देख रहे हैं. जलवायु से जुड़े जोखिम उस क्षमता से कहीं ज़्यादा तेज़ी से बदल रहे हैं, जिसके ज़रिए हम सुरक्षा की अपनी सीमाओं को बदल सकते हैं."
उन्होंने कहा, "इतनी सारी अनिश्चितताओं के बीच अगर हम इन मुद्दों पर मिलकर काम करना शुरू नहीं करते हैं, तो कोई प्रगति नहीं होगी और अगली बार फिर हम इससे बुरी तरह प्रभावित होंगे."
हाल के वर्षों में बांध निर्माण की तकनीक में चीन की प्रगति, स्वच्छ ऊर्जा के ज़रिए बिजली व्यवस्था को बदलने और कोयले से दूरी बनाने की होड़, साथ ही चीन-भारत के बीच ऊंचाई वाले इलाक़ों में जारी सीमा विवाद ने इस क्षेत्र में बदलाव को गति दी है.
ऑस्ट्रेलिया की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी में तिब्बत की पर्यावरण, संस्कृति और जलवायु की इतिहासकार रूथ गैम्बल ने सीएनएन से कहा, "पहाड़ों को लेकर नज़रिया बदल गया है. पहले इन्हें पिछड़ा हुआ इलाक़ा या संभावित जातीय अस्थिरता वाली जगह के रूप में देखा जाता था. अब इन्हें एक संसाधन के रूप में देखा जा रहा है."
चीन को अपने यारलुंग त्सांगपो मेगा-डैम परियोजना के बारे में भारत के साथ डेटा और डिजाइन संबंधी जानकारी साझा नहीं करने को लेकर पहले भी आलोचना का सामना करना पड़ा है.
यह भी व्यापक रूप से माना जाता है कि 2017 में सीमा पर गतिरोध के बाद कुछ समय के लिए चीन ने सीमा-पार बहने वाली नदियों के जल प्रवाह संबंधी आंकड़े साझा करना रोक दिया था. बीजिंग डेटा साझा करने में पारदर्शिता को लेकर उठी चिंताओं का बचाव करता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.



















