बारीक समुद्री रेत
90 μm (माइक्रोमीटर)
हर साल सर्दियों के शुरू होते ही दिल्ली एक घने धुएं और धुंध की चादर में लिपट जाती है. यहां एयर क्वालिटी ख़तरनाक स्तर तक पहुंच जाती है.
पिछले साल, स्विट्ज़रलैंड के एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग ग्रुप आईक्यूएयर ने दिल्ली को दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी बताया था. शहर में सालाना औसत कंसंट्रेशन ऑफ़ पार्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5) 108.3 µg/m³ दर्ज की गई. यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के 5 µg/m³ के दिशा-निर्देशों से 21 गुना अधिक थी.
एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) आसपास की हवा में मौजूद प्रदूषक तत्वों के स्तर को मापता है. यह सूचकांक 0 से 500 के बीच होता है, लेकिन प्रदूषण अत्यधिक होने पर यह 500 से भी ऊपर जा सकता है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो की एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट (ईपीआईसी) की अगस्त 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में उच्च स्तर पर प्रदूषक कणों की मौजूदगी एक व्यक्ति की औसत आयु लगभग 8.2 वर्ष तक कम कर सकती है.
प्रदूषण की यह समस्या सिर्फ़ दिल्ली तक सीमित नहीं है. ईपीआईसी के अनुसार, दक्षिण एशिया दुनिया का सबसे प्रदूषित क्षेत्र है. दक्षिण एशिया के दूसरे इलाके़ भी वायु प्रदूषण से त्रस्त हैं. आईक्यूएयर के आंकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश दुनिया का दूसरा सबसे प्रदूषित देश है, जहां ढाका में पीएम 2.5 का स्तर डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देश से 15 गुना अधिक पाया गया, जबकि पाकिस्तान के लाहौर में यह स्तर लगभग 20 गुना अधिक दर्ज किया गया.
बीबीसी ने पिछले 11 वर्षों के दैनिक औसत पीएम 2.5 के स्तर का विश्लेषण किया. इस विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि सर्दियों के दौरान वायु गुणवत्ता सबसे अधिक खराब होती है, लेकिन बाकी समय भी स्थिति कुछ बेहतर नहीं है. दिल्ली के लोग लगभग पूरे साल ही प्रदूषित और अस्वस्थ हवा में सांस लेते हैं.
यहां प्रत्येक पंक्ति दिल्ली में किसी एक दिन की एक्यूआई कैटेगरी बताती है. अगर एक्यूआई 0 से 50 के बीच हो तो इसे अच्छा माना जाता है. इसे हरे रंग में दिखाया गया है, जबकि 150 से अधिक को हानिकारक माना जाता है और इसे लाल रंग के अलग-अलग शेड्स में दिखाया गया है.
पिछले दस वर्षों में दिल्ली में मुश्किल से कुछ ही दिन ऐसे रहे, जब वायु गुणवत्ता ‘अच्छी’ श्रेणी में यानी AQI 50 से नीचे रही.
इसके विपरीत, लगभग 200 दिन यानी साल के करीब 60% दिनों में दिल्ली की हवा की गुणवत्ता हानिकारक कैटेगरी में या उससे भी ख़राब कैटगरी में रही. पिछले दशक में 70 से अधिक दिनों में एक्यूआई 500 को पार कर गया, जो आधिकारिक इंडेक्स की अधिकतम सीमा से भी ऊपर है.

बारीक समुद्री रेत
90 μm (माइक्रोमीटर)

मानव बाल
70μm

नमक का कण
60 μm

लाल रक्त कोशिका
7-8μm

पीएम 10
<10 μm

पीएम 2.5
<2.5 μm
दिल्ली की तरह, ढाका और लाहौर के लोग भी साल में 200 से अधिक दिन हानिकारक हवा में सांस लेने को मजबूर हैं.
दक्षिण एशिया के शहरों दिल्ली, ढाका, लाहौर, कोलंबो और काठमांडू की तुलना बीजिंग (जिसे 2014 में “मनुष्य के रहने लायक जगह नहीं” कहा गया था) से करें तो ये अंतर साफ दिखता है.
बीजिंग और कोलंबो, दोनों ही शहरों में एक साल में 200 से अधिक दिन ऐसे होते हैं जब एक्यूआई स्तर अच्छा या मध्यम दर्ज किया जाता है.
पार्टिकुलेट मैटर हवा में पाए जाने वाले ठोस कणों और तरल बूंदों का मिश्रण होता है-जैसे कालिख, धुआं और धूल.
पीएम 2.5 या सूक्ष्म पार्टिकुलेट मैटर का आकार लगभग 2.5 माइक्रोमीटर चौड़ा होता है, जो मानव बाल की मोटाई से करीब 28 गुना पतला है.
यहां देखा जा सकता है कि इसका आकार अन्य पदार्थों की तुलना में कितना छोटा है.
प्रदूषण के स्रोतों और उनमें विभिन्न वजहों के योगदान को समझने के लिए कई अध्ययन किए गए हैं. परिवहन, उद्योग, पावर प्लांट, सड़क की धूल और निर्माण-ये पांच प्रमुख कारण हैं जो दिल्ली के प्रदूषण में सबसे बड़ा योगदान देते हैं.
सस्टेनेबिलिटी जर्नल में प्रकाशित 2023 के एक शोध पत्र में बताया गया कि दिल्ली पर सबसे अधिक अध्ययन होने के बावजूद, अब भी इस बात पर सीमित सहमति है कि इनमें से कौन प्रदूषण में कितना योगदान देता है.
दिल्ली स्थित थिंक टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) द्वारा 2019 में किए गए एक अध्ययन में, 2010 से 2018 के बीच किए गए पाँच अध्ययनों की समीक्षा की गई और उनमें बताए गए प्रदूषण के योगदान की एक रेंज पेश की गई.

अध्ययन में पाया गया कि पीएम 2.5 का सबसे बड़ा स्रोत ट्रांसपोर्ट था, जिसकी हिस्सेदारी 17.9% से 39.2% के बीच रही.

औद्योगिक सेक्टर भी प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण कारण है और दिल्ली के प्रदूषण में इसकी हिस्सेदारी 2.3% से 28% के बीच है.

सीईईडब्ल्यू के अनुसार, दिल्ली के कंस्ट्रक्शन (निर्माण) सेक्टर का पीएम 2.5 प्रदूषण में योगदान 2.2% से 8.4% के बीच रहा.

सस्टेनेबिलिटी जर्नल में प्रकाशित लेख के अनुसार, प्रदूषण के कारणों में पराली पर भले ही सबसे ज़्यादा चर्चा हो लेकिन पराली जलाने का दिल्ली के प्रदूषण में योगदान तीन प्रतिशत से भी कम है.

ये सूक्ष्म कण कई बीमारियों से जुड़े हैं, जैसे फेफड़ों का कैंसर, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़ (सीओपीडी), स्ट्रोक, टाइप 2 डायबिटीज़, और न्यूमोनिया.

न्यूयॉर्क स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, पीएम 2.5 कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि ये फेफड़ों के अंदर गहराई तक पहुंच सकते हैं, अल्वियोलर वाल्स को नुकसान पहुंचाते हैं और फेफड़ों के फंक्शन को कम कर देते हैं.

एक बार पीएम 2.5 कण ब्लडस्ट्रीम में प्रवेश कर जाए, तो ये ब्लड प्रेशर बढ़ा सकते हैं या ऐसे क्लॉट बन सकते हैं जो हृदय और मस्तिष्क में रक्त के प्रवाह को रोक दें, और समय के साथ स्ट्रोक का कारण बन सकते हैं.

नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, पीएम 2.5 के संपर्क से मस्तिष्क के एक तरह से बूढ़ा होने की प्रक्रिया तेज हो सकती है और इसके सफेद तंतु (व्हाइट मैटर) को नुकसान पहुंच सकता है.
स्टेट ऑफ़ ग्लोबल एयर 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, पीएम 2.5 और घरेलू स्रोतों से होने वाले वायु प्रदूषण के कारण दुनिया भर में 7.8 मिलियन (78 लाख) मौतें हुईं.