योग को मोदी जैसे सेल्समैन की ज़रूरत है?

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- Author, शिव विश्वनाथन
- पदनाम, समाजशास्त्री
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़बरों में लगातार बने हुए हैं. सच तो ये है कि अगर मीडिया का बस चले तो सिर्फ़ मोदी ही ख़बरों में रहें. वो जो कुछ भी कहते हैं उसकी नुक्ताचीनी शुरू हो जाती है.
यही वजह है कि भारत सरकार का कामकाज मापने का एकमात्र पैमाना ये बन गया है कि मोदी क्या करते हैं. मोदी इस समय भारत के सबसे प्रिय धारावाहिक हैं.
एक घाघ राजनेता होने के कारण मोदी अनुष्ठानों, स्मृतियों और वर्षगांठों का महत्व बखूबी समझते हैं. वो अपनी शक्ति याद दिलाने वाले चिह्न तैयार करते हैं.
संयुक्त राष्ट्र में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित करवाकर मोदी ने एक और प्रतीकात्मक विजय हासिल कर ली है.
'संस्कृति का निर्यात'

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हो सकता है कि मोदी का 'मेक इन इंडिया' का इरादा हो लेकिन वो भारतीय सभ्यता और संस्कृति का पूरी दुनिया में निर्यात भी करना चाहते हैं.
जब हम न्यूक्लियर रिएक्टर और फ्रांसीसी लड़ाकू विमानों जैसी तकनीकों का आयात कर रहे हैं तो मोदी दुनिया को योग का निर्यात करने के लिए बेचैन हैं.
योग को बढ़ावा देने का मोदी का प्रयास एक स्तर पर बेकार प्रतीत होता है.
बीकेएस अयंगर और बिहार योग विश्वविद्यालय के बाद योग के सेल्समैन के रूप में मोदी ग़ैर-ज़रूरी लगते हैं.
लेकिन इस राजनीति में एक गहरी बात छिपी है जिसें हमें ज़रूर समझना चाहिए.
'भारतीय जीवन का अंग'

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एक आध्यात्मिक क्रिया के रूप में योग सैकड़ों वर्षों से बरक़रार है.
योग भारतीय जीवन का एक ज़रूरी अंग है. यह उस दावे जैसा नहीं है कि जिसके अनुसार गणेश को हाथी का सिर लगाकर भारत ने सबसे पहले प्लास्टिक सर्जरी की थी.
'भारतीय बनो, भारतीय चीज़ें ख़रीदो' कहने के बजाय मोदी कह रहे हैं 'भारतीय बनो, भारतीय तरीक़े से जियो.' इस तरह वो ख़ुद को एक 'लाइफ़स्टाइल डॉन' के रूप में पेश कर रहे हैं.
दरअसल वो पहले प्रधानमंत्री हैं जो लाइफ़स्टाइल को अपने ब्रांड से जोड़ रहा है. वे कड़ा और लंबा परिश्रम करते हैं, योग करते हैं और छुट्टियाँ नहीं लेते.
कुल मिलाकर वो एक तपस्वी जैसा जीवन जीते हैं. उनकी ये जीवनशैली लाखों महत्वाकांक्षी लोगों के लिए एक रोल मॉडल प्रस्तुत करती है.
एक स्तर पर ये सब सही नज़र आता है. दरअसल, दिल्ली के पुलिसवालों को देखते हुए ये एक फ़ायदेमंद सुधार लगता है. रिटायर लोग योग और अध्यात्म पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं.
'भारत की अपनी चीज़'

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योग एक ऐसी चीज़ है जिसे भारत अपना कह सकता है. उसे इसका पेटेंट कराने की भी फ़िक्र नहीं करनी है. फिर भी मोदी ने योग को स्वच्छ भारत जैसा तकनीकी मिशन बना दिया है.
इससे सड़कों के बजाय भारतीय दूतावासों में योग कक्षाओं की भरमार लग जाएगी जिसमें शामिल होने वाले आईडीवाई (अंतरराष्ट्रीय योग दिवस) की टी-शर्ट पहने होंगे.
हममें से ज़्यादातर लोग हाफ़ मैराथन नहीं दौड़ सकते लेकिन 30 मिनट योग करना ज़्यादा आकर्षक और संभव लगता है.
हैमबर्गर और नूडल्स खाकर मोटे होते भारतीय मध्यवर्ग के लिए यह स्वस्थ रहने का एक ज़ोरदार तरीक़ा लगता है.
एक घंटे रोज़ योग करोगे तो डॉक्टर से बचे रहोगे. यानी ये सेब से भी अच्छा है. फिर भी इसे लेकर लोगों को एतराज़ है.
योग एक तकनीक

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मोदी योग को सांस्कृतिक रिवाज के बजाय तकनीकी ट्रांसफ़र की तरह लेते हैं.
वो योग को उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, आध्यात्मिक भावना और प्रकृति दर्शन से अलग करके बस तकनीकी श्रेणी के रूप में पेश कर रहे हैं.
मोदी का योग का विचार कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे कोई जिम एक्सपर्ट या फ़िज़ियोथेरेपिस्ट के पास जाता है. ये कसरत है जिसमें साधना नहीं है.
इसे लेकर एक गहरी आपत्ति ये भी है कि ये समाज के हिंदूकरण की एक कोशिश है.
कुछ अमरीकी स्कूलों में इसी आधार पर योग को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने का विरोध किया गया था लेकिन वहाँ की अदालत ने इसे एक धर्मनिरपेक्ष व्यायाम माना जिसके मूल में हिंदू धर्म है.
चीज़ों के मूल के आधार पर उन्हें किसी ख़ास पक्ष या मूल्य के समर्थक के रूप में नहीं देखा जा सकता. धार्मिक चोले से आज़ाद योग करना कोई रहस्यवादी साधना नहीं है.
'ब्रांड इंडिया का अंग'

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मोदी पर मुसलमानों ने सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया था.
सूर्य नमस्कार को मुस्लिम विरोधी आसन के रूप में देखा गया लेकिन सरकार ने इसे तत्काल हटा दिया या स्वैच्छिक बना दिया.
कुछ लोगों को इस बात पर अचरज हो सकता है कि वैलेंटाइन डे को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की तरह बहुलता का सच्चा प्रतीक क्यों नहीं बनाया जा सकता.
ये साफ़ है कि मोदी ख़ुद को और भारत को एक हाइब्रिड ब्रांड के रूप में बेच रहे हैं. योग ब्रांड इंडिया का एक अंग है और ये उनकी दुनिया को सौगात है.
उन्हें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि पंचतंत्र की तरह योग भारत के महानतम उपहारों में से एक है.
भाजपा और मोदी के लिए इतिहास वहीं से शुरू होता है, जहाँ से वो सामने आते हैं.
'अति-राजनीतिकरण'

हमें इस मामले में कुछ एहतियात बरतनी होंगी. योग को चुनौती देने को राष्ट्रद्रोह की तरह नहीं देखा जाना चाहिए.
अगर योग एक उपहार है तो हमें उपहार की परंपरा को स्वीकार करते हुए इसे अपने ही लोगों पर थोपना नहीं चाहिए.
भाजपा जैसी पार्टियां या ओवैसी जैसे मुसलमान योग का अति-राजनीतिकरण करें, ये भारत के हित में नहीं होगा.
जिस चीज़ से स्वास्थ्य लाभ, शांति और राहत मिलती है उसे दर्द या कड़वाहट पैदा करने की वजह नहीं बनाना चाहिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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