लोगों को गुदगुदा रहे हैं तीखे राजनीतिक व्यंग्य

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- Author, जय मजूमदार
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
- प्रकाशित
इंटरनेट और टीवी पर लगातार आ रहे राजनीतिक व्यंग्य-बाणों ने यह तय कर दिया है कि हर राजनेता को आईना दिखाया जा रहा है.
नेता लोग आम तौर पर खुद का मज़ाक उड़ाया जाना पसंद तो नहीं ही करते हैं लेकिन बड़ी संख्या में आम लोग इन व्यंग्यबाणों का मज़ा लेकर हंस रहे हैं इस बार के आम चुनावों में.
नए व्यंग्यकारों की पौध ने सुनिश्चित किया है कि तीखे चुनाव प्रचार के बीच राजनीतिक हास्यव्यंग्य का भी बढ़िया डोज़ लोगों को मिल रहा है.
यूं तो व्यंग्य की विधा भारत में नई नई है. अख़बारों में कार्टून की समृद्ध परंपरा रही है लेकिन राजनीतिक व्यंग्यों की चाहत और स्वीकार्यता आम लोगों में पहले से ज़रुर बढ़ गई है.
हास्य-व्यंग्य
अंग्रेजी टीवी न्यूज चैनल सीएनएन-आईबीए के हास्य व्यंग्य कार्यक्रम का नाम '<link type="page"><caption> दी वीक दैट वाज़नॉट</caption><url href="http://ibnlive.in.com/shows/The-Week-That-Wasnt/461372.html" platform="highweb"/></link>' है. इसे साइरस ब्रोचा पेश करते हैं. यह 2009 में हुए आम चुनाव से पहले से मशहूर है. वहीं 2004 के आम चुनावों में स्टार न्यूज पर अभिनेता शेखर सुमन की ओर से पेश किया जाने वाला '<link type="page"><caption> पोल खोल</caption><url href="https://www.youtube.com/watch?v=_jsZ0UsWU1w" platform="highweb"/></link>' भी मशहूर हुआ था.
ब्रोचा कहते हैं, ''हमारा शो भारत के लोगों में हास्य की भूख बढ़ाता है.''
वो बताते हैं, ''हमने बंद दरवाजों को खोलने में मदद की और आज बहुत अधिक हास्य उपलब्ध है, ख़ासकर इंटरनेट पर.''

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भारत की पहली समसामयिक और राजनीतिक व्यंग आधारित वेबसाइट '<link type="page"><caption> फेकिंग न्यूज</caption><url href="http://www.fakingnews.firstpost.com/" platform="highweb"/></link>' 2008 में उभरी थी. इसके बाद 2001 में ' <link type="page"><caption> दी अनरीयल टाइम्स</caption><url href="http://www.theunrealtimes.com/" platform="highweb"/></link>' आई.
उसके बाद शुरू हुए <link type="page"><caption> एआईबी</caption><url href="http://www.youtube.com/user/allindiabakchod" platform="highweb"/></link> और दी वायरल फ़ीवर (<link type="page"><caption> टीवीएफ़</caption><url href="http://www.theviralfever.com/" platform="highweb"/></link>) बेहद मशहूर हुए. इस बीच हर समाचार चैनल ने नेताओं पर व्यंग्य करने के लिए साप्ताहिक और यहां तक कि दैनिक शो भी तैयार किए.
इन कार्यक्रमों पर दर्शकों की प्रतिक्रियाएं जबरदस्त हैं.
हिट्स की भरमार
एआईबी के '<link type="page"><caption> नायक-2</caption><url href="https://www.youtube.com/watch?v=_RENcw7a140" platform="highweb"/></link>' को यूट्यूब पर केवल दो महीने में ही 30 लाख से अधिक हिट्स मिले.
इसमें टीवी धारावाहिकों और बॉलीवुड फ़िल्मों के संस्कारी पिता के रूप में मशहूर अभिनेता आलोकनाथ हाथ में झाड़ू लिए, गले में मफलर लगाए और आम आदमी के नेता और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जैसा व्यक्तित्व बनाने में मदद करते हैं.
केजरीवाल टीवीएफ़ के <link type="page"><caption> क्यूटीयापा</caption><url href="https://www.youtube.com/watch?v=enyCO7HPv18" platform="highweb"/></link> के पसंदीदा लक्ष्य हैं. ऐसे ही एक हास्य-व्यंग्य को फ़रवरी से अब तक तीन लाख से अधिक लोग यूट्यूब पर देख चुके हैं.
इसमें दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री को बॉलीवुड में ईमानदारी के लिए लड़ते हुए दिखाया गया है. उनकी शिकायत है कि अंगदान पर आधारित फ़िल्म 'शिप ऑफ़ थीसियस' में एक भी नाव नहीं दिखाई गई है.

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अपने एक ताज़ा एपिसोड में <link type="page"><caption> साइरस ब्रोचा</caption><url href="https://www.youtube.com/watch?v=vjRGVfkJdSE" platform="highweb"/></link> ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के पहले टीवी इंटरव्यू का मजाक उड़ाया. इस इंटरव्यू में उन्होंने आरटीआई (सूचना के अधिकार ), व्यवस्था परिवर्तन और महिला सशक्तिकरण का कई बार उल्लेख किया था.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलते किरदार वाले अनरीयल टाइम्स के <link type="page"><caption> फ़ेसबुक लुकबुक</caption><url href="http://www.youtube.com/watch?v=IGJ6If1F3IA" platform="highweb"/></link> वाले वीडियो को यूट्यूब पर दो महीने से भी कम समय में क़रीब पांच लाख लोग देख चुके हैं.
इसके अलावा राहुल गांधी और उनके सलाहकार दिग्विजय सिंह की भूमिकाओं वाली फ़िल्म '<link type="page"><caption> राहुल वन- दी नेक्सट लेवल : 2014'</caption><url href="http://www.youtube.com/watch?v=kqeWEqO2AKU" platform="highweb"/></link> ने भी लोगों का बहुत अधिक ध्यान खींचा.
यूट्यूब पर राजनीतिक कार्टून सीरीज '<link type="page"><caption> ढोल की पोल</caption><url href="http://www.youtube.com/user/dholkipol/about" platform="highweb"/></link>' में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी पर आधारित फ़िल्म को लोगों ने बहुत पसंद किया. ये फिल्म चार्ली चैपलीन की 'दी ग्रेट डिक्टेटर' आधारित थी.
विचारमय
दुर्भाग्य से इंटरनेट पर मौज़ूद मोदी के अधिकांश व्यंग्यों में किसी को श्रेय नहीं दिया गया है. जुलाई 2013 में मज़ाक उड़ाने को अपना एजेंडा बताने वाली वेबसाइट बंद कर दी गई. बाद में वह फिर सामने आई.
इंडियन एक्सप्रेस समूह के मुख्य कार्टूनिस्ट ईपी उन्नी को कार्टूनिस्टों को गिरफ़्तार करने वाले और पाठ्य पुस्तक से कार्टून हटाने वाले देश में अपने साथियों की निर्भीकता पर गर्व है.
वो कहते हैं, ''यहां हंसने के लिए कोई क़ानून नहीं है. अगर कोई नुक़सान होता है तो हम दोनों का होगा. हम राजनीतिज्ञों से परिपक्वता की उम्मीद करते हैं.''
ब्रोचा कहते हैं कि क्षेत्रीय भाषाओं की व्यापक पहुँच संवेदनाओं के विभिन्न स्तरों को छूती है. जब वो हिन्दी में शो करते हैं तो इन बातों को अपने दिमाग में रखते हैं.

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अनरीयल टाइम्स के सीएस कृष्णा कहते हैं कि लोगों को हंसाने के लिए अपमान के एक तड़गे खुराक की ज़रूरत है.
लेकिन एक सवाल ये भी है कि क्या वो राजनीतिज्ञों का मजाक बनाकर राजनेताओं को महत्वहीन बना रहे हैं.
वास्तविकता से प्रेरित
टीवीएफ़ के अरुनाभ कुमार दावा करते हैं कि कला के वास्तविकता से प्रेरित होने की परंपरा है.
कृष्णा कहते हैं कि इसका उद्देश्य दर्शकों को हमारी संस्थाओं और राजनीति से विमुख करना नहीं होना चाहिए. दूसरी ओर जोशी दावा करते हैं कि उपहास करने वाले पॉडकास्ट के जरिए कई बार उसका स्वर स्वार्थी हो जाता है, हालांकि वो लोगों से ये नहीं कहते हैं कि वो लोकतांत्रिक संस्थाओं से विमुख हो जाएं.
टीवीएफ़ का नए यूट्यूब चैनल का नाम रिसाइकिल बिन है. कुमार बताते हैं कि उन्होंने युवाओं को राजनीतिक रूप से जागरूक बनाने के लिए काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म के साथ समझौता किया है.
जोशी कहते हैं, ''बहुत अधिक संख्या में युवा अख़बार नहीं पढ़ते हैं और न टीवी पर समाचार देखते हैं. कई बार एक मजेदार ट्विट या एक पैरोडी वीडियो ही उनकी राजनीतिक जानकारी का प्राथमिक स्रोत होता है. ''
यही वजह है कि ब्रोचा अपने कार्यक्रम को बहुत अधिक गंभीरता से लेते हैं.
वो कहते हैं, 'जोनाथन स्विफ्ट के असली व्यंग को छोड़ दें. हम कॉमेडी बनाते हैं, जो लोगों का ध्यान खींचता है. हो सकता है कि यह राजनीतिक वचनवद्धता का सबसे निचला रूप हो. लेकिन इससे हमें एक ऐसा वर्ग मिला है, जो बहुत जल्द राजनीतिक बहसों में हिस्सा लेता है.''
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