वाराणसी गंगा इफ़्तार केस: आरोप, धाराएँ और क़ानूनी सवालों में उलझा मामला

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 15 मिनट
वाराणसी के अस्सी घाट पर गंगा हर रोज़ की तरह मद्धम रफ़्तार में बह रही है. शाम के पाँच बजे का वक़्त है. घाट पर बिखरी बालू अब थोड़ी कम गरम है.
जैसे-जैसे सूरज ढलता जा रहा है, वैसे-वैसे लोगों की संख्या बढ़ रही है. यहाँ दुकान लगाने वाले जल्दी-जल्दी अपनी रेहड़ी लगा रहे हैं. पुजारी शाम की आरती की तैयारी कर रहे हैं. नाविक सवारी के हिसाब से हर सैलानी को किराया बता रहे हैं.
वाराणसी में गंगा किनारे की हर शाम तकरीबन यही माहौल होता है और ऐसी ही मार्च की एक शाम 14 मुसलमान लड़के खाने-पीने का सामान लिए गंगा के नमो घाट में एक नाव पर सवार हुए.
यह रमज़ान का समय था. इन लड़कों ने गंगा में नाव पर ही इफ़्तार की. इस इफ़्तार के कुछ वीडियो इन्हीं लड़कों ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किए.
इसमें ख़जूर, शरबत, फल और बिरयानी जैसा कुछ दिख रहा था. अगले कुछ दिनों में यह इफ़्तार नेशनल हेडलाइन बन गई.
ज़्यादातर न्यूज़ हेडलाइन में बताया गया कि 'मुसलमान लड़कों ने गंगा में इफ़्तार करते हुए बिरयानी खाई और चिकन की हड्डियाँ नदी में फेंक दीं.'
पुलिस ने शिकायत पर मामला दर्ज किया. अभियुक्तों की अदालत में पेशी हुई और फिर उन्हें जेल भेजा गया.
अब क़रीब 60 दिन जेल में बंद रहने के बाद इन 14 मुसलमान लड़कों को बीते हफ़्ते ही ज़मानत मिली है.
लेकिन इस केस को क़रीब से देखने और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सभी क़ानूनी दस्तावेज़ों को पढ़ने-समझने के बाद लगता है कि जिस तरह इस केस के बारे में चर्चा हुई, यह मामला उससे कहीं ज़्यादा उलझा हुआ है.
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फ़्लैश बैक: मार्च 2026

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इस केस को परत दर परत समझने के लिए हम आपको दो महीने पहले यानी मार्च 2026 में लिए चलते हैं.
16 मार्च की रात साढ़े नौ बजे वाराणसी के कोतवाली थाने में एक एफ़आईआर दर्ज हुई. इसकी संख्या है 65/2026 .
इस एफ़आईआर का आधार थी एक शिकायत, जो बनारस के बीजेपी युवा मोर्चा के अध्यक्ष रजत जायसवाल ने की थी.
शिकायत में कहा गया था, "मुस्लिम समुदाय द्वारा माँ गंगा की पावन धारा में नाव पर बैठकर इफ़्तार के समय चिकन बिरयानी खाना और उसके अवशेष माँ गंगा में फेंकना दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय कृत्य है. इससे हम सनातन अनुयायियों की भावनाओं को गहरा आघात पहुँचा है. इस कृत्य के माध्यम से मुस्लिम समुदाय के यह नौजवान जानबूझकर जिहादी मानसिकता को बढ़ावा दे रहे हैं."
इस एफ़आईआर में कोतवाली थाने की पुलिस ने सात धाराओं में केस दर्ज किया. इसमें भारतीय न्याय संहिता यानी बीएनएस की छह धाराएँ थीं.
ये हैं- बीएनस 298, 299 (धार्मिक भावनाओं को आहत करना), 196 (1) (बी) (सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश), बीएनएस 270 (सार्वजनिक उपद्रव), 279 (सार्वजनिक झरने या जलाशय के पानी को गंदा करना) और 223-बी (लोक सेवक की आज्ञा की अवहेलना करना).
इसके साथ ही पुलिस ने जल अधिनियम 1974 की धारा 24 के तहत भी केस दर्ज किया. यह धारा कहती है कि कोई भी व्यक्ति जानबूझकर किसी भी धारा में कोई विषैला या हानिकारक पदार्थ नहीं डालेगा. इन सभी आरोपों की सज़ा सात साल से कम है.
साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट के सतिंदर अंतिल बनाम सीबीआई मामले और 2014 के अर्नेस कुमार बनाम बिहार सरकार के फ़ैसले के मुताबिक़ ऐसे अपराध जिनकी सज़ा सात साल से कम है, ऐसे मामलों में पुलिस को तुरंत गिरफ़्तारी न करके अभियुक्त को हाज़िर होने का नोटिस देने का निर्देश है, ताकि उनसे पूछताछ की जाए.

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सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़ ऐसे केस में गिरफ़्तारी तभी होनी चाहिए, जब पुलिस रिकॉर्ड (लिखित) में कारण बताए कि गिरफ़्तारी करना क्यों ज़रूरी है.
मसलन अगर अभियुक्त गिरफ़्तार नहीं हुआ, तो सबूत मिटाएगा. गवाहों को धमकाएगा या अपराध दोहरा सकता है.
ऐसे ज़्यादातर केस में बीएनएस की धारा 480 के तहत मजिस्ट्रेट की कोर्ट के पास अधिकार होता है कि वह ज़मानत की सुनवाई करे.
19 मार्च 2026 यानी गिरफ़्तारी के दो दिन बाद कोतवाली पुलिस ने मजिस्ट्रेट की अदालत में इन 14 अभियुक्तों की न्यायिक हिरासत की अर्ज़ी दी और सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने बताया कि इस अर्ज़ी में कोतवाली पुलिस ने बीएनएस की एक नई धारा 308(5) जोड़ी है.
बीएनएस की धारा 308 (5) डरा-धमका कर संपत्ति या पैसे की जबरन वसूली की धारा है. यह ग़ैर ज़मानती है. इसमें बिना वारंट के गिरफ़्तारी होती है. सबसे अहम बात इस सेक्शन में सज़ा 10 साल है.
पुलिस ने कोर्ट को बताया कि अनिल साहनी और रंजन साहनी नाम के नाविकों की नाव पर इफ़्तार का आयोजन हुआ था. गिरफ़्तारी के एक दिन बाद 18 मार्च 2026 को पुलिस ने नाविकों के बयान लिए.
पुलिस के मुताबिक़ नाविकों के बयान के आधार पर बीएनएस की धारा 308 (5) जोड़ी गई है.
इस सुनवाई के बाद मजिस्ट्रेट अमित कुमार यादव की कोर्ट ने ज़मानत ख़ारिज करते हुए इन सभी 14 अभियुक्तों को एक अप्रैल, 2026 तक की न्यायिक हिरासत में भेज दिया.
एक अप्रैल को ये मामला सेशन कोर्ट में पहुँचा. अभियुक्तों की तरफ़ से दोबारा ज़मानत की अर्ज़ी लगाई गई.
इस सुनवाई में पुलिस ने कोर्ट को बताया, "जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 1974 के सेक्शन 24 और बीएनएस 270/ 3(5) (सार्वजनिक उपद्रव) का अपराध न पाते हुए इन धाराओं को हटाया जा रहा है."

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हमने दिल्ली स्थित एक अधिवक्ता से बात की और उनके साथ क़ानूनी दस्तावेज़ साझा किए और ये समझना चाहा कि जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 1974 के सेक्शन 24 को एफ़आईआर से हटाए जाने का क्या मतलब है?
नाम ना छापने की शर्त पर उन्होंने कहा, "अब इसे आसान भाषा में समझें, तो पुलिस ने सेशन कोर्ट को बताया कि नदी में अपशिष्ट फेंकने (जिसे एफ़आईआर में चिकन की हड्डी फेंकने का नाम दिया गया है) का अपराध नहीं पाया गया है."
लेकिन यहाँ एक और सवाल है कि पुलिस ने जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 1974 के सेक्शन 24 को तो हटाया है , किन बीएनएस सेक्शन 279 (सार्वजनिक झरने या जलाशय के पानी को गंदा करना) इस केस में हैं.
ऐसे में बीएनएस 279, जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम के सेक्शन से कैसे अलग है?
इस क़ानूनी बारीकी को समझाते हुए अधिवक्ता कहते हैं, "इन दोनों धाराओं में अपराध साबित करने का मानक अलग है. जल अधिनियम की धारा 24 के तहत यह साबित करना होता है कि नदी में 'विषैला, हानिकारक या प्रदूषणकारी पदार्थ' डाला गया. इसमें ठोस सबूत चाहिए, फ़ॉरेंसिक सबूत. लेकिन बीएनएस 279 में 'सार्वजनिक जलाशय को दूषित या भ्रष्ट करना' जैसे व्यापक शब्दों का इस्तेमाल है, इसे लेकर कोर्ट में बहस करना आसान है."

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पुलिस का रवैया
बीते दिनों बीबीसी हिन्दी ने बनारस में कोतवाली क्षेत्र के एसीपी विजय प्रताप सिंह से यही समझने की कोशिश की कि आख़िर ये केस अभी कहाँ है.
विजय प्रताप सिंह कहते हैं, "दो वीडियो वायरल हुए. एक में तो सामान्य इफ़्तार की चीज़ें नज़र आ रही हैं. लेकिन एक और वीडियो है, जिसमें ये बड़े बर्तन में बिरयानी खाते और फिर चिकन की हड्डी फेंकते दिख रहे हैं."
मैंने उनसे पूछा कि क्या पुलिस के पास ऐसा कोई प्रमाण है कि हड्डियाँ फेंकी गईं? कोई वीडियो या फ़ॉरेंसिक सबूत?
इसके जवाब में वह कहते हैं, "नहीं ,लेकिन हमारे पास बाक़ी लोगों के बयान भी हैं."
इसके बाद मैंने एसीपी सिंह से दोबारा पूछा कि अगर पुलिस ने जल अधिनियम की धारा 24 ख़ुद ही हटा दी है, तो इससे तो साफ़ है कि हड्डी फेंकने के बारे में साक्ष्य नहीं हैं?
साथ ही नगर निगम या जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 1974 में इस बात के बारे में कोई नियम नहीं है कि नदी में क्या खाया जा सकता है और क्या नहीं.
मेरी इस बात पर एसीपी सिंह हामी भरते हैं, लेकिन फिर कहते हैं कि "गंगा पवित्र नदी है, इसमें अगर चिकन खा कर फेंका जाएगा, तो यह धार्मिक आस्था का मामला है."
जब मैंने उनसे फिर पूछा कि क्या चिकन की हड्डी फेंकने के साक्ष्य हैं? और अगर हैं, तो पुलिस ने जल अधिनियम का सेक्शन 24 क्यों हटाया?
एसीपी सिंह इस पर वह चुप हो जाते हैं, लेकिन कहते हैं, "आप लार्जर पिक्चर देखने की कोशिश नहीं कर रही हैं."
गंगा में नाव पर क्या खाना है क्या नहीं इसे लेकर नगर निगम की ओर से कोई नियम नहीं है.
वाराणसी नगर निगम के जन संचार अधिकारी संदीप श्रीवास्तव ने बीबीसी को बताया कि "गंगा में क्या खाना है इसे लेकर नगर निगम का कोई नियम नहीं है."

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मुसलमान परिवारों की गहरी चुप्पी
इस महीने हमने चार दिन बनारस में गुज़ारे और इन चारों ही दिनों में मैंने गिरफ़्तार मुसलमान लड़कों के परिवारों से बात करने की कोशिश की.
चूँकि मजिस्ट्रेट और सेशन कोर्ट दोनों से ही इनकी ज़मानत रद्द हो चुकी थी, तो यह मामला ज़मानत के लिए हाई कोर्ट में था.
यहाँ से उन्हें 60 दिन जेल में रहने के बाद आठ लोगों को 15 मई 2026 को ज़मानत मिली और बाक़ी छह लोगों को 18 मई को ज़मानत मिली है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट में मुस्लिम लड़कों की पैरवी कई वकील कर रहे हैं. मोहम्मद फैज़ान, अहमद रज़ा, मोहम्मद समीर और दो अन्य के वकील रघुवंश मिश्रा हैं.
महफ़ूज़ आलम, मोहम्मद अहमद, मोहम्मद अव्वल के वकील परवेज़ इक़बाल अंसारी, तौफ़ीक़, मोहम्मद अनस, मोहम्मद आज़ाद अली, तहसीम और निहाल आफ़रीदी की पैरवी पीयूष मिश्रा और रेनू मिश्रा कर रहे हैं. जबकि दानिश सैफ़ी, आमिर और नुरुल इस्लाम के वकील मोहम्मद वसीम हैं.
बीबीसी ने इस केस के वकीलों से बात करने की कोशिश की, लेकिन ज़्यादातर वकीलों ने बात करने से साफ़ इनकार कर दिया. उनका कहना था कि अभी मामला कोर्ट में है, तो मीडिया से बात करना केस के लिए ठीक नहीं होगा.
लेकिन दानिश सैफ़ी, आमिर और नुरुल इस्लाम की हाई कोर्ट मे पैरवी करने वाले अधिवक्ता मोहम्मद वसीम ने बीबीसी को बताया, "इन अभियुक्तों का परिवार काफ़ी डरा हुआ है और वो मीडिया से बिल्कुल बात नहीं करना चाहते."

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वाराणसी में स्थानीय पत्रकारों, कई वकीलों से संपर्क करने के बाद मुझे मुसलमान लड़कों के घरों का पता मिला, उन्होंने बताया कि बनारस के मदनपुरा इलाक़े में 'छोटे-बड़े' के नाम से साड़ी व्यापारी हैं, ये लड़के उनके घरों से ताल्लुक़ रखते हैं.
हम वाराणसी में पुराने शहर के मदनपुरा इलाक़े पहुँचे, जहाँ बेहद तंग गलियों में छोटी-छोटी साड़ी की दुकानें हैं. यह बनारस की साड़ियों का थोक बाज़ार है. हम लोगों से 'छोटे-बड़े की दुकान' का पता पूछते हुए आगे बढ़ते गए और मदनपुरा के तार-तिल्ला इलाक़े पहुँचे.
यहाँ साड़ी का थोक व्यापार करने वाले अधिकतर मुसलमान समुदाय के लोग रहते हैं. एक किनारे साइड स्टैंड पर खड़े स्कूटर पर दो अधेड़ उम्र के पुरुष बैठे हैं. इनसे पूछने पर पता चलता है कि वही 'छोटे-बड़े' हैं.
वे ये समझते हैं कि मैं साड़ियों का थोक सौदा करने आई हूँ. वे मुझे 10 क़दम की दूरी की ओर इशारा करते हुए बताते हैं, "यह हमारी दुकान है."
लेकिन जैसे ही मैं बताती हूँ कि मैं मीडिया से हूँ और गंगा में इफ़्तार वाले मामले पर बात करना चाहती हूँ, उनके चेहरे के भाव बदल जाते हैं.
वे कहते हैं, "क्या बात करें, मीडिया ने ही एक इफ़्तार के मामले को मुसलमान-हिंदू का रंग दे दिया. मीडिया ने इस केस को इतना बढ़ा दिया कि हमारे लड़के दो महीने से जेल में बंद हैं. बस वे घर आ जाएँ और हमें कोई बात नहीं करनी."
मेरे थोड़े और समझाने के बाद उनमें से एक शख़्स कहते हैं- "रुकिए, हमें बाक़ी लोगों से पूछ लेने दीजिए. यह कह कर वह अपने फ़ोन पर बात करते हुए दूर चले जाते हैं."

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इसके बाद इसी परिवार के एक शख्स हमसे कहते हैं, "20-22 साल उम्र है सारे लड़कों की. एक ही ख़ानदान से हैं. अगर उनके मन में कोई सुनियोजित योजना होती तो वे ख़ुद अपने फ़ोन से वीडियो बाँटते (सोशल मीडिया पर शेयर करते)?, हम क्या बोलें? हो गई हमसे ग़लती. अब तो हम माफ़ी माँग लेंगे. जैसे कहा जाएगा, कर देंगे. बस हमारे लड़के आ जाएँ."
लगभग एक घंटे तक मैं और मेरे साथी वीडियो जर्नलिस्ट इंतज़ार करते हैं. इसके बाद हमें बताया जाता है कि परिवारवालों को डर है कि मीडिया से बात की, तो ज़मानत पर असर पड़ सकता है. इसलिए बात नहीं कर पाएँगे.
15 मई को इनमें से आठ लड़कों को हाई कोर्ट से ज़मानत मिलने के बाद अगले दिन यानी 16 मई को मैं एक बार फिर मदनपुरा गई. इस उम्मीद में कि शायद हम उनसे अब बात कर सकेंगे, लेकिन इस बार भी ये परिवार हमसे बात करने को तैयार नहीं था.
उन्हें अब भी डर था कि मीडिया से बात करके उनके बच्चों की ज़मानत अर्जी पर असर पड़ सकता है.
जब हम वापस आने के लिए मुड़ते हैं, तो साड़ी की एक दुकान पर बैठे 17 साल के एक लड़के ने कहा, "हमारा भाई समीर जेल में बंद है. हमें तो मनाही है मीडिया से बात करने की. हम भी उस दिन इफ़्तार के लिए जाने वाले थे, वह तो हमें काम बोल दिया गया था तो हम नहीं जा पाए. उस दिन हमें ग़ुस्सा था कि भाई लोग गए और हम नहीं जा पाए. अब तो लग रहा है अच्छा हुआ हम नहीं गए."

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शिकायत करने वाले बीजेपी के स्थानीय नेता
रजत जायसवाल, बीजेपी युवा मोर्चा के वाराणसी महानगर के अध्यक्ष हैं. इनकी शिकायत पर ही इस मामले में एफ़आईआर दर्ज हुई है.
बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "उन लोगों ने जान-बूझ कर हमारी आस्था से खिलवाड़ किया. जिस नदी को हम पूजते हैं, वहाँ पर नाव में बिरयानी खाई और उस वीडियो को फ़लस्तीन के झंडे लगा कर सोशल मीडिया पर शेयर किया. हमारी भावनाएँ आहत हुईं और उसे लेकर हम प्रशासन के पास गए. अगर हमें कोर्ट और प्रशासन पर भरोसा न होता, तो हम भी क्रिया की प्रतिक्रिया करते."
मैं उन्हें वहीं रोक कर पूछा, "क्रिया की प्रतिक्रिया से आपका क्या मतलब है?"
जवाब में रजत जायसवाल कहते हैं, "वह कुछ भी हो सकती है."
रजत जायसवाल बताते हैं कि उन्हें सोशल मीडिया पर वीडियो देखकर ही घटना की जानकारी मिली. इसके बाद ही उन्होंने कोतवाली थाने में शिकायत की.
हाई कोर्ट की बहस और धारा 308 (5) का बाद में जोड़ा जाना
इस मामले में अब सभी 14 लड़कों की हाई कोर्ट से ज़मानत हो गई है.
15 मई 2026 को दो जज़ों ने आठ अभियुक्तों को ज़मानत दी. जज राजीव लोचन शुक्ला की कोर्ट ने पाँच और जज जिंतेंद्र कुमार सिन्हा की कोर्ट ने तीन अभियुक्तों को ज़मानत ही.
15 मई के अपने आदेश में हाई कोर्ट के जज राजीव लोचन शुक्ला की कोर्ट ने 13वें बिंदु में कहा है, "इफ़्तार में गंगा में नॉनवेज खाना और कथित तौर पर हड्डी फेंकने की बात अगर सच है, तो इससे हिंदू धर्म की भावनाएँ आहत होती हैं. लेकिन एक अभियुक्त ने शेयर किए गए वीडियो को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म से हटा दिया है क्योंकि वह प्लेटफ़ॉर्म के नियमों का उल्लंघन करते हैं. अपने हलफ़नामे के 14वें पैराग्राफ़ में अभियुक्त ने जो हुआ, उसे लेकर लेकर पछतावा जताया है."
इस फ़ैसले में उस हलफ़नामे का वह हिस्सा दिया गया है, जिसमें अभियुक्तों की ओर से लिखित में कहा गया है, "एफ़आईआर को देखा जाए, तो जो धाराएँ लगाई हैं, उसके तहत अपराध नहीं किया गया है. लेकिन इसे स्वीकार किए बिना आवेदक और उनके परिजन, समाज की नज़र में उन पर जो आरोप लगे हैं, वे उसकी पीड़ा महसूस करते हैं और इस पर तहे दिल से खेद व्यक्त करते हैं."
राजीव लोचन शुक्ला की कोर्ट ने ये इस माफ़ी पर कहा है कि हलफ़नामे के पैराग्राफ़ 14 में ना सिर्फ़ अभियुक्त बल्कि उनके परिजन भी समाज में घटना जिस तरह नज़र आई है, उस पर पछतावा व्यक्त कर चुके हैं.
हालाँकि कोर्ट ये समझती है कि इन अभियुक्तों पर क्रिमिनल केस चल रहा है और जब ये अभियुक्त जेल में हैं, तो उनकी तरफ़ से हलफ़नामा लिखने वाला उन पर लगे अपराधों को स्वीकार नहीं कर सकता.
साथ ही ज़मानत की अर्जी में अपराध का स्वीकार्य पत्र देने की कोई ज़रूरत नहीं होती है. लेकिन इसके बावजूद ज़मानत की अर्ज़ी के साथ हलफ़नामा दायर किया गया है. जिसे देख कर उनका पछतावा सच्चा लगता है.

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एक अन्य जज जितेंद्र कुमार सिन्हा ने ज़मानत के अपने आदेश में कहा है कि एफ़आईआर में नामजद 14 लोगों ने गंगा में इफ्तार पार्टी का आयोजन किया और कथित रूप से कचरा गंगा में फेंका जिसमें चिकन की हड्डियाँ शामिल हैं. जज ने ये भी कहा है कि इन अभियुक्तों ने अंडरटेकिंग देते हुए कहा है कि वह ऐसा काम भविष्य में फिर नहीं करेंगे.
हालाँकि इस आदेश में कही भी उस अंडरटेकिंग को कोट नहीं किया गया है.
18 मई 2026 को जज राजीव लोचन शुक्ला की ही कोर्ट ने दानिश सैफ़ी और अन्य दो को ज़मानत दी .
और इस फैसले में अभियुक्तों की ओर से जो सप्लीमेंट्री हलफ़नामा दिया गया था उसमें कहा गया, "आवेदक, जाँच के दौरान अपने अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव ना डालते हुए, बिना शर्त माफ़ी पेश कर रहा है."
अदालत ने आदेश में अभियुक्तों के हलफ़नामे के एक हिस्से का ज़िक्र किया है, जिसमें लिखा गया है, "प्रार्थी माँ गंगा व हिंदू धर्म का हृदय से सम्मान करता है. उपरोक्त मुक़दमे की घटना से आहत हुए समस्त हिंदू समुदाय एवं अन्य सभी धर्मावलम्बियों, जिनकी आस्था का केन्द्र बिंदु माँ गंगा है, उनसे करबद्ध क्षमा प्रार्थी है, प्रार्थी माननीय न्यायालय एवं समस्त हिंदू धर्मावलम्बियों को यह आश्वासन देता है कि इस प्रकार की किसी भी गतिविधियों में भविष्य में सम्मिलित नहीं होगा और मां गंगा का हृदय से आजीवन सम्मान करेगा."
मैंने दानिश सैफ़ी के वकील मोहम्मद वसीम से पूछा कि आख़िर अभियुक्तों के इस तरह माफ़ी मांगने का मतलब क्या है?
वसीम कहते हैं, "तस्लीम नाम के अभियुक्त ने वीडियो अपने सोशल मीडिया अकाउंट से शेयर किया था. इसलिए उस केस में वकील ने हलफ़नामा डाला और ज़मानत की अर्जी के साथ माफ़ी ली. ये माफ़ी इसलिए मांग रहे हैं क्योंकि इन्होंने गंगा में बिरयानी खाई. जब हाई कोर्ट ज़मानत माफ़ी को ध्यान में रख देगा, तो क्या किया जा सकता है. जब केस का ट्रायल होगा, तो देखा जाएगा कि आगे क्या होगा."
बीएनएस के जिस सेक्शन के तहत लगभग दो महीने तक 14 अभियुक्तों को जेल में रखा गया, वह है 308(5) (जबरन वसूली). क्योंकि यह अकेला ऐसा सेक्शन है, जिसमें सज़ा सात साल से ज़्यादा है. इस केस में अब गंगा में अवशेष बहाने को लेकर जल अधिनियम 1974 की कोई धारा नहीं है.
हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला ने कुछ अभियुक्तों ज़मानत देते हुए 15 मई के अपने फ़ैसले में जबरन वसूली की धारा पर भी टिप्पणी की है.
जस्टिस शुक्ला ने कहा, "इस केस में जिस तरह एफ़आईआर के बाद नाविक के बयान पर जबरन वसूली की धारा लगी, उसमें ध्यान देने वाली बात है कि नाविक अनिल साहनी एफ़आईआर दर्ज होने से पहले शिकायत दर्ज कराने ख़ुद से नहीं आए. जाँच के दौरान अपने बयान में उन्होंने अपनी नाव के जबरन लिए जाने की बात कही. ऐसे में साहनी जो कहानी बता रहे हैं, उस पर भी संदेह होता है."
हाई कोर्ट ने भी इस केस में 308 (5) धारा को जिस तरह जोड़ा गया है, उसे लेकर संदेह जताया है.

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30 मार्च को छपी इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में नाव के मालिक काशी सहानी ने कहा था कि उनसे नाव नाजू यादव नाम के शख़्स ने 15 मार्च शाम पाँच बजे किराए पर ली थी. यादव उनसे नाव किराए पर लेकर सवारी के हिसाब से नाव चलाते थे.
काशी सहानी की बेटी नैना साहनी ने अख़बार से कहा था कि नाजू यादव और उनके पिता के बीच 1800 रुपए पर बात तय हुई थी और इस नाव में 30 लोगों के बैठने की जगह थी. 45 मिनट में यादव ने नाव की चाबी साहनी को वापस भी कर दी थी.
बीबीसी ने नैना साहनी से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कहा कि वह अब मीडिया से बात नहीं करना चाहतीं.
इस मामले में अब तक चार्जशीट दायर नहीं की गई है. चार्जशीट के आने पर ही इस केस की तस्वीर और साफ़ होगी.
तभी पता चलेगा कि नाविक साहनी ने अपने बयान में क्या कहा है, अगर नाव जबरन ली गई, तो उन्हें चाबी वापस कैसे मिली?
ऐसे ही और भी सवाल हैं लेकिन उनके जवाब तब ही मिल पाएँगे, जब पुलिस इस में तफ़्तीश का ब्योरा पेश करेगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

































