नेतन्याहू के बहुमत से पिछड़ने पर अरब मीडिया में क्या कहा जा रहा है

इसराइली संसदीय चुनाव
इमेज कैप्शन, इसराइली संसदीय चुनाव में नेतन्याहू की पार्टी के गठबंधन को बहुमत से कम सीटें आई हैं
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इसराइल के चुनाव में वोटों की गिनती पूरी हो गई है. 29 अक्तूबर की शाम तक स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक़, विपक्ष को 67 सीटें मिली हैं.

चैनल 12 के अनुसार, प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू का गठबंधन सबसे बड़े गठबंधन के रूप में उभरा, लेकिन वह संसद में बहुमत हासिल करने और गठबंधन सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 61 सीटों के आंकड़े से पीछे रह गया.

वामपंथी रुझान वाले अख़बार हारेत्ज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़, नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिलीं. इनमें उनकी लिकुड पार्टी की 27 सीटें शामिल हैं. इसके साथ ही लिकुड संसद यानी नेसेट की सबसे बड़ी पार्टी बन गई.

2022 के चुनाव के मुक़ाबले नेतन्याहू के गठबंधन की सीटें कम हुई हैं. 2022 में उनके गठबंधन को 64 सीटें मिली थीं.

उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी गादी आइज़नकोट की पार्टी याशर को 21 सीटें मिली हैं. वह सहयोगी दलों के साथ मिलकर 48 सीटों वाला गठबंधन बना सकते हैं.

अगर विपक्षी दल फ़लस्तीनी बहुल समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों के साथ सहयोग करने पर सहमत हो जाते हैं, तो उनके लिए सरकार बनाने की संभावना बेहतर हो सकती है.

चुनाव के बाद नेतन्याहू के खेमे ने अरब समुदाय की पार्टियों पर धांधली के आरोप लगाए हैं. इसके साथ ही दावा किया गया है कि क़तर ने मतदान में दख़ल दिया. दोहा ने इस आरोप से इनकार किया है.

इसराइल के संसदीय चुनाव पर अरब जगत में बहुत क़रीबी से नज़र रखी जा रही थी. नेतन्याहू के संबंध अरब देशों से बहुत अच्छे नहीं रहे हैं और ग़ज़ा युद्ध और ईरान के साथ युद्ध के कारण वह पहले से ज़्यादा अलग-थलग नज़र आते हैं.

अरब पार्टियों के पास सत्ता की चाबी

इसराइल की अरब पार्टियां
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क़तर के मीडिया समूह अल-जज़ीरा की अंग्रेज़ी वेबसाइट ने नेतन्याहू की लिकुड पार्टी की ओर से क़तर पर लगाए गए दख़ल के आरोपों के संबंध में क़तरी विदेश मंत्रालय के बयान को प्रमुखता से जगह दी है.

इस रिपोर्ट में क़तरी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजेद अल-अंसारी का बयान प्रकाशित किया गया है.

उन्होंने कहा, "हम कुछ इसराइली नेताओं और मीडिया में उनके संपर्कों की ओर से लगाए गए आरोपों को ख़ारिज करते हैं. इन लोगों ने इस हफ़्ते हुए चुनावों के बाद क़तर को इसराइल के राजनीतिक विवादों में घसीटने के लिए एक बार फिर ग़लत जानकारी फैलाने का अभियान शुरू किया है."

अल-अंसारी ने कहा, "कुछ इसराइली नेता क़तर पर बिन्यामिन नेतन्याहू को ख़रीदने का आरोप लगाते हैं. इसराइल के राजनेता, वामपंथ को ख़रीदने का आरोप भी लगाते हैं और अब इस नए अभियान में अरब मतदाताओं को ख़रीदने का आरोप लगा रहे हैं. अगर इन दावों पर यक़ीन किया जाए, तो ऐसा लगता है कि क़तर पूरे इसराइल का मालिक है."

क़तर, इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच संघर्ष में एक अहम मध्यस्थ है.

दोहा, अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिशों की भी अगुवाई कर रहा है. इसका मक़सद अमेरिका और इसराइल के ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध को ख़त्म करना है.

अल-अंसारी ने कहा कि ताज़ा आरोप दोहा को उसकी "मध्यस्थ के रूप में अहम भूमिका, उसके कूटनीतिक और मानवीय प्रयासों, फ़लस्तीनी लोगों के लिए उसके समर्थन या न्यायपूर्ण और व्यापक शांति और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता" से विचलित नहीं करेंगे.

अल-जज़ीरा की वेबसाइट पर प्रकाशित एक अन्य लेख में इसराइली नेताओं के चुनाव से पहले और चुनाव के बाद के बयानों का सिलसिलेवार ब्योरा दिया गया है. इसमें बताया गया है कि नेतन्याहू पहले किस तरह आत्मविश्वास से भरे हुए थे. हालांकि, मतदान के दिन उन्होंने अपने समर्थकों से बड़ी संख्या में वोट डालने की अपील की. इसके बाद उन्होंने अरब पार्टियों पर धांधली के आरोप लगाए.

फ़लस्तीनियों को सरकार बनने का इंतज़ार

इसराइल चुनाव
इमेज कैप्शन, इसराइल चुनाव में अरब मूल के मतदाताओं ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया

अरबी भाषा के अंतरराष्ट्रीय अख़बार अशरक़ अल-अवसत ने अपनी एक ख़बर में लिखा है कि फ़लस्तीनी अथॉरिटी और वेस्ट बैंक में रहने वाले फ़लस्तीनी नई इसराइली सरकार के गठन की प्रक्रिया का इंतज़ार कर रहे हैं.

इस लेख के मुताबिक़, "फ़लस्तीनियों ने चुनाव पर हर मिनट नज़र रखी है और अभूतपूर्व दिलचस्पी के साथ अंतिम नतीजों का इंतज़ार कर रहे हैं. इसराइल का अगला प्रधानमंत्री और उसके साथ काम करने वाले मंत्री बड़े पैमाने पर यह तय करेंगे कि आने वाले वर्षों में वेस्ट बैंक और ग़ज़ा पट्टी में लोगों की ज़िंदगी कैसी होगी."

फ़लस्तीनी अथॉरिटी चुनाव प्रक्रिया पर क़रीबी नज़र रख रही है. उसे उम्मीद है कि आइज़नकोट को कामयाबी मिलेगी और नेतन्याहू को हार का सामना करना पड़ेगा.

फ़लस्तीनी अथॉरिटी का मानना है कि मौजूदा सरकार के अलावा इसराइल की कोई भी नई सरकार बनती है, तो सुरक्षा और आर्थिक हालात में सुधार की संभावना हो सकती है.

अख़बार के अनुसार, "अगर कोई सरकार लंबित आर्थिक और सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर बातचीत करने, रोकी गई फ़लस्तीनी धनराशि जारी करने और नियमित वित्तीय हस्तांतरण फिर से शुरू करने के लिए तैयार होती है, तो उसे दो बुरे विकल्पों में से कम बुरा विकल्प माना जाएगा."

नई सरकार से शांति वार्ता की उम्मीद

फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास
इमेज कैप्शन, फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने नई सरकार आने पर शांति की उम्मीद जताई है

सऊदी अरब के मीडिया समूह अल-अरबिया न्यूज़ ने फ़लस्तीनी अथॉरिटी के अध्यक्ष और फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास के बयान को प्रमुखता दी है.

अल-अरबिया न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़, महमूद अब्बास ने गुरुवार को कहा, "हम कई वर्षों से इसराइली पक्ष की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाते रहे हैं, ताकि उसके साथ शांति कायम की जा सके और इसराइल और फ़लस्तीन सुरक्षा, स्थिरता और शांति के साथ रह सकें."

अब्बास ने साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडुलिडिस के साथ निकोसिया में हुई बैठक के दौरान यह बात कही.

चुनाव के अनिश्चित नतीजों के कारण गठबंधन बनाने की कोशिशें कई हफ़्तों तक चल सकती हैं.

कई देशों की ओर से फ़लस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दिए जाने के बावजूद इसराइल और फ़लस्तीन के बीच शांति प्रक्रिया वर्षों से रुकी हुई है.

नेतन्याहू के कार्यकाल में क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों का निर्माण और फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ हिंसा बढ़ी है. वेस्ट बैंक में महमूद अब्बास की फ़लस्तीनी अथॉरिटी को सीमित स्वशासन हासिल है.

नेतन्याहू की दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार के मंत्रियों ने खुले तौर पर वेस्ट बैंक को इसराइल में मिलाने की बात कही है. उन्होंने ऐसी नीतियों का भी समर्थन किया है जिनका मक़सद फ़लस्तीनियों को वेस्ट बैंक और युद्ध से तबाह ग़ज़ा पट्टी छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करना है.

हमास के 7 अक्टूबर, 2023 के अभूतपूर्व हमले के बाद नेतन्याहू के नेतृत्व में इसराइल ने ग़ज़ा में विनाशकारी युद्ध छेड़ा. इस युद्ध के कारण ग़ज़ा का बड़ा हिस्सा मलबे में तब्दील हो गया है.

इसराइल ने 1967 से वेस्ट बैंक पर क़ब्ज़ा कर रखा है. वहां लगभग 30 लाख फ़लस्तीनियों के बीच 5 लाख से ज़्यादा इसराइली, यहूदी बस्तियों में रहते हैं. अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत इन बस्तियों को अवैध माना जाता है.

नेतन्याहू के ख़िलाफ़ विपक्ष के एकजुट होने का मौक़ा

नेतन्याहू

सऊदी अरब की राजधानी रियाद से प्रकाशित होने वाले अंग्रेज़ी अख़बार अरब न्यूज़ ने इसराइली चुनाव को अपनी प्रमुख ख़बर बनाया है.

अरब न्यूज़ में गैब्रियेल मालविसी ने एक लेख में लिखा है कि इसराइल के फ़लस्तीनी नागरिकों के बीच मतदान में बढ़ोतरी ने प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू और गादी आइज़नकोट के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी गठबंधनों के लिए समीकरण मुश्किल कर दिए हैं. दोनों में से किसी के पास भी बहुमत हासिल करने का आसान रास्ता नहीं है.

लेख के अनुसार, "यह गतिरोध नेतन्याहू के पक्ष में जा सकता है. स्पष्ट बहुमत हासिल करने में नाकाम रहने के बावजूद वह लंबे समय तक गठबंधन वार्ता चलने के दौरान कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं. ऐसा तब तक हो सकता है, जब तक कोई नई सरकार नहीं बन जाती या फिर एक और चुनाव नहीं हो जाता."

"आइज़नकोट ने नेतन्याहू पर चुनाव नतीजों को कमज़ोर करने के मक़सद से "ग़ैरक़ानूनी प्रभाव अभियान" चलाने का आरोप लगाया. हालांकि, उनकी इस टिप्पणी का मतलब यह नहीं है कि उन्होंने अरब सांसदों के साथ किसी औपचारिक समझौते की पेशकश की है. लेकिन संसद में सीटों का गणित आख़िरकार उन्हें ऐसे समझौते पर विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है."

ऐसी किसी भी बातचीत की शुरुआत रा'म पार्टी और उसके नेता मंसूर अब्बास से हो सकती है. उनकी पार्टी नफ़्ताली बेनेट के नेतृत्व वाली दक्षिणपंथी सरकार में शामिल हुई थी. बेनेट अब आइज़नकोट के गठबंधन के साथ हैं.

गुरुवार को एक और संभावित रास्ता सामने आया. टाइम्स ऑफ़ इसराइल की रिपोर्ट के मुताबिक़, अति-रूढ़िवादी यूनाइटेड टोरा जूडिज़्म पार्टी ने प्रस्ताव दिया कि वह आइज़नकोट के नेतृत्व वाली सरकार को गठबंधन में शामिल हुए बिना बाहर से समर्थन दे सकती है. इसके बदले उसने सैन्य सेवा में अनिवार्य भर्ती से छूट देने की मांग की है.

जॉइंट लिस्ट के साथ बातचीत करना ज़्यादा मुश्किल होगा, जिसे 11 सीटें मिली हैं.

अख़बार ने लिखा है, "आइज़नकोट ने सहयोग के लिए चार शर्तें रखी हैं. पहली, इसराइल को एक यहूदी और लोकतांत्रिक देश के रूप में मान्यता देना. दूसरी, इसराइल की स्वतंत्रता की घोषणा में बताए गए मूल्यों को स्वीकार करना. तीसरी, इसराइल के फ़लस्तीनी नागरिकों के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा का समर्थन करना. चौथी, हमास की एक आतंकवादी संगठन के रूप में निंदा करना."

"जॉइंट लिस्ट इसराइल के फ़लस्तीनी नागरिकों के लिए पूर्ण नागरिक और राष्ट्रीय समानता की मांग कर रही है. वह फ़लस्तीनी लोगों के हिस्से के रूप में उनके सामूहिक अधिकारों को मान्यता देने, ग़ज़ा में युद्ध ख़त्म करने, यहूदी बस्तियों के विस्तार और क़ब्ज़े का विरोध करने और एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी देश के गठन की दिशा में राजनीतिक रास्ता बनाने की मांग भी कर रही है. इस प्रस्तावित देश की सीमाएं 1967 की सीमाओं के मुताबिक़ हों और पूर्वी यरुशलम उसकी राजधानी हो."

एक संभावित नतीजा ऐसी सरकार का गठन हो सकता है जिसका मक़सद नेतन्याहू को सत्ता से हटाना हो.

इसके लिए जॉइंट लिस्ट विपक्ष के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देने के लिए तैयार हो सकती है, लेकिन बाहर से.,

विपक्ष के बीच बातचीत शुरू!

गादी आइज़नकोट
इमेज कैप्शन, अलग-अलग पार्टियों के बीच बातचीत शुरू होने के साथ ही आइज़नकोट ने डेमोक्रेट्स के नेता यायर गोलान से मुलाक़ात की है

संयुक्त अरब अमीरात के सरकारी अंग्रेज़ी अख़बार द नेशनल ने लिखा है कि अगर कोई भी पक्ष बहुमत हासिल नहीं कर पाता है, तो नए चुनाव की संभावना हो सकती है.

अख़बार ने एक लेख में लिखा है- 'बातचीत शुरू.'

इसके अनुसार, आइज़नकोट ने "शांतिपूर्वक और दृढ़ संकल्प के साथ" काम करने का वादा किया, लेकिन यह नहीं बताया कि वह सरकार बनाने की योजना कैसे लागू करेंगे. उन्होंने कहा कि मतदान की जांच चलने के बावजूद वह नई नेसेट के शपथ ग्रहण में "एक मिनट भी" देरी नहीं होने देंगे.

लेख के अनुसार, "अलग-अलग पार्टियों के बीच बातचीत शुरू होने के साथ ही आइज़नकोट ने मध्य-वामपंथी डेमोक्रेट्स के नेता यायर गोलान से मुलाक़ात की. गोलान पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड और अरब पार्टी के एक नेता मंसूर अब्बास से भी बातचीत कर रहे थे."

गोलान ने कहा, "इसराइली नागरिकों ने नेतन्याहू को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. बदलाव और राहत देने वाली सरकार बनाने के लिए हम सब कुछ करेंगे, क्योंकि मतदाताओं की यही इच्छा है."

गुरुवार को मतगणना पूरी हो गई, नतीजों की पुष्टि होने के बाद राष्ट्रपति आइज़ैक हर्ज़ोग, नेसेट के किसी सदस्य को सरकार बनाने के लिए गठबंधन तैयार करने की ज़िम्मेदारी सौंप सकते हैं.

अगर नेतन्याहू और आइज़नकोट, दोनों में से कोई भी 61 सीटों का आंकड़ा हासिल नहीं कर पाता है, तो अगले साल की शुरुआत में एक और चुनाव हो सकता है.

अंतिम नतीजे

इसराइल में प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, इसराइल में सामाजिक कार्यकर्ता, आइज़नकोट को अरब पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया है और छिटपुट प्रदर्शन हो रहे हैं

अंतिम नतीजे आने के बाद राष्ट्रपति आइज़ैक हर्ज़ोग उस पार्टी के नेता को सरकार बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपेंगे, जिसके बारे में उन्हें लगता है कि उसके पास सरकार बनाने की सबसे ज़्यादा संभावना है.

अंतिम नतीजे इस तरह हैं -

लिकुड: 27 सीटें

याशर: 21 सीटें

याहद: 12 सीटें

जॉइंट लिस्ट: 11 सीटें

द डेमोक्रेट्स: 8 सीटें

इसराइल बेतेनु: 7 सीटें

ओत्ज़मा येहुदित: 7 सीटें

यूनाइटेड टोरा जूडिज़्म: 7 सीटें

शास: 6 सीटें

रिलिजियस ज़ायनिज़्म: 6 सीटें

रा'म: 8 सीटें

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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