ताइवान ने भारत को छोड़ा पीछे, आगे की राह भी दिख रही मुश्किल

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ताइवान ने सोमवार को शेयर बाज़ार मूल्य यानी स्टॉक मार्केट वैल्युएशन के मामले में भारत को पीछे छोड़ दिया.
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह दुनिया की सबसे बड़ी चिप निर्माता कंपनी ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफ़ैक्चरिंग कंपनी (टीएसएमसी) के शेयरों में आई विस्फोटक तेज़ी रही.
स्टॉक मार्केट वैल्युएशन या मार्केट कैपिटलाइजेशन किसी स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड सभी कंपनियों की कुल मार्केट कैप का संयुक्त मूल्य होता है.
मिसाल के तौर पर भारत में एनएसई और बीएसई में लिस्टेड कंपनियों की कुल बाज़ार वैल्यू या मूल्य अभी 4.92 ट्रिलियन डॉलर है.
हालाँकि स्टॉक मार्केट वैल्युएशन के मामले में ताइवान भले ही भारत से आगे निकल गया है, लेकिन आईएमएफ़ के अनुमान के अनुसार भारत की 4.15 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था अब भी ताइवान की 977 अरब डॉलर की जीडीपी से कहीं बड़ी है और दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है.
लेकिन इसे ऐसे भी देखा जा सकता है कि 4.15 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वाले भारत को 977 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था वाले ताइवान ने पीछे छोड़ दिया है.
ब्लूमबर्ग के आँकड़ों के मुताबिक़ सोमवार तक ताइवान के शेयर बाज़ार का कुल मूल्य बढ़कर 4.95 ट्रिलियन डॉलर पहुँच गया, जबकि भारतीय शेयर बाज़ारों का मूल्य घटकर 4.92 ट्रिलियन डॉलर रह गया.
अब ताइवान का शेयर बाज़ार दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा बाज़ार बन गया है.
अमेरिका, चीन, जापान और हॉन्ग कॉन्ग के बाद ताइवान आ गया है.
सबसे दिलचस्प है कि टॉप फ़ाइव में तीन चीन, हॉन्ग कॉन्ग और ताइवान हैं. हॉन्ग कॉन्ग चीन का ही स्वायत्त क्षेत्र है और ताइवान को भी चीन अपना ही हिस्सा मानता है.
ताइवान की वैश्विक इक्विटी रैंकिंग में इस तेज़ उछाल का मुख्य कारण टीएसएमसी है, जिसका वेटेज अब ताइवान के बेंचमार्क इंडेक्स ताइएक्स में लगभग 42 प्रतिशत है.

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एआई के कारण भारी उछाल
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) में उछाल का फ़ायदा उठाते हुए इस साल टीएसएमसी के शेयरों में 49 प्रतिशत की तेज़ी आई है, क्योंकि एआई से जुड़े सेमीकंडक्टर बाज़ार में उसकी मज़बूत और लगभग प्रभुत्व वाली स्थिति है.
ताइवान के शेयर बाज़ार मूल्य में आई तेज़ बढ़ोतरी दिखाती है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर वैश्विक स्तर पर कितना सकारात्मक माहौल है.
इसी उम्मीद ने दुनिया भर में टेक्नोलॉजी शेयरों में रैली शुरू हुई है, जिसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा ताइवान और दक्षिण कोरिया के मैन्युफ़ैक्चरिंग हब को मिल रहा है.
ब्लूमबर्ग ने लिखा है कि दूसरी तरफ़ भारत बढ़ती ऊर्जा लागत, कॉरपोरेट मुनाफे़ में धीमी वृद्धि और एआई के क्षेत्र में महारत वाली कंपनियों की कमी से जूझ रहा है.

फ्रैंकलिन टेंपलटेन इन्वेस्टमेंट के फ़ंड मैनेजर यी पिंग लियाओ ने ब्लूमबर्ग से कहा, "ताइवान का बढ़ता मार्केट कैपिटलाइजेशन मूल रूप से टेक हार्डवेयर में उसकी भारी हिस्सेदारी को दिखाता है, जो इस समय एआई निवेश के केंद्र में है."
उन्होंने कहा, "जिन बाज़ारों में टेक हार्डवेयर की मौजूदगी सीमित है, वे अब ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे टेक हार्डवेयर-प्रधान बाज़ारों से पीछे छूटते जा रहे हैं."
नए वित्तीय नियम भी टीएसएमसी के पक्ष में गए हैं. पिछले महीने ताइवान के वित्तीय नियामक ने घरेलू फ़ंडों की किसी एक शेयर में निवेश की सीमा बढ़ा दी थी.
नए दिशा-निर्देशों के तहत केवल ताइवानी शेयरों में निवेश करने वाले फ़ंड अब अपनी कुल संपत्ति का 25 प्रतिशत तक ऐसे किसी लिस्टेड शेयर में लगा सकते हैं, जिसका वेटेज ताइएक्स इंडेक्स में 10 प्रतिशत से अधिक हो. पहले यह सीमा केवल 10 प्रतिशत थी.
फ़िलहाल केवल टीएसएमसी ही इस मानदंड को पूरा करती है. जेपी मॉर्गन चेस का कहना है कि इस बदलाव से ताइवान में 6 अरब डॉलर से अधिक का नया निवेश आ सकता है.

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विदेशी निवेशक और भारत
इस साल भारतीय शेयर बाज़ार से रिकॉर्ड स्तर पर विदेशी निवेशकों ने अपने पैसे निकाले हैं.
इसके पीछे शेयरों के महंगे दाम, कमज़ोर होता रुपया और बढ़ती ऊर्जा लागत जैसे कारण बताए जा रहे हैं.
इस साल अब तक भारतीय शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशक क़रीब 24 अरब डॉलर निकाल चुके हैं.
विदेशी निवेशकों का पूरा ज़ोर एआई के शेयरों पर है और भारत के पास एआई में अभी कोई मज़बूत विकल्प मौजूद नहीं है.
भारत के प्रमुख शेयर सूचकांक सेंसेक्स इस वर्ष लगभग 10 प्रतिशत नीचे है.
एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स में भारत की हिस्सेदारी भी पिछले वर्ष के 19 प्रतिशत से घटकर लगभग 12 प्रतिशत रह गई है.

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महज दो साल पहले भारत हॉन्ग कॉन्ग को पीछे छोड़ दुनिया का चौथा सबसे बड़ा शेयर बाज़ार बन गया था.
लेकिन दो साल बाद अब हॉन्ग कॉन्ग चौथे नंबर पर है और ताइवान भी भारत से आगे निकल गया.
कहा जा रहा है कि दक्षिण कोरिया भी जल्द ही भारत को पीछे छोड़ सकता है. पहले से ही कहा जा रहा था कि भारत एआई की रेस में पिछड़ चुका है.
इसी महीने ग्लोबल इन्वेस्टर और आर्थिक मामलों के एक्सपर्ट रुचिर शर्मा ने भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस से कहा था, ''अब भारत से पूँजी इसलिए निकल रही है क्योंकि आज दुनिया का लगभग पूरा ध्यान एआई पर है.''
''निवेशक एआई की वैश्विक दौड़ को लेकर दीवाने हो चुके हैं और इस दौड़ में भारत को एक कमज़ोर खिलाड़ी के रूप में देखा जा रहा है. अभी दुनिया एआई के "पिक्स एंड शॉवेल्स" चरण में है. यानी सेमीकंडक्टर, मेमरी और कंप्यूटिंग क्षमता पर फ़ोकस है. इन क्षेत्रों में भारत कमज़ोर है.''
रुचिर शर्मा ने कहा था, ''पिछले कुछ वर्षों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से 50 अरब डॉलर निकाल लिए हैं. नेट एफ़डीआई भी लगभग शून्य है. निवेश के अपने 30 वर्षों के अनुभव में मैंने भारत के प्रति इतनी उदासीनता कभी नहीं देखी. 2013 के "फ्रैजाइल फ़ाइव" दौर में भारत को लेकर नकारात्मकता थी, लेकिन आज स्थिति उससे भी ख़राब है. निवेशकों का पूरा ध्यान एआई पर है और भारत की कमज़ोरियाँ अब साफ़ दिखाई दे रही हैं.''

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क्यों पिछड़ रहा है भारत?
रुचिर कहते हैं, ''भारत रिसर्च पर जीडीपी का केवल 0.6 प्रतिशत ख़र्च करता है जबकि दक्षिण कोरिया और ताइवान चार से पाँच प्रतिशत तक ख़र्च करते हैं. इस मामले में इसराइल दुनिया में सबसे आगे है. हमारा आईटी सेक्टर लंबे समय तक सस्ते श्रम और आउटसोर्सिंग आधारित मॉडल पर निर्भर रहा, इनोवेशन और नई तकनीक विकसित करने पर नहीं. अब यही कमज़ोरी हमारे सामने बड़ी चुनौती बनकर लौट रही है.''
20 मई को अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स में आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने भी लिखा था कि भारत टेक्नोलॉजी के मामले में पिछड़ रहा है.
सुब्बाराव ने लिखा था, ''विदेशी निवेशक दुनिया भर में बेहतर मौक़ों की तलाश में भारत से पैसा निकालकर दूसरे बाज़ारों की ओर बढ़ गए. वैश्विक स्तर पर पूँजी अब तकनीक-आधारित अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर एआई, बायोटेक और डेटा सेंटर की ओर आकर्षित हो रही है. भारत अब भी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, लेकिन इन अत्याधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में उसकी भूमिका सीमित दिखाई देती है. जैसे-जैसे पैसा इनोवेशन वाली इकॉनमी की ओर जा रहा है, रुपए पर दबाव बढ़ना लगभग तय है.''
सुब्बाराव ने लिखा था, ''भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अब भी लगभग 700 अरब डॉलर के आस-पास है, जो दुनिया के सबसे बड़े भंडारों में से एक है. लेकिन इससे अति-आत्मविश्वास नहीं होना चाहिए. सामान्य समय में यह राशि बड़ी लग सकती है, लेकिन संकट के दौर में इसकी असली अहमियत उसकी विश्वसनीयता होती है.''
ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''एआई आधारित टेक शेयरों में भारत की ग़ैर-मौजूदगी उस पर भारी पड़ रही है. दूसरी तरफ़ ईरान युद्ध के चलते स्थानीय कंपनियों के मुनाफ़े पर दबाव बढ़ने से यह स्थिति और ख़राब हो सकती है. "
क्रिसिल रेटिंग्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, "अगर संघर्ष लंबा खिंचता है तो कॉरपोरेट मुनाफ़े में लगभग 200 बेसिस पॉइंट्स की गिरावट आ सकती है. एयरलाइंस, पॉलिएस्टर टेक्सटाइल, स्पेशलिटी केमिकल्स, फ़्लेक्सिबल पैकेजिंग और ऑटोमोबाइल सेक्टर सबसे ज़्यादा प्रभावित हो सकते हैं.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.































