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डीलिमिटेशन को लेकर दक्षिण भारतीय राज्य इतने चिंतित क्यों हैं? किस नुक़सान का है डर
संसद के आज से शुरू हो रहे विशेष तीन दिवसीय सत्र में तीन अहम विधेयकों पर विचार किया जा रहा है.
इनमें संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने और निर्वाचन क्षेत्रों के डीलिमिटेशन (परिसीमन) से जुड़े विधेयक भी शामिल हैं.
कई दशकों के बाद प्रस्तावित इस परिसीमन से भारत का राजनीतिक नक़्शा बदल जाएगा.
भारतीय संसद की लोकसभा में फिलहाल 543 सीटें हैं जिनकी संख्या डीलिमिटेशन के बाद 850 तक हो जाएगी.
परिसीमन या सीटों का पुनर्वितरण जनसंख्या के आधार पर किया जाना है और इसके लिए साल 2011 की जनगणना को आधार माना जा सकता है.
ऐसा करने के लिए सरकार को संवैधानिक संशोधन करना होगा जिसके लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत ज़रूरी है.
सरकार का तर्क है कि संसद में महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण देने के लिए परिसीमन ज़रूरी होगा.
लेकिन भारत के दक्षिणी राज्यों को लगता है कि इससे सदन में उनका प्रतिनिधित्व उत्तर भारत के अनुपात में कम हो सकता है.
फिलहाल, दक्षिण भारत के पांच राज्यों- आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और तमिलनाडु में लोकसभा की कुल 129 सीटें हैं. जबकि उत्तर भारत के सिर्फ़ दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में मिलाकर 120 लोकसभा सीटें है.
दक्षिण भारतीय राज्यों के राजनेताओं को लग रहा है कि नए परिसीमन के बाद ये अंतर और बढ़ सकता है.
गैर-बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों, ख़ासकर दक्षिण भारतीय राज्यों ने, मंगलवार को केंद्र सरकार के परिसीमन के प्रस्ताव के ख़िलाफ़ लामबंदी तेज़ कर दी है.
मंगलवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने प्रदर्शनों की चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर सरकार परिसीमन को लेकर आगे बढ़ी और इससे उत्तर भारतीय राज्यों को अधिक राजनीतिक ताक़त मिली तो पूरा राज्य ठहर जाएगा.
एमके स्टालिन ने मंगलवार को कहा, "मैं आंबेडकर का नाम लेकर कहता हूं, अगर तमिलनाडु प्रभावित हुआ, तो हम भारत का ध्यान खीचेंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ये आपके लिए तमिलनाडु से अंतिम चेतावनी है, तमिलनाडु लड़ेगा, तमिलनाडु जीतेगा."
एक रैली को संबोधित करते हुए स्टालिन ने कहा, "डीलिमिटेशन के ज़रिए एनडीए तमिलों पर हमला कर रही है. 23 अप्रैल के मतदान में हम उन्हें दिखा देंगे कि हम कौन हैं."
वहीं, तेलंगना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भी एमके स्टालिन से परिसीमन के ख़िलाफ़ दक्षिण भारतीय राज्यों के एकजुट मोर्चे का नेतृत्व करने के लिए कहा.
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी परिसीमन के समय का हवाला देते हुए बीजेपी पर राजनीतिक फ़ायदा उठाने के आरोप लगाए हैं. उन्होंने सरकार से महिला आरक्षण को मौजूदा सीटों के भीतर ही लागू करने की अपील भी की है.
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक्स पर पोस्ट किया, "बीजेपी की ख़तरनाक योजनाओं में से एक यह है कि वह 2029 के चुनावों में अपने फ़ायदे के लिए सभी लोकसभा सीटों की सीमांकन प्रक्रिया अपने हिसाब से करना चाहती है."
उन्होंने लिखा, "हमने देखा है कि बीजेपी यह कैसे करती है-असम और जम्मू-कश्मीर में सीमांकन प्रक्रिया को अपने पक्ष में मोड़ा गया. जिन क्षेत्रों और समुदायों में बीजेपी का समर्थन नहीं है उन्हें चुनावी फ़ायदे के लिए बांट दिया गया."
क्यों चिंतित हैं दक्षिण भारतीय राज्य?
भारतीय संविधान में राज्यों को आबादी के हिसाब से संसद में सीटें आवंटित करने का प्रावधान है और आमतौर पर निर्वाचन क्षेत्रों की आबादी लगभग बराबर होती है.
संविधान के अनुच्छेद 81(2) में कहा गया है कि किसी राज्य की जनसंख्या और उस राज्य के संसद सदस्यों की संख्या के बीच का अनुपात सभी राज्यों के लिए समान होगा.
इसलिए अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में ज़्यादा सांसद हैं और कम जनसंख्या वाले राज्यों में कम सांसद हैं.
भारत में की गई आख़िरी जनगणना 2011 के मुताबिक़, केवल पांच राज्य - उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश - मिलकर भारत की आधी जनसंख्या या 48.6 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं.
इसलिए, यदि जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ाई जाएं तो भारत की आधी लोकसभा सीटें इन पांच राज्यों में होंगी. इन राज्यों की तुलना में दक्षिण के राज्य सीटों के लिहाज से पीछे रहेंगे क्योंकि वहां जनसंख्या कम है.
दक्षिण भारतीय राज्यों की सबसे बड़ी चिंता आबादी के आधार से लोकसभा सीटों के बढ़ने को लेकर है. उनका आरोप है कि परिवार नियोजन को लेकर उनके बेहतर प्रदर्शन का उन्हें इनाम मिलने के बजाय सज़ा दी जा रही है.
शक्ति असंतुलन
तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों को डर है कि जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ने से उत्तर भारत के राज्यों का पलड़ा भारी हो जाएगा और दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक शक्ति और प्रभाव कम हो जाएगा.
हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसा दिया है कि परिसीमन से दक्षिणी राज्यों को नुक़सान नहीं होगा. प्रधानमंत्री ने कहा है कि सीटों की बढ़ोत्तरी सभी राज्यों में समानुपातिक होगी. नए परिसीमन के तहत सभी राज्यों की सीटों में 50 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी की जा सकती है.
हालांकि, दक्षिण भारतीय राज्य इस तर्क पर भी सवाल उठा रहे हैं. सिद्धारमैया ने प्रधानमंत्री के इस भरोसे को लेकर किए एक विश्लेषण में कहा है कि भले ही सीटों में बढ़ोत्तरी का प्रतिशत बराबर हो लेकिन कुल संख्या में दक्षिण भारतीय राज्यों को नुक़सान होगा.
उन्होंने कहा कि इसका असर ये होगा कि कुछ बड़े राज्यों में ही जीत हासिल करके कोई पार्टी सत्ता में आ जाएगी भले ही अन्य राज्यों में कमज़ोर हो.
दक्षिण राज्यों की एक बड़ी चिंता यह है कि सीटें घटने से संघीय संतुलन गड़बड़ा जाएगा और उनकी निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होगी.
बीजेपी सांसद के लक्ष्मण ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि सरकार 'प्रो-राटा' (आनुपातिक) आधार पर परिसीमन करने की योजना बना रही है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी भी राज्य, विशेषकर दक्षिण के राज्यों, को कोई नुक़सान न हो. लेकिन विशेषज्ञ अभी भी इस पर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं.
बीबीसी न्यूज़ से बात करते हुए विधी सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी से जुड़े अर्घ्या सेनगुप्ता ने कहा, "भले ही किसी राज्य की सीटें कम ना हो, लेकिन एक स्पष्ट अनुपातिक फॉर्मूले के ना होने का मतलब है कि नतीजे अलग-अलग हो सकते हैं और ज़्यादा आबादी वाले राज्यों को पक्ष में जा सकते हैं. इसका संघीय स्तर पर बड़ा प्रभाव हो सकता है."
जनसंख्या नियंत्रण नीति लागू करने की सज़ा?
पांच दक्षिण भारतीय राज्यों तमिलनाडु, तेलंगना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में भारत की 20 फ़ीसदी आबादी रहती है. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उत्तर भारतीय राज्यों की तुलना में यहां आबादी काफ़ी कम है.
हालांकि, स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक संभावनाओं के मामले में ये दक्षिण भारतीय राज्य देश के बाक़ी राज्यों की तुलना में बेहतर हैं.
तमिलनाडु समेत दक्षिण के राज्यों की शिकायत रहती है कि उन्हें केंद्र सरकार की जनसंख्या नियंत्रण नीति को सही से लागू करने और आकांक्षित लक्ष्यों को हासिल करने की 'सज़ा' दी जाती है.
दरअसल, दक्षिणी राज्यों ने स्वास्थ्य, शिक्षा और जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन किया है. वहां प्रजनन दर कम है, इसलिए उन्हें डर है कि जनसंख्या कम होने के कारण उन्हें कम संसदीय सीटें मिलेंगी, जो उनके लिए एक प्रकार की "सज़ा" जैसा होगा.
पिछले साल जब परिसीमन की चर्चा छिड़ी थी तब कर्नाटक में कांग्रेस नेता और मंत्री प्रियांक खड़गे ने कहा था, "अगर सिर्फ़ जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होता है तो दक्षिण के लोगों को अच्छे नागरिक होने की सज़ा दी जाएगी."
भारत में संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन अब तक तीन बार हुआ है, 1951, 1961 और 1971 में.
हालांकि उसके बाद से सभी राजनीतिक दलों की सरकारें परिसीमन से बचतीं रही हैं. ये डर रहा है कि अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग प्रजनन दर से राजनीतिक अंसुतलन हो सकता है.
तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगना पिछले 25 सालों से लोकसभा सीटों के परिसीमन को रोकने का प्रयास करते रहे हैं.
एमके स्टालिन ने परिसीमन को ऐतिहासिक अन्याय कहा है और उनकी पार्टी राज्यभर में काले झंडे दिखाकर प्रदर्शन कर रही है.
एक बयान में स्टालिन ने कहा, "क्या तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों को भारत की प्रगति में योगदान देने का अपराध करने की सज़ा दी जा रही है?"
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.